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नागपुर पदवीधर में 3000 वोट ‘सिर्फ 2 लिखने’ से अवैध, 15,000 वोट बर्बाद – कौन कर रहा सुनियोजित गेम?

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  • डबल-ट्रिपल इंजन सत्ता और बहुजन चेहरा सुधाकर कोहले के बावजूद भाजपा हारी, 12 लाख पदवीधरों ने महायुति को नकारा, 78 हजार शिक्षक वोटों पर ‘पैठणी-पैसे’ से जीत का जश्न?

नागपुर, 29 अक्टूबर – नागपुर पदवीधर चुनाव की हार के बाद भाजपा खेमे में ही सवाल उठ रहे हैं। विनोद तिवारी ने दो पोस्ट में जो सवाल उठाए हैं, वे इस हार को ‘अनाकलनीय’ से ‘सुनियोजित साजिश’ की ओर ले जाते हैं।

पहला बड़ा सवाल – 3000 वोट सिर्फ ‘2’ लिखने से अवैध कैसे?

तिवारी के अनुसार 3000 से ज्यादा वोट इसलिए अवैध ठहरे क्योंकि मतपत्र पर सुधाकर कोहले के नाम के सामने सिर्फ “2” लिखा था, और “1” की पहली पसंद किसी को दी ही नहीं गई थी। नियम के अनुसार पहली पसंद देना अनिवार्य है, पहली पसंद के बिना दूसरी पसंद का कोई मतलब नहीं।

सवाल यह है कि इतनी बड़ी संख्या में एक ही पैटर्न की गलती कैसे हुई? जाहीर सभा और सोशल मीडिया पर नेताओं ने बार-बार समझाया था कि पहले ‘1’ लिखना है। फिर भी इस बार 15,000 से ज्यादा वोट अलग-अलग कारणों से अवैध ठहरे। क्या यह अनजाने में हुई गलती है या किसी बड़े नेता की व्यवस्थित प्लानिंग?

तिवारी पूछते हैं – ऐसा प्लानिंग करके वोट खराब कराने वाला बड़ा नेता कौन है?

दूसरा बड़ा सवाल – डबल-ट्रिपल इंजन फिर भी पराजय क्यों?

वाराणसी पदवीधर में हार समझ आती है, क्योंकि लोग “भाइयों और बहनों” से ऊब चुके हैं, पर पूर्व विदर्भ में तो ऊपर से नीचे तक डबल-ट्रिपल इंजन की सत्ता है। बहुजन समाज के संगठक के तौर पर सुधाकर भाऊ जैसा मजबूत चेहरा दिया गया, फिर भी हार। यह अनाकलनीय नहीं तो क्या है?

क्या ये नतीजे 2 बनाम 3 हैं? असली तस्वीर कुछ और

तिवारी का दूसरा विश्लेषण कहता है – महाराष्ट्र विधान परिषद चुनाव को 2-3 से देखना भ्रम है।

पदवीधर के तीनों विभाग – पश्चिम महाराष्ट्र, मराठवाड़ा और पूर्व विदर्भ – यानी 24 जिलों में फैले 12 लाख से ज्यादा पदवीधर मतदाताओं ने भाजपा-महायुति को पूरी तरह नकार दिया और महाविकास आघाडी के उम्मीदवारों को भरघोस वोटों से जिताया।

वहीं शिक्षक मतदारसंघ सिर्फ 78 हजार मतदाताओं का एक विशिष्ट वर्ग है। तिवारी का आरोप है कि वहां “पैठणी और पैसे” बांटकर और निजी नियोजन से जीते गए दो उम्मीदवारों को महायुति अपनी जीत बताए तो यह खुद को मूर्ख बनाने जैसा है।

निष्कर्ष : 12 लाख पढ़े-लिखे पदवीधरों का जनादेश बनाम 78 हजार के सीमित वर्ग की जीत – वास्तविकता छिप नहीं सकती। नागपुर में अवैध वोटों का पैटर्न और पूरे महाराष्ट्र में पदवीधरों का रुझान दोनों पर खुली चर्चा जरूरी है।

