नागपुर, 31 अक्टूबर 2026: नागपुर के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश-20 श्री पंकज एस. पांडे की अदालत ने व्लॉगर फारिस कादरी को तहसील पुलिस थाने की कथित घटना से जुड़े सभी आरोपों से बरी कर दिया। न्यायनिर्णय में उनका नाम फारिस निजामुद्दीन कादरी दर्ज है। यह फैसला सत्र प्रकरण क्रमांक 695/2025 में 29 अक्टूबर 2026 को सुनाया गया।
यह मामला 8 जून 2024 की तड़के तहसील पुलिस थाने में हुई कथित घटना से संबंधित था। पुलिस ने अपराध क्रमांक 355/2024 दर्ज कर फारिस के विरुद्ध भारतीय दंड संहिता की धाराओं 353, 186, 504 और 427, तथा सार्वजनिक संपत्ति नुकसान निवारण अधिनियम, 1984 की धारा 3 के अंतर्गत अभियोजन चलाया था। आरोपों में लोकसेवक को कर्तव्य निर्वहन से रोकने के लिए हमला या आपराधिक बल प्रयोग करना, सरकारी कार्य में बाधा डालना, शांतिभंग के लिए उकसाने वाला जानबूझकर अपमान करना और संपत्ति को नुकसान पहुँचाना शामिल था।
अभियोजन के अनुसार, फारिस अपने एक मित्र के साथ पुलिस थाने गए थे। आरोप था कि उन्होंने शिकायत दर्ज करने की प्रक्रिया में हस्तक्षेप किया, कागजात छीने और पुलिसकर्मियों से गाली-गलौज की। यह भी आरोप लगाया गया कि दूसरे कमरे में ले जाए जाने के बाद उन्होंने कुर्सी फेंककर दीवार पर लगे टेलीविजन स्क्रीन और कंप्यूटर को नुकसान पहुँचाया। अभियोजन ने इन उपकरणों की कीमत लगभग 1.20 लाख रुपये बताई थी।
सुनवाई के दौरान अभियोजन ने सात गवाहों, जबकि बचाव पक्ष ने एक गवाह का परीक्षण कराया। मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्यों का परीक्षण करने के बाद अदालत ने पाया कि अभियोजन आरोपों को युक्तियुक्त संदेह से परे सिद्ध नहीं कर सका।
लोकसेवक पर हमले अथवा आपराधिक बल प्रयोग के आरोप पर अदालत ने कहा कि सूचनाकर्ता के विरुद्ध ऐसा कोई कृत्य सिद्ध नहीं हुआ। कागजात छीनने के संबंध में भी साक्ष्य अनिश्चित पाए गए। अदालत ने सीसीटीवी फुटेज प्रस्तुत नहीं किए जाने को भी महत्वपूर्ण माना, क्योंकि उससे घटना के संबंध में अभियोजन के कथन का वस्तुनिष्ठ परीक्षण किया जा सकता था।
धारा 186 के आरोप के संबंध में अदालत ने माना कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 195 के कारण केवल पुलिस रिपोर्ट के आधार पर संज्ञान लेने पर कानूनी रोक थी। इसके अतिरिक्त, सरकारी कार्य में कथित बाधा भी साक्ष्यों से सिद्ध नहीं हुई।
जानबूझकर अपमान करने के आरोप पर अदालत ने पाया कि अभियोजन न तो कथित अपशब्दों को सिद्ध कर सका और न ही ऐसी परिस्थितियों को, जिनसे शांतिभंग की संभावना स्थापित होती।
सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाने के आरोप में भी अदालत ने साक्ष्यों की महत्वपूर्ण कमियाँ दर्ज कीं। कथित रूप से क्षतिग्रस्त टेलीविजन स्क्रीन और कंप्यूटर को न तो जाँच के दौरान जब्त किया गया और न ही अदालत में पेश किया गया। उपकरणों के चालू रहने और इस्तेमाल में होने का स्पष्टीकरण, कथित नुकसान की प्रकृति या सीमा को सिद्ध नहीं करता था। उपकरणों और कथित नुकसान संबंधी अभियोजन के दावे के समर्थन में आवश्यक अभिलेख भी प्रस्तुत नहीं किए गए।
अदालत ने अभियोजन की तस्वीरों को विचार से बाहर रखा, क्योंकि उन्हें विधिवत सिद्ध नहीं किया गया था। फोटोग्राफर का परीक्षण नहीं हुआ और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य के लिए आवश्यक प्रमाणपत्र भी दाखिल नहीं किया गया। मरम्मत का दरपत्रक जारी करने वाले व्यक्ति को भी गवाह के रूप में पेश नहीं किया गया। अदालत के अनुसार, वह दरपत्रक वास्तविक नुकसान का आकलन सिद्ध नहीं करता था।
अदालत ने स्पष्ट किया कि प्राथमिकी में उल्लिखित 1.20 लाख रुपये उपकरणों का बताया गया मूल्य था, सिद्ध नुकसान की राशि नहीं। जाँच अधिकारी द्वारा बताई गई 38,500 रुपये की राशि भी पर्याप्त साक्ष्य से प्रमाणित नहीं हुई। घटनास्थल पंचनामे के पंच गवाह ने अभियोजन का समर्थन नहीं किया और अपनी मौजूदगी में घटनास्थल पर पंचनामा तैयार किए जाने से इनकार किया।
इन परिस्थितियों में अदालत ने फारिस को संदेह का लाभ देते हुए सभी आरोपों से बरी कर दिया। न्यायनिर्णय में स्पष्ट किया गया कि बरी किए जाने का आधार अपर्याप्त साक्ष्य और कानूनी कमियाँ हैं; अदालत ने यह निष्कर्ष नहीं दिया कि आरोप झूठे या परेशान करने के उद्देश्य से लगाए गए थे।
अदालत ने उनके मौजूदा जमानत बंधपत्र निरस्त कर जमानतदार को मुक्त कर दिया। साथ ही, आवश्यकता पड़ने पर उच्चतर न्यायालय के समक्ष उपस्थित होने के लिए भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 481 के अंतर्गत 25,000 रुपये का बंधपत्र और एक जमानतदार, छह महीने की अवधि के लिए प्रस्तुत करने का निर्देश दिया।
फारिस कादरी की ओर से अधिवक्ता मीर नगमान अली ने पैरवी की।