- अगस्त में 58% बारिश की कमी, अकोला 84%, अमरावती 82%, यवतमाल 78% सूखे की मार में – दोबार-तिबार बुवाई के बाद फूल-फलियां-बोंड बनने की अवस्था में लंबा ब्रेक; 6 महीने में 815 किसान आत्महत्या के बाद अब नापीकी का नया संकट, किशोर तिवारी ने पीएम मोदी से विदर्भ दौरे और 12 सूत्री एकीकृत कृषि संकट निर्मूलन कार्यक्रम की मांग की
यवतमाल,6 सितंबर 2026 : यंदा के मानसून ने पश्चिम विदर्भ के किसान को धोखा दे दिया है। पावसाचे उशिरा आगमन, शुरू में अनिश्चितता, बीच में अतिवृष्टि, दोबार-तिबार पेरणी और फिर अगस्त में पड़े अभूतपूर्व लंबे सूखे ने यवतमाल, अमरावती, अकोला, वाशिम, बुलढाणा और वर्धा – इन छह जिलों के लगभग 40 लाख हेक्टेयर कोरडवाहू पट्टे पर खड़ी कपास, सोयाबीन, तूर, मूंग-उड़द की खरीफ फसल को गंभीर खतरे में डाल दिया है। यह चेतावनी विदर्भ जन आंदोलन समिति के नेता किशोर तिवारी ने दी है।
तिवारी ने कहा – “यंदा का मानसून पश्चिम विदर्भ के लिए कृषि आपातकाल बन गया है। हंगाम खत्म होने के बाद पंचनामा करने से अच्छा है आज खेत में खड़ी फसल और जिंदा किसान को बचाया जाए।”
अगस्त ने तोड़ी कमर
आंकड़ों के अनुसार अगस्त 2026 में विदर्भ में सामान्य 297.1 मिमी के मुकाबले सिर्फ 125.5 मिमी बारिश हुई – 58% की सीधी तूट। संचयी जून-अगस्त की तूट 22% दिखती है, लेकिन असली मार समय की है।
जिलेवार अगस्त की तूट देखिए – अकोला 84%, अमरावती 82%, यवतमाल 78%, वर्धा 73%, वाशिम 71%, बुलढाणा 61%। जुलाई में हुई ज्यादा बारिश से औसत भले ही सुधरा दिखे, पर मिट्टी में नमी खत्म होने से कपास पाते-फूल-बोंड की अवस्था में झड़ रहा है, सोयाबीन फूल और शेंगा भरने के टप्पे पर सूख रहा है, तूर की बढ़त रुक गई है।
तिवारी ने कहा – सरकार पूरे हंगाम की औसत दिखाकर अगस्त की 60 से 80% की तूट को छुपाए नहीं। खेती में बारिश कब हुई, यह कितनी हुई उतना ही महत्वपूर्ण है।
40 लाख हेक्टेयर का सवाल और 815 मौतें
पश्चिम विदर्भ के इस पट्टे का सैटेलाइट, मिट्टी की नमी और गांव-निहाय प्रत्यक्ष सर्वे से 7 दिन में विशेष नुकसान आकलन हो, यह मांग है।
यह संकट ऐसे इलाके पर आया है जहां जनवरी से जून 2026 के बीच 6 महीने में ही 815 किसान आत्महत्याएं हुई हैं – अमरावती 176, बुलढाणा 169, अकोला 130, यवतमाल 128, वाशिम 112। तिवारी ने कहा – “इन मौतों को व्यक्तिगत विफलता कहना वास्तविकता से भागना है। कर्ज, लागत, बाजार, बीमा और मौसम का झटका एक साथ आता है तो किसान टूटता है। अब 40 लाख हेक्टेयर की नापीकी इसे और भयावह बनाएगी।”
1995 से संकट, 2006 में PM आए, अब फिर जरूरत
