जहां ‘थिण्णई’ पर थके मुसाफिर को पानी मिलता था, वहां आज ‘स्टील का जार’ उड़ता है – प्रो. राजन की कलम से आधुनिक भारत के बदलते संस्कारों की मार्मिक दास्तान
भारत को समझना है तो एक शब्द को समझना होगा। वह शब्द है – आतिथ्य।
यह कभी सौदा नहीं था, यह धर्म था। यह अनुबंध था। एक अनजान राहगीर को देवता मान लेना, बिना बुलाए उसके लिए दो रोटी ज्यादा बना लेना, यही हमारा संस्कार था। इसी संस्कार ने हमें सिखाया था – अतिथि देवो भव।
मैं उस पीढ़ी का साक्षी हूं जिसने इस धर्म को जीते-जागते देखा है।
वो ‘थिण्णई’ क्या थी?
दक्षिण भारत के गांवों में घर सटे हुए होते थे। हर घर के आगे एक ऊंचा चबूतरा होता था, तमिल में उसे ‘थिण्णई’ कहते थे। वो ईंट-पत्थर नहीं था, वो एक विचार था, एक घोषणा थी।
कि आओ, थके हो तो बैठो। प्यासे हो तो पानी पियो। भूखे हो तो अन्न है। बिना किसी डर के सुस्ता लो और फिर अपनी राह पर निकल जाओ।
और इस विचार के पहरेदार कौन थे? हमारी मां, हमारी दादी। वे रोज थोड़ा सा भात ज्यादा पकाती थीं। इसलिए नहीं कि घर में कोई भूखा है, बल्कि इसलिए कि दोपहर में कोई अनजान भूखा आ गया तो? कोई न्योता नहीं, कोई अपेक्षा नहीं। पर चूल्हे पर आंच और मन में जगह, दोनों हमेशा तैयार। यही भारत था।
अब सब बदल गया है
आज वो ‘थिण्णई’ उजड़ गई है। उन घरों को तोड़कर कांच और कंक्रीट के फ्लैट खड़े हो गए हैं। ‘थिण्णई’ के साथ ही वो दिल भी ढह गया जो उसमें बसता था।
आज की बहुमंजिला इमारतों में सब कुछ है – सिक्योरिटी गेट है, सीसीटीवी है, इंटरकॉम है, पर पड़ोसी का नाम तक नहीं पता। हमारे पास मकान हैं, पर घर नहीं रहे।
मेरे जीवन की वो शाम – जब चाय नहीं, स्टील का जार आया
इस बदलाव को मैंने अपनी आंखों से देखा, अपने कानों से सुना।
एक दिन मैं स्कूटर से एक कॉलोनी से गुजर रहा था। मेरे पुराने छात्र वैभव ने मुझे देख लिया। दौड़कर गेट खोला, चरण स्पर्श किया और बोला – सर, चाय पीकर जाइए।
दिल भर आया। लगा, चलो गुरु-शिष्य परंपरा आज भी जिंदा है। ‘अतिथि देवो भव’ आज भी कहीं तो है।
मैं सम्मान के साथ ड्राइंग रूम में बैठ गया। वह अंदर पत्नी को मेरे आने की खबर देने गया। मैं अखबार पलट रहा था। तभी रसोई से बर्तन पटकने की जोरदार आवाज आई। मैंने सोचा, गलती से गिर गया होगा।
कुछ देर बाद वह लौटा। चेहरे की हंसी गायब थी। माथे पर पसीना था। आवाज कांप रही थी। वह कॉलेज के पुराने किस्से याद करने की कोशिश कर रहा था, पर शब्द लड़खड़ा रहे थे। फिर वह फिर से अंदर गया।
और इस बार धमाका हुआ। रसोई से एक स्टील का जार लुढ़कता-घिसटता सीधा मेरे पैरों के पास आकर गिरा।
उस एक पल में तीन लोग एक साथ जाग गए – मेरे अंदर का प्रोफेसर, मेरे अंदर का दार्शनिक और मेरे अंदर का आम आदमी। मैं समझ गया। अगर मैं एक मिनट और रुका, तो अगला बर्तन मुझ पर या मेरे उस मासूम छात्र पर निशाना साध कर फेंका जाएगा।
आतिथ्य का ‘थिण्णई’ से ‘आर्मगेडन’ तक का सफर वहीं पूरा हो गया।
मैंने हाथ जोड़े, गेट से बाहर निकला, स्कूटर को किक मारी और वहां से निकल गया। मैंने अपनी गरिमा और उसके वैवाहिक जीवन, दोनों को बचा लिया।
सवाल हम सबसे
मित्रों, यह किस्सा हंसी के लिए नहीं है। यह आत्ममंथन के लिए है।
हम होंठों से कहते हैं – आइए, आइए। पर हमारी रसोई कहती है – क्यों आए? हम जुबान से चाय पूछते हैं, पर हमारे बर्तन सच बोल देते हैं।
हमने दीवारें ऊंची कर लीं, दिल छोटे कर लिए। गेट लगा लिए, पर दिल के दरवाजे बंद कर लिए।