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एट्रोसिटी मामले में दो भाइयों को बॉम्बे हाई कोर्ट से अग्रिम जमानत

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नागपुर, 31 अक्टूबर: बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर खंडपीठ ने यवतमाल जिले के खंडाला पुलिस थाने में दर्ज मामले में इसापुर बांध, तहसील पुसद निवासी शेख जुनैद शेख रहमतुल्ला और शेख एराज शेख रहमतुल्ला को अग्रिम जमानत प्रदान की।

न्यायमूर्ति वाई. जी. खोब्रागड़े ने आपराधिक अपील क्रमांक 504/2026 स्वीकार करते हुए पुसद के सत्र न्यायालय द्वारा 4 सितंबर 2026 को पारित अग्रिम जमानत नामंजूर करने का आदेश निरस्त कर दिया।

मामला 25 जून 2026 को खेत की मेड़ पर लगे सीमेंट के खंभे हटाने को लेकर हुए कथित विवाद से संबंधित है। शिकायत में जातिसूचक गालीगलौज, मारपीट के प्रयास और धमकी देने के आरोप लगाए गए थे। भारतीय न्याय संहिता की धाराओं तथा अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धारा 3(2)(वीए) के तहत अपराध दर्ज किया गया था।

अग्रिम जमानत पर विचार करते हुए हाई कोर्ट ने कहा कि प्राथमिकी में सामूहिक रूप से जातिसूचक गाली देने का सामान्य आरोप है, लेकिन कथित रूप से इस्तेमाल किए गए विशिष्ट जातिसूचक शब्दों का उल्लेख नहीं है। न्यायालय ने पक्षकारों के बीच खेत की सीमा का विवाद होने का भी संज्ञान लिया। प्राथमिकी से प्रथमदृष्टया सार्वजनिक दृष्टि में जातिसूचक गालीगलौज होने का संकेत नहीं मिलने के कारण न्यायालय ने इस मामले में अधिनियम की धारा 18 के तहत अग्रिम जमानत पर रोक लागू नहीं मानी।

न्यायालय ने गिरफ्तारी की स्थिति में दोनों को प्रत्येक के लिए 50 हजार रुपये के व्यक्तिगत बंधपत्र और समान राशि के दो-दो सक्षम जमानतदारों पर रिहा करने का निर्देश दिया। दोनों को दो महीने तक प्रत्येक सोमवार सुबह 11 से दोपहर 2 बजे के बीच जांच अधिकारी के समक्ष उपस्थित रहने, निचली अदालत में नियमित हाजिरी लगाने और अभियोजन के गवाहों को प्रभावित नहीं करने की शर्तें लगाई गई हैं।

अपीलकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता एम. एन. अली, राज्य की ओर से अतिरिक्त सरकारी अभियोक्ता एच. एस. धांडे और शिकायतकर्ता की ओर से नियुक्त अधिवक्ता एस. आर. सयारे उपस्थित हुए। न्यायालय की टिप्पणियां अग्रिम जमानत के निर्णय तक सीमित हैं; मूल आपराधिक मामला लंबित है।

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कथित चाकू दिखाकर रुपये और मोबाइल छीनने के प्रयास के मामले में शहबाज अजीम खान को जमानत

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नागपुर, 31 अक्टूबर 2026: नागपुर के जिला न्यायाधीश-14 एवं अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश श्री ब्रह्मानंद एम. धनुरे ने शहबाज अजीम खान की नियमित जमानत अर्जी मंजूर की। दिनांक 27 अक्टूबर 2026 को पारित यह आदेश आपराधिक जमानत आवेदन क्रमांक 3414/2026 में दिया गया।

अजनी पुलिस थाने में दर्ज अपराध क्रमांक 0508/2026 में आवेदक पर शिकायतकर्ता का वाहन रोककर चाकू दिखाते हुए रुपये और मोबाइल फोन जबरन लेने का प्रयास करने का आरोप है। प्रकरण भारतीय न्याय संहिता की धारा 312 तथा महाराष्ट्र पुलिस अधिनियम की धारा 135 के अंतर्गत दर्ज है।