तिवारी ने याद दिलाया कि 1995 से विदर्भ का संकट राष्ट्रीय चर्चा में है। 2006 में तत्कालीन PM डॉ. मनमोहन सिंह ने अमरावती-वर्धा-यवतमाल आकर किसान परिवारों से संवाद किया था और विशेष पैकेज दिया था।
“20 साल बाद भी वहीं आत्महत्या हो रही है और जलवायु परिवर्तन ने संकट को और जटिल बना दिया है। अब सिर्फ पैकेज नहीं, नीति बदलनी होगी।”
उन्होंने PM नरेंद्र मोदी से अपील की – “दिल्ली की फाइल और राज्य की औसत मत देखिए, आप खुद यवतमाल, अमरावती, अकोला, वाशिम, बुलढाणा, वर्धा के खेत में आइए। जलती कपास-सोयाबीन देखिए, विधवाओं से बात कीजिए, आदिवासी कोरडवाहू किसानों को सुनिए और फिर एकीकृत कृषि संकट निर्मूलन कार्यक्रम घोषित कीजिए।”
MSP का ऐलान काफी नहीं, खरीद जरूरी
2026-27 के लिए केंद्र ने MSP घोषित किया है – पीला सोयाबीन 5,708 रु, तूर 8,450 रु, मध्यम कपास 8,267 रु, लंबा कपास 8,667 रु प्रति क्विंटल। पर MSP घोषित करने से कुछ नहीं होगा, पहले दिन से सरकारी खरीद होनी चाहिए।
साथ ही 1 जून से 31 अक्टूबर 2026 तक कपास आयात पर सीमा शुल्क माफी पर सवाल उठाते हुए तिवारी ने कहा – “वस्त्रोद्योग को सस्ता कच्चा माल चाहिए, पर कीमत विदर्भ का कपास किसान क्यों चुकाए? हर आयात-निर्यात फैसले से पहले किसान-आय पर असर का मूल्यांकन अनिवार्य हो।”
12 सूत्री मांग
- तालुका-निहाय वैज्ञानिक मूल्यांकन कर पात्र जगह सूखा घोषित करो।
- 40 लाख हेक्टेयर का 7 दिन में उपग्रह + जमीनी सर्वे।
- गंभीर नुकसान पर 50,000 रु/हेक्टेयर विशेष मदद।
- जबरन वसूली बंद, कर्ज पुनर्गठन/माफी और नया फसल कर्ज।
- फसल बीमा दावे तुरंत, बीमा कंपनी का प्रीमियम और भुगतान सार्वजनिक।
- कपास-सोयाबीन-तूर की MSP पर पहले दिन से पर्याप्त खरीद।
- किसान को फसल और प्रमाणित बीज-तकनीक चुनने की आजादी, कम पानी-गर्मी सहने वाले वाण पर शोध।
- जल सुरक्षा – खेत-तलैया, सूक्ष्म सिंचाई, भूजल पुनर्भरण।
- आयात-निर्यात नीति से पहले किसान-परिणाम मूल्यांकन।
- आत्महत्याग्रस्त परिवार को 10 लाख, बच्चों की शिक्षा, विधवा को रोजगार।
- खेत मजदूर-भूमिहीन को 200 दिन रोजगार और अन्न सुरक्षा।
- 2001 के बाद की आत्महत्या, पैकेज, कर्ज, सिंचाई, बीमा, बाजार और जलवायु परिवर्तन पर श्वेतपत्र और गांव स्तर पर आर्थिक संकट की पूर्व-चेतावनी प्रणाली।
तिवारी ने अंत में कहा – “बारिश सरकार के हाथ में नहीं, पर बारिश ने धोखा देने के बाद किसान को कर्ज-बीमा-बाजार के दरवाजे पर अकेला छोड़ना है या पूरी सरकार उसके पीछे खड़ी करनी है, यह सरकार के हाथ में है। 40 लाख हेक्टेयर फसल बची तो लाखों परिवार बचेंगे।”