दुनिया की सबसे ऊंची इमारतें बना लेंगे, पर अगर दिल में ‘थिण्णई’ नहीं बनाई, तो हम दुनिया के सबसे गरीब, सबसे असंवेदनशील लोग कहलाएंगे।
आइए, एक ‘थिण्णई’ फिर से बनाते हैं – ईंट और सीमेंट से नहीं, अपने हृदय में। जहां आज भी एक अजनबी के लिए थोड़ा पानी, थोड़ा प्यार और थोड़ी जगह बची रहे।
प्रो. डॉ. एस. एम. राजन, शिक्षाविद एवं आतिथ्य-दर्शन के अध्येता
स्पष्ट और बेबाक – संविधान में PM पद कभी खाली नहीं रह सकता, मोदी-विरोध में बेबुनियाद बयानबाजी और विदेशी शक्तियों की साजिश का विश्लेषण
महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना प्रमुख राज ठाकरे और शिवसेना (उबाठा) के स्वघोषित विश्व प्रवक्ता संजय राउत के दो बयान इन दिनों चर्चा में हैं। अलग-अलग लगने वाले इन बयानों का ध्वनित अर्थ एक ही है – मोदी-द्वेष से उपजी गैर-जिम्मेदार भविष्यवाणी।
राज ठाकरे का दावा – एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में राज ठाकरे ने कहा कि अगले दो-तीन महीनों में देश में ऐसी स्थिति आएगी कि प्रधानमंत्री ही नहीं होगा। राज ठाकरे की राजनीति हमेशा ‘तळ्यात-मळ्यात’ वाली रही है। कभी वे खुद को शरद पवार के कुनबे में छोड़ देते हैं, कभी मोदी से नजदीकी दिखती है। वर्षों झगड़ने के बाद अब सगे चचेरे भाई से हाथ मिला रहे हैं, कभी कांग्रेस के साथ समझौता तो कभी अभिजीत दीपके को सिर पर बिठाकर नाचना। कुल मिलाकर स्थिर भूमिका के अभाव वाले नेता।
उन्होंने यह भविष्यवाणी किस आधार पर की? क्या संविधान पढ़ा? प्रथा-परंपरा देखी?
हमारे देश में संविधान के अनुसार प्रधानमंत्री का पद कभी रिक्त नहीं रखा जा सकता। यदि मुख्यमंत्री इस्तीफा दे दे या निधन हो जाए और नया मुख्यमंत्री न बन सके तो राष्ट्रपति शासन लग सकता है। महापौर, नगराध्यक्ष, जिला परिषद अध्यक्ष या सरपंच न हो तो प्रशासक नियुक्त हो सकता है। लेकिन प्रधानमंत्री न हो तो राष्ट्रपति शासन लगाकर राष्ट्रपति शासन चलाएंगे, ऐसी व्यवस्था ही नहीं है।
इसीलिए किसी कारण प्रधानमंत्री इस्तीफा भी दे दे तो नया प्रधानमंत्री आने तक उसे कार्यवाहक प्रधानमंत्री के रूप में काम करना ही पड़ता है। राष्ट्रपति वैसी सूचना देते हैं। यदि पद पर रहते प्रधानमंत्री का निधन हो जाए तो नए कार्यवाहक प्रधानमंत्री की शपथ होने तक आधिकारिक तौर पर निधन की घोषणा भी नहीं की जाती।
मेरी याद के अनुसार 1964 में पंडित नेहरू के निधन पर गुलजारीलाल नंदा को कार्यवाहक PM की शपथ दिलाने के बाद ही निधन की घोषणा हुई थी। यही लालबहादुर शास्त्री के निधन पर भी हुआ। इंदिरा गांधी की गोली मारकर हत्या सुबह करीब 10 बजे हुई थी, एम्स ले जाते-ले जाते उनका निधन हो गया था, लेकिन पश्चिम बंगाल से राजीव गांधी के दिल्ली लौटकर कार्यवाहक PM की शपथ लेने तक सिर्फ “गोली लगी, एम्स में भर्ती” यही खबर रेडियो-टीवी पर चलती रही।
1979 में चौधरी चरण सिंह ने संसद भंग की थी, फिर भी राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी ने उन्हें नई सरकार तक कार्यवाहक रहने को कहा। यही चंद्रशेखर (1991), इंद्रकुमार गुजराल (1997) और अटल बिहारी वाजपेयी (1999) के मामले में हुआ। इसलिए “देश में प्रधानमंत्री ही नहीं होगा” यह दावा हास्यास्पद है। मान लो अगले चार महीने में गड़बड़ी हुई और मोदी को इस्तीफा देना भी पड़ा, तब भी नए PM तक उन्हें ही कार्यवाहक रहना पड़ेगा। यह संवैधानिक प्रावधान है। राज ठाकरे मन में आए वैसा बोल देते हैं, अक्सर बिना आधार के।