न्यायालय ने विचार किया कि आवेदक का कोई आपराधिक पूर्ववृत्त नहीं है, जांच लगभग पूर्ण हो चुकी है और शिकायतकर्ता को कोई चोट नहीं आई है। पूर्व की घटना के कारण आवेदक को मामले में फंसाए जाने की संभावना से भी न्यायालय ने इनकार नहीं किया। न्यायालय ने कहा कि शिकायतकर्ता को धमकाने अथवा साक्ष्यों को प्रभावित करने की आशंका का समाधान कड़ी शर्तें लगाकर किया जा सकता है।

आदेश के अनुसार ₹25,000 के निजी मुचलके, समान राशि के एक या अधिक जमानतदार तथा ₹25,000 की नकद जमानत की शर्त पर नियमित जमानत मंजूर की गई। आरोपपत्र दाखिल होने तक प्रत्येक सोमवार और गुरुवार को अजनी पुलिस थाने में हाजिरी लगाने, जांच में सहयोग करने तथा गवाहों या साक्ष्यों को प्रभावित न करने की शर्तें भी लगाई गई हैं।

आवेदक की ओर से अधिवक्ता मीर नगमन अली ने पैरवी की। राज्य की ओर से अतिरिक्त सरकारी अभियोक्ता श्री आर. जी. डागोरिया उपस्थित थे।

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लोकसेवक पर हमले और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाने के आरोपों से व्लॉगर फारिस कादरी बरी

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नागपुर, 31 अक्टूबर 2026: नागपुर के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश-20 श्री पंकज एस. पांडे की अदालत ने व्लॉगर फारिस कादरी को तहसील पुलिस थाने की कथित घटना से जुड़े सभी आरोपों से बरी कर दिया। न्यायनिर्णय में उनका नाम फारिस निजामुद्दीन कादरी दर्ज है। यह फैसला सत्र प्रकरण क्रमांक 695/2025 में 29 अक्टूबर 2026 को सुनाया गया।

यह मामला 8 जून 2024 की तड़के तहसील पुलिस थाने में हुई कथित घटना से संबंधित था। पुलिस ने अपराध क्रमांक 355/2024 दर्ज कर फारिस के विरुद्ध भारतीय दंड संहिता की धाराओं 353, 186, 504 और 427, तथा सार्वजनिक संपत्ति नुकसान निवारण अधिनियम, 1984 की धारा 3 के अंतर्गत अभियोजन चलाया था। आरोपों में लोकसेवक को कर्तव्य निर्वहन से रोकने के लिए हमला या आपराधिक बल प्रयोग करना, सरकारी कार्य में बाधा डालना, शांतिभंग के लिए उकसाने वाला जानबूझकर अपमान करना और संपत्ति को नुकसान पहुँचाना शामिल था।

अभियोजन के अनुसार, फारिस अपने एक मित्र के साथ पुलिस थाने गए थे। आरोप था कि उन्होंने शिकायत दर्ज करने की प्रक्रिया में हस्तक्षेप किया, कागजात छीने और पुलिसकर्मियों से गाली-गलौज की। यह भी आरोप लगाया गया कि दूसरे कमरे में ले जाए जाने के बाद उन्होंने कुर्सी फेंककर दीवार पर लगे टेलीविजन स्क्रीन और कंप्यूटर को नुकसान पहुँचाया। अभियोजन ने इन उपकरणों की कीमत लगभग 1.20 लाख रुपये बताई थी।

सुनवाई के दौरान अभियोजन ने सात गवाहों, जबकि बचाव पक्ष ने एक गवाह का परीक्षण कराया। मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्यों का परीक्षण करने के बाद अदालत ने पाया कि अभियोजन आरोपों को युक्तियुक्त संदेह से परे सिद्ध नहीं कर सका।