संजय राउत का भाकित – शिवसेना के दशहरा मेले में संजय राउत ने कहा कि अगले 3-4 महीने में देश में भारी गड़बड़ी होगी, नरेंद्र मोदी PM नहीं रहेंगे, सत्ता परिवर्तन होगा। अभिजीत दीपके के पहले आंदोलन के बाद से ही विपक्ष को सत्ता परिवर्तन के दिवास्वप्न दिखने लगे हैं।
वास्तव में मोदी और सहयोगी पिछले 12 साल से शासन चला रहे हैं, कई अच्छे काम किए हैं, इसलिए आम आदमी कहीं न कहीं उनके साथ दिखता है। 2024 में भाजपा को झटका लगा, 303 से 240 पर आ गई। तब विपक्ष सरकार बनाएगा क्या, भाजपा ने कुछ समय इंतजार किया, लेकिन विपक्ष की आपसी खींचतान देखकर कई छोटे दलों ने मोदी के नेतृत्व वाली सरकार के साथ ही रहने का फैसला किया। आज धीरे-धीरे भाजपा का समर्थन फिर बढ़ रहा है। कुछ दलों में टूट से सांसद भाजपा में आए हैं। अप्रैल 2026 में दो-तिहाई बहुमत के अभाव में खारिज हुआ महिला आरक्षण विधेयक अब फिर पारित कराने के लिए विशेष सत्र बुलाने की हलचल है।
विपक्ष किसी तरह मौजूदा सरकार को गिराना चाहता है। यह सिर्फ इच्छा नहीं, इसके पीछे विदेशी शक्तियों का साथ होने के पुख्ता सबूत मिलने की जानकारी है। पिछले 12 साल में मोदी नेतृत्व में देश की जो प्रगति हुई, वह बाहर के विकसित देशों को पच नहीं रही। इसलिए देश में अशांति फैलाकर सरकार गिराने के प्रयास हैं। अशांति फैलाने के लिए ही ऐसे आंदोलनों को स्पॉन्सर किया जाता है। नहीं तो विदेश में पढ़ाई छोड़कर अभिजीत दीपके को विशेष विमान से भारत लाना और आंदोलन का ढांचा खड़ा करने में मदद करना, इसका क्या अर्थ निकाला जाए? अभी मतदाता सूची पुनरीक्षण के मुद्दे पर भी आंदोलन भड़काया जा रहा है, पर उसमें आम आदमी कितना है, यह जांचना जरूरी है। आम आदमी को पहले रोजी-रोटी की चिंता है, वह ऐसे आंदोलन में कभी नहीं आएगा।
आज संजय राउत की बात को कोई गंभीरता से लेता है, ऐसा किसी को नहीं लगता। वे रोज सुबह मीडिया को बुलाकर अलग-अलग फोकनाड (शेखी) हांकते हैं। कुछ मराठी चैनलों को छोड़कर कोई गंभीरता से नहीं लेता। मराठी न्यूज चैनल पर उनका बोलना दिखता है तो आम आदमी टाइमपास के तौर पर देखता है। उनकी ज्यादातर कहानियां कपोल-कल्पित और सिर्फ मनोरंजक होती हैं, तथ्य कम।
आज विपक्ष ने कुछ आंदोलन खड़े करने की कोशिश जरूर की, हिंसा भड़काने के इरादे के संकेत भी मिले, लेकिन हिंसा अभी तक नहीं हुई और मोदी सरकार होने भी नहीं देगी, ऐसा आज का चित्र है। ऐसी स्थिति में अगले चार महीने में सरकार गिरने के क्या कारण होंगे, यह राउत को तथ्यों के साथ स्पष्ट करना चाहिए, हवाई बातों से नहीं। नहीं तो आम आदमी इसे “सुबह का भोंगा” समझकर अनदेखा कर देगा, जैसे मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस उन्हें “सुबह 9 बजे का भोंगा” कहते हैं।
कुल मिलाकर अगले कुछ महीनों में देश में अराजकता और सत्ता परिवर्तन होगा और कुछ महीने PM ही नहीं रहेगा, ऐसा चित्र आज तो नहीं दिखता। राज ठाकरे और संजय राउत को दिवास्वप्न आते हैं, यह मानसिक बीमारी भी हो सकती है। हो तो इलाज कराएं।
न्यायपालिका की गरिमा नोटिस से नहीं, निष्पक्ष, पारदर्शी और समयबद्ध न्याय से बचती है
नागपुर,18 अक्टूबर 2026 :
भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने राज्यसभा सांसद संजय राउत से उनके आचरण पर स्पष्टीकरण मांगा है। सवाल यह नहीं कि न्यायपालिका की आलोचना की कोई सीमा होनी चाहिए या नहीं। सवाल यह है कि क्या न्यायपालिका स्वयं अपने पिछले दस वर्षों के विवादास्पद घटनाक्रमों पर जनता के सवालों का संतोषजनक जवाब देने को तैयार है?
1. शिवसेना की फूट पर चार वर्षों से न्याय की प्रतीक्षा क्यों?
जून 2022 में महाराष्ट्र की निर्वाचित सरकार गिर गई। शिवसेना टूटी, पार्टी का नाम और चुनाव चिह्न विवाद में चले गए। मई 2023 में संविधान पीठ का महत्वपूर्ण फैसला आया, लेकिन दल-बदल, विधायकों की अयोग्यता और पार्टी की पहचान से जुड़े विवाद आज भी न्यायिक प्रक्रिया में हैं। जब चुनाव निकल जाते हैं, सरकारें अपना कार्यकाल पूरा करने लगती हैं और संवैधानिक विवाद लंबित रहते हैं, तब विलंब से मिलने वाले न्याय का लोकतंत्र के लिए क्या अर्थ रह जाता है?
2. वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल की निराशा क्या सामान्य घटना है?
राज्यसभा सांसद और वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने भी बार-बार न्यायालय जाने के बावजूद अपेक्षित राहत न मिलने पर सार्वजनिक निराशा व्यक्त की। बाद में उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के सकारात्मक हस्तक्षेप की सराहना भी की। लेकिन देश के अनुभवी संवैधानिक अधिवक्ता को न्यायिक प्रक्रिया की प्रभावशीलता पर चिंता व्यक्त करनी पड़े, तो उस चिंता को गंभीरता से लेना आवश्यक है।
3. न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के आवास पर नकदी मिलने का मामला!
मार्च 2025 में एक न्यायाधीश के सरकारी आवास पर आग लगने के बाद नकदी मिलने का मामला सामने आया। लेकिन प्रश्न आज भी महत्वपूर्ण है – न्यायाधीशों के विरुद्ध गंभीर आरोपों की जांच और सामान्य नागरिक के विरुद्ध आपराधिक जांच के मानदंडों में अंतर क्यों दिखाई देता है?
4. पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई और राज्यसभा की सदस्यता!
पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई के विरुद्ध 2019 में यौन उत्पीड़न के आरोप लगे थे। इसके बाद 2020 में सरकार द्वारा उन्हें राज्यसभा के लिए मनोनीत किया जाना एक बड़े सार्वजनिक विवाद का विषय बना। क्या संवैधानिक पदों से सेवानिवृत्ति के तुरंत बाद राजनीतिक नियुक्तियां न्यायपालिका की स्वतंत्रता के प्रति जनता के विश्वास को प्रभावित नहीं करतीं?
5. प्रधानमंत्री न्यायाधीश के घर जाएं तो मर्यादा, विपक्ष सवाल पूछे तो आचरण पर स्पष्टीकरण?
11 सितंबर 2024 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश डी. वाई. चंद्रचूड़ के निवास पर गणेश पूजा में शामिल हुए। इसकी तस्वीरें सार्वजनिक हुईं।
धार्मिक पूजा करना अपराध नहीं है। लेकिन न्यायपालिका और कार्यपालिका के शीर्ष पदाधिकारियों की सार्वजनिक निकटता पर निष्पक्षता और संस्थागत मर्यादा के प्रश्न उठना स्वाभाविक है। यदि प्रधानमंत्री के साथ सार्वजनिक मुलाकात को सामान्य माना जाता है, तो विपक्षी जनप्रतिनिधियों द्वारा मुख्य न्यायाधीश से मिलने की इच्छा पर भी समान संवैधानिक संवेदनशीलता दिखाई जानी चाहिए।
6. चुनाव आयोग पर गंभीर सवालों का जवाब कौन देगा?
मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण, मतदाताओं के नाम हटाए जाने के आरोपों और चुनाव आयोग की पारदर्शिता पर विपक्ष ने न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है। इन आरोपों की सत्यता का निर्णय न्यायालय को करना है। लेकिन लोकतंत्र की बुनियाद से जुड़े मामलों में शीघ्र और प्रभावी न्यायिक परीक्षण आवश्यक है।
मेरा सीधा सवाल मुख्य न्यायाधीश से!
माननीय मुख्य न्यायाधीश महोदय, न्यायपालिका की जवाबदेही, लंबित संवैधानिक विवादों और जनता के घटते विश्वास पर भी उतनी ही गंभीरता से विचार कीजिए। तथ्यपूर्ण, निर्भीक और लोकतांत्रिक आलोचना को दबाया भी नहीं जाना चाहिए।
न्यायपालिका संविधान की संरक्षक है, आलोचना से ऊपर कोई संस्था नहीं। न्यायालय का सम्मान आदेशों के भय से नहीं, न्याय की निष्पक्षता से पैदा होना चाहिए। मेरा आग्रह है कि न्यायपालिका अपनी संस्थागत जवाबदेही, पारदर्शिता और समयबद्ध न्याय की जिम्मेदारी को सर्वोच्च प्राथमिकता दे। लोकतंत्र में जनता अंतिम संप्रभु है। संविधान सर्वोपरि है। और न्यायपालिका की सबसे बड़ी शक्ति जनता का विश्वास है!