लोकसेवक पर हमले अथवा आपराधिक बल प्रयोग के आरोप पर अदालत ने कहा कि सूचनाकर्ता के विरुद्ध ऐसा कोई कृत्य सिद्ध नहीं हुआ। कागजात छीनने के संबंध में भी साक्ष्य अनिश्चित पाए गए। अदालत ने सीसीटीवी फुटेज प्रस्तुत नहीं किए जाने को भी महत्वपूर्ण माना, क्योंकि उससे घटना के संबंध में अभियोजन के कथन का वस्तुनिष्ठ परीक्षण किया जा सकता था।

धारा 186 के आरोप के संबंध में अदालत ने माना कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 195 के कारण केवल पुलिस रिपोर्ट के आधार पर संज्ञान लेने पर कानूनी रोक थी। इसके अतिरिक्त, सरकारी कार्य में कथित बाधा भी साक्ष्यों से सिद्ध नहीं हुई।

जानबूझकर अपमान करने के आरोप पर अदालत ने पाया कि अभियोजन न तो कथित अपशब्दों को सिद्ध कर सका और न ही ऐसी परिस्थितियों को, जिनसे शांतिभंग की संभावना स्थापित होती।

सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाने के आरोप में भी अदालत ने साक्ष्यों की महत्वपूर्ण कमियाँ दर्ज कीं। कथित रूप से क्षतिग्रस्त टेलीविजन स्क्रीन और कंप्यूटर को न तो जाँच के दौरान जब्त किया गया और न ही अदालत में पेश किया गया। उपकरणों के चालू रहने और इस्तेमाल में होने का स्पष्टीकरण, कथित नुकसान की प्रकृति या सीमा को सिद्ध नहीं करता था। उपकरणों और कथित नुकसान संबंधी अभियोजन के दावे के समर्थन में आवश्यक अभिलेख भी प्रस्तुत नहीं किए गए।

अदालत ने अभियोजन की तस्वीरों को विचार से बाहर रखा, क्योंकि उन्हें विधिवत सिद्ध नहीं किया गया था। फोटोग्राफर का परीक्षण नहीं हुआ और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य के लिए आवश्यक प्रमाणपत्र भी दाखिल नहीं किया गया। मरम्मत का दरपत्रक जारी करने वाले व्यक्ति को भी गवाह के रूप में पेश नहीं किया गया। अदालत के अनुसार, वह दरपत्रक वास्तविक नुकसान का आकलन सिद्ध नहीं करता था।

अदालत ने स्पष्ट किया कि प्राथमिकी में उल्लिखित 1.20 लाख रुपये उपकरणों का बताया गया मूल्य था, सिद्ध नुकसान की राशि नहीं। जाँच अधिकारी द्वारा बताई गई 38,500 रुपये की राशि भी पर्याप्त साक्ष्य से प्रमाणित नहीं हुई। घटनास्थल पंचनामे के पंच गवाह ने अभियोजन का समर्थन नहीं किया और अपनी मौजूदगी में घटनास्थल पर पंचनामा तैयार किए जाने से इनकार किया।

इन परिस्थितियों में अदालत ने फारिस को संदेह का लाभ देते हुए सभी आरोपों से बरी कर दिया। न्यायनिर्णय में स्पष्ट किया गया कि बरी किए जाने का आधार अपर्याप्त साक्ष्य और कानूनी कमियाँ हैं; अदालत ने यह निष्कर्ष नहीं दिया कि आरोप झूठे या परेशान करने के उद्देश्य से लगाए गए थे।

अदालत ने उनके मौजूदा जमानत बंधपत्र निरस्त कर जमानतदार को मुक्त कर दिया। साथ ही, आवश्यकता पड़ने पर उच्चतर न्यायालय के समक्ष उपस्थित होने के लिए भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 481 के अंतर्गत 25,000 रुपये का बंधपत्र और एक जमानतदार, छह महीने की अवधि के लिए प्रस्तुत करने का निर्देश दिया।

फारिस कादरी की ओर से अधिवक्ता मीर नगमान अली ने पैरवी की।

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