सोले की वापसी से कोहले का मार्ग हुआ सरल, पर उपेक्षा की पीड़ा का उत्तर अब भी अनुत्तरित
अंततः नागपुर विभाग स्नातक मतदारसंघ में भारतीय जनता पार्टी के विद्रोही उम्मीदवार प्रो. अनिल सोले ने मुख्यमंत्री की मध्यस्थता के बाद अपनी उम्मीदवारी वापस ले ली है। इससे अब पार्टी के अधिकृत उम्मीदवार सुधाकर कोहले की विजय का मार्ग अधिक सरल हो गया है।
परंतु फिर भी पार्टी में पुराने निष्ठावान कार्यकर्ताओं को दरकिनार किया जाता है, उन्हें विश्वास में नहीं लिया जाता और उन्हें सच में निष्प्राण कर दिया जाता है, इस बात को मुखर करने के लिए ही अपनी उम्मीदवारी थी, ऐसा कहने वाले अनिल सोले और उनके जैसे पार्टी के लिए घिसने वाले असंख्य कार्यकर्ताओं का पार्टी उचित सम्मान करेगी क्या और उनका उचित पुनर्वास होगा क्या, यह प्रश्न इस समय तक अनुत्तरित ही है।
नागपुर विभाग स्नातक मतदारसंघ महाराष्ट्र के गठन से अर्थात 1960 से पहले के भारतीय जनसंघ और अब की भारतीय जनता पार्टी के पास ही रहा था। परंतु 2020 में उम्मीदवार का चयन चूकने के कारण यह मतदारसंघ पहली बार कांग्रेस के हाथ में पहुंचा। उसका दर्द प्रत्येक पार्टी कार्यकर्ता के मन में था। इसलिए इस बार पार्टी उचित उम्मीदवार दे और संगठनात्मक तालमेल सुचारु रूप से हो, ऐसी पुराने कार्यकर्ताओं की मांग थी। परंतु पुरानों को कहीं भी विश्वास में न लेकर सुधाकर कोहले को उम्मीदवारी दी गई।
अनिल सोले अत्यंत युवा आयु से भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ता हैं। मूल रूप से वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कट्टर स्वयंसेवक भी हैं। 1992 में वे सर्वप्रथम नागपुर महानगरपालिका में नगरसेवक के रूप में विजयी हुए थे। तब से नगरसेवक, फिर विरोधी दल नेता, सत्ताधारी दल नेता और बाद में महापौर ऐसा महानगरपालिका में उनका प्रवास रहा। 2014 में इसी स्नातक मतदारसंघ से भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार के रूप में वे विजयी हुए थे। अपने छह वर्षों के काल में उन्होंने अनेक लोकउपयोगी कार्य किए और जनसंपर्क भी अच्छा बढ़ाया था। परिणामस्वरूप 2020 में भी उन्हें उम्मीदवारी मिलेगी ऐसी सभी को अपेक्षा थी।
परंतु 2020 में तत्कालीन विरोधी दल नेता देवेंद्र फडणवीस के अत्यंत निकटवर्ती माने जाने वाले पूर्व महापौर संदीप जोशी को अंतिम समय में उम्मीदवारी दी गई। संदीप जोशी की कोई तैयारी न होने के कारण पहली बार इस मतदारसंघ में कांग्रेस का उम्मीदवार विजयी हुआ। यह स्थान अपने हाथ से गया, इसका दर्द पार्टी नेताओं के मन में निश्चित ही था। इसलिए इस बार उचित रणनीति बनाई जाएगी ऐसी अपेक्षा थी।
अनिल सोले पार्टी में ज्येष्ठ कार्यकर्ता के रूप में जाने जाते हैं। वे उच्च शिक्षा विभूषित हैं। अनेक वर्ष एक महाविद्यालय में वे गणित के प्राध्यापक के रूप में कार्यरत थे। उसके अतिरिक्त सहकार क्षेत्र में भी उनका अच्छा कार्य है। शिक्षक सहकारी बैंक की जड़ण-घड़ण में उनका सिंह का हिस्सा रहा है और बैंक को आज की उन्नत अवस्था तक लाने में उनका मूल्यवान योगदान है। इसलिए संपूर्ण विदर्भ में उनका जनसंपर्क भी प्रबल है। एक अध्ययनशील और कर्मठ नेता के रूप में वे जाने जाते हैं। महाराष्ट्र के पार्टी नेता नितिन गडकरी के वे निकटवर्ती माने जाते हैं।
अनिल सोले और आज के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस नागपुर महानगरपालिका में एक साथ ही नगरसेवक बने। फडणवीस आयु में सोले से पूरे बारह वर्ष छोटे हैं। परंतु राजनीति के शतरंज पर कुछ मोहरे पीछे-आगे और आगे-पीछे किए गए और फडणवीस को शीघ्र अवसर मिलते गए। 1997 में 27 वर्ष की आयु में वे नागपुर नगर के महापौर बने। वर्षभर में ही नागपुर नगर में मेयर इन काउंसिल लागू हुआ। इसलिए मेयर इन काउंसिल के प्रथम महापौर अर्थात नागपुर के प्रथम मुख्यमंत्री भी वही थे। बाद में मेयर इन काउंसिल रद्द हुआ, यह भाग भिन्न है। परंतु 1999 में तुरंत उन्हें पश्चिम नागपुर से विधायक पद के लिए उम्मीदवारी भी दी गई। तब से प्रत्येक बार वे विधायक के रूप में निर्वाचित हो रहे हैं। यह उनकी छठी अवधि शुरू है।
इसके अतिरिक्त दल स्तर पर भी उन्हें विभिन्न पद दिए गए। स्मृति के अनुसार 2005 में वे भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश महामंत्री हुए थे। बाद में 2013 में वे प्रदेशाध्यक्ष भी हुए। 2019 में महाराष्ट्र में भारतीय जनता पार्टी के प्रथम मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेने का अवसर भी उन्हें मिला। बाद में विरोधी दल नेता, फिर उपमुख्यमंत्री और अब पुनः दूसरी बार मुख्यमंत्री के रूप में वे विराजमान हुए हैं।
उस तुलना में अनिल सोले को पूरे बीस वर्षों की प्रतीक्षा के बाद महापौर पद और एक बार ही विधायक पद मिला है। उनमें भी संगठन क्षमता होते हुए भी उन्हें दल में कोई पद नहीं दिया गया। 2012 से 2014 इस महापौर पद के काल में और बाद में 2014 से 2020 इस विधायक काल में उन्होंने अनेक लोकउपयोगी कार्य किए। फिर भी 2020 में दल ने उन्हें अंधेरे में डाल दिया। उन्हें अंधेरे में डालकर यदि यह स्थान दल संभाल सका होता तो उसका स्वागत भी होता। परंतु सोले को किनारे किया और वह स्थान दल ने हाथ से गंवा दिया। पिछले छह वर्ष सोले शांत थे। इस बार अपनी उम्मीदवारी मिलने पर वह स्थान निकालेंगे, ऐसा वचन उन्होंने दल के वरिष्ठों को दिया था, ऐसी जानकारी है। परंतु आंतरिक राजनीति के कारण इस मतदारसंघ में पूर्णतः नवीन सुधाकर कोहले को मैदान में लाया गया और सोले को पुनः किनारे किया गया। इसलिए सोले नाराज हुए और उन्होंने विद्रोह करने का निर्णय लिया। विशेष बात यह है कि उनके साथ इसी प्रकार दल में क्षमता होते हुए भी अनेक वर्ष उपेक्षित गिरीश व्यास भी अनिल सोले को समर्थन देते हुए मैदान में उतरे। उन्होंने अपने दल की प्राथमिक सदस्यता से ही त्यागपत्र दिया और सोले के प्रचार में लग गए। इस प्रकार के कारण सर्वत्र खलबली मच गई थी। अब पुनः एक बार भारतीय जनता पार्टी का यह स्थान संकट में आएगा, ऐसा बोला जाने लगा था।
नागपुर स्नातक मतदारसंघ में कांग्रेस के वर्तमान विधायक अभिजीत वंजारी और भारतीय जनता पार्टी के सुधाकर कोहले की ही टक्कर है। उसमें अनिल सोले ने विद्रोह करने के कारण पार्टी नेताओं के होश उड़ गए। सोले ने आवेदन भरने के बाद उन्होंने वापसी लेनी चाहिए, इसके लिए दल स्तर पर अनेक प्रयास हुए। दल के प्रदेशाध्यक्ष रवींद्र चव्हाण स्वयं सोले के घर गए। परंतु वे आने वाले हैं, यह जानकर सोले बाहर निकल गए और उनसे मिले ही नहीं। इसलिए चव्हाण को हाथ मलते हुए वापस लौटना पड़ा था। सोले ने इस काल में अपना मोबाइल भी बंद करके रखा था। इसलिए सभी के लिए वे संपर्क से बाहर हो गए थे। आवेदन वापसी की तिथि तक सोले किसी को नहीं मिले थे। आवेदन वापस लेने का समय समाप्त हुआ और उसी संध्या को उन्होंने गिरीश व्यास के बडकस चौक स्थित कार्यालय में अपना चुनाव प्रचार कार्यालय खोला। वहां पत्रकार वार्ता को भी उन्होंने संबोधित किया। उनके साथ दल के कुछ पुराने लोग और नितिन गडकरी के सांसद सांस्कृतिक महोत्सव समिति के अनेक दिग्गज पत्रकार वार्ता में उपस्थित थे। इसलिए पार्टी नेताओं के मुंह का पानी ही उड़ गया था। सुधाकर कोहले की तुलना में अनिल सोले ही योग्य माने गए हैं। उच्च शिक्षा विभूषित हैं। उनका संपूर्ण विदर्भ में व्यापक जनसंपर्क है। उन्होंने महापौर और विधायक के रूप में किए कार्य उनके श्रेय के रूप में हैं। उस तुलना में कोहले को नागपुर के अतिरिक्त कोई जानता भी नहीं है। इसलिए सोले वंजारी और कोहले दोनों को भी पराजित कर निर्वाचित हो सकते हैं, ऐसा बोला जाने लगा था।
इस बार किसी प्रकार स्नातक मतदारसंघ का यह स्थान भारतीय जनता पार्टी को पुनः प्राप्त करना है। इसके लिए कल मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने नागपुर विभाग के विधायक-सांसद और सभी प्रमुख नेताओं की एक बैठक ली। इस बैठक में सभी ने ही सोले की उम्मीदवारी से होने वाले संकट के बारे में चिंता व्यक्त की। इस टक्कर में कोहले तो पराजित होंगे ही, पर सोले निर्वाचित होने की संभावना भी अस्वीकार नहीं की जा सकती, यह चित्र मुख्यमंत्री के सामने रखा गया। सोले निर्वाचित हुए होते तो वे पार्टी के साथ ही गए होते। परंतु उन्हें बदलने का निर्णय मुख्यमंत्री का होने के कारण सोले का निर्वाचित होना निश्चित ही मुख्यमंत्री की पराजय माना गया होता। मिली जानकारी के अनुसार इससे पहले फडणवीस ने सोले से दूरभाष पर संपर्क करने का प्रयास किया था। परंतु उस समय सोले संपर्क से बाहर थे। कल सभी लोकप्रतिनिधियों से चर्चा करने के बाद फडणवीस को भी परिस्थिति की गंभीरता समझ आई और उन्होंने सोले को संदेश भेजा और सीधे सोले के लक्ष्मीनगर स्थित घर पर ही धावा बोल दिया। उनके साथ नागपुर के पालकमंत्री चंद्रशेखर बावनकुले, भारतीय जनता पार्टी के विदर्भ प्रदेश संगठन मंत्री डॉ. उपेंद्र कोठेकर, सहसंगठन मंत्री सतीश धोंड भी थे। लगभग आधा घंटा बंद द्वार चर्चा के बाद अपनी विनंती को मान देते हुए सोले ने उम्मीदवारी वापस लेकर दल के अधिकृत उम्मीदवार का प्रचार करने का मान्य किया है, ऐसा मुख्यमंत्री ने घोषित किया। सोले ने भी अपनी उम्मीदवारी वापस लेते हुए दल का ही प्रचार करेंगे, ऐसा माध्यमों के सामने घोषित किया। गिरीश व्यास ने भी अपना त्यागपत्र वापस लिया है और वे भी दल में सक्रिय रहेंगे, ऐसा भी घोषित किया गया। इसलिए मुख्यमंत्री सहित सभी ने ही राहत की सांस ली। अब आज सोले सुधाकर कोहले के प्रचार में कार्य में लग गए हैं, ऐसी जानकारी मिली है।
यहां जो कुछ हुआ, वह दल के भीतर की प्रतिस्पर्धा और राजनीति के कारण हुआ है, यह खुलकर बोला जाता है। अनिल सोले प्रारंभ से नितिन गडकरी के साथ एकनिष्ठ रहे हैं। फडणवीस प्रारंभ में गडकरी के साथ थे। परंतु 1990 के दशक में दल में गडकरी विरुद्ध मुंडे इस गुप्त संघर्ष में मुंडे और प्रमोद महाजन ने देवेंद्र फडणवीस का युवा आयु, उनकी बुद्धिमत्ता, अध्ययनशील प्रवृत्ति और व्यापक लोकसंग्रह इन गुणों को पहचाना और उन्हें शक्ति देकर आगे लाया। संक्षेप में मुंडे और महाजन ने नागपुर में नितिन गडकरी के लिए एक नया प्रतिस्पर्धी तैयार किया। मुंडे और महाजन के आधार पर फडणवीस धीरे-धीरे दल में महत्वपूर्ण पद पाते हुए प्रदेशाध्यक्ष होने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समीप कब और कैसे सरक गए, यह किसी को ज्ञात नहीं हुआ। इसलिए उनकी राजनीति में वजन अत्यधिक बढ़ा।
प्रारंभ से फडणवीस और सोले में गुप्त प्रतिस्पर्धा थी। संयोग से फडणवीस तेजी से आगे जाते समय सोले के कार्यों में जानबूझकर बाधाएं लाई जाती हैं, ऐसी नागरिकों में उस समय चर्चा थी। फडणवीस तेजी से आगे गए। परंतु सोले क्षमता होते हुए भी पीछे रह गए। 2020 में उन्हें पुनः अवसर मिलेगा, ऐसा लगा था। परंतु बाद के काल में दल ने उन्हें पूर्ण रूप से अंधेरे में डाल दिया। इसलिए उनका सात्विक क्रोध उमड़ आया था। इस बार अपनी उम्मीदवारी मिले, इसके लिए उन्होंने प्रयास किए थे। परंतु दल के वरिष्ठों ने ध्यान नहीं दिया। परिणामस्वरूप उन्हें विद्रोह करना पड़ा।
कल मुख्यमंत्री के साथ हुई चर्चा में दल के सभी पुराने कार्यकर्ताओं का उचित सम्मान रखा जाएगा, ऐसा वचन मुख्यमंत्री ने दिया है, ऐसी सूत्रों की जानकारी है। ऐसा हुआ तो वह उचित ही ठहरेगा।
2000 के बाद भारतीय जनता पार्टी जिस तेजी से बढ़ी, उसमें अन्य दलों से उनकी ओर आगमन बड़े प्रमाण में हुआ। यहीं वास्तविक संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हुई। जो वर्षानुवर्ष एकनिष्ठ रहकर दल में चटाई उठाने से लेकर झाडू लगाने तक सभी कार्य करते हुए बड़े हुए थे, उन्हें दरकिनार कर कल आए आगंतुकों को पलक-पांवड़े बिछाए जाने लगे। “पतिव्रता के गले में पत्थर, वेश्या को मणिहार” ऐसी स्थिति दल में आने लगी। कांग्रेस से आए चंद्रशेखर बावनकुले को उम्मीदवारी देने के लिए तीन पीढ़ियों से संघ से संबंधित छोटू भोयर को उम्मीदवारी अस्वीकार करने के कारण अंत में उन्हें कांग्रेस में जाना पड़ा। गिरीश व्यास जनसंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष पंडित बच्छराज व्यास के पुत्र हैं, परंतु उन्हें भी विधायक पद प्राप्त करने के लिए योग्य होते हुए भी दीर्घकाल संघर्ष करना पड़ा। नागपुर के ये कुछ प्रकार अन्यत्र भी अनेक प्रकार देखने को मिले। इसलिए ही दल में आंतरिक खलबली बड़े प्रमाण में थी। उसी का इस निमित्त से विस्फोट हुआ, ऐसा कहा जा सकता है।
विशेष रूप से नागपुर में नितिन गडकरी विरुद्ध देवेंद्र फडणवीस ऐसा गुप्त संघर्ष होने की जोरदार चर्चा हमेशा ही चलती रहती है। इसलिए ही फडणवीस का राज्य और देश की राजनीति में महत्व बढ़ने पर गडकरी की निकटता वाले कार्यकर्ताओं को वे दरकिनार करते हैं, ऐसा आरोप अनेक कार्यकर्ता चर्चा में करते हैं। इसलिए नागपुर में यह असंतोष है ही।
दूसरा यह है कि पहले पुराने जनसंघ में और बाद में भारतीय जनता पार्टी में सामूहिक नेतृत्व की संकल्पना को स्वीकार किया गया था। उसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पदाधिकारियों को भी चर्चा में भागीदार बनाया जाता था। परंतु अब वह पद्धति नष्ट कर दी गई है, ऐसी शिकायत कार्यकर्ता निजी तौर पर करते हैं। अब दल में पुनः एक बार सभी से चर्चा कर सभी सहमति से निर्णय लिए जाएंगे और पुरानों को भी सम्मान दिया जाएगा, साथ ही उनका उचित पुनर्वास किया जाएगा, ऐसा वचन फडणवीस, बावनकुले, कोठेकर और धोंड ने दिया है, ऐसी सूत्रों की जानकारी है।
यदि ऐसा होने वाला है तो उसका स्वागत ही होना चाहिए। भारतीय जनता पार्टी एक कार्यकर्ता आधारित दल है। यहां वंशवाद या एकतंत्र नहीं चलता, ऐसा बोला जाता है। परंतु मध्य काल में जो कुछ समझ-गलतफहमी हुई, उसके कारण यह विद्रोह की बारी आई। ऐसे ही प्रकार हाल ही में हुई स्थानीय स्वशासन संस्था चुनावों में भी बड़े प्रमाण में हुए थे। परिणामस्वरूप कुछ पुराने संघ स्वयंसेवकों ने मतदान पर ही बहिष्कार करने का निर्णय लिया था, ऐसा भी बोला जाता था। वह रुककर अब सर्वसमावेशक नीति अपनाकर सभी को विश्वास में लेकर पुरानों का उचित सम्मान कर उन्हें अंधेरे से बाहर निकालकर उचित स्थान दिया जाएगा, तो भारतीय जनता पार्टी को और गति से आगे बढ़ाया जा सकेगा। 2047 में देश को वैश्विक महासत्ता बनाने का मोदी जी का जो स्वप्न है, उस दृष्टि से भारतीय जनता पार्टी वाटचाल कर सकेगी, यह निश्चित है।