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सूखा प्रभावित किसानों को ₹1 लाख प्रति हेक्टेयर मुआवजा और बच्चों की पूरी फीस माफ करे सरकार – संजय अग्रवाल

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  • सामाजिक कार्यकर्ता ने मुख्यमंत्री फडणवीस को लिखा पत्र, 304 तालुकों में सूखे से 85% क्षेत्र प्रभावित

नागपुर :

सामाजिक कार्यकर्ता संजय अग्रवाल ने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को पत्र लिखकर वर्ष 2026 के खरीफ मौसम के दौरान अपर्याप्त वर्षा और लंबे समय तक बारिश न होने से उत्पन्न गंभीर सूखे की स्थिति को देखते हुए सूखा प्रभावित किसानों को ₹1,00,000 प्रति हेक्टेयर विशेष राहत सहायता देने तथा उनके बच्चों की एक शैक्षणिक वर्ष की संपूर्ण स्कूल एवं कॉलेज फीस माफ करने की मांग की है।

सूखे की भयावह स्थिति

अग्रवाल ने कहा कि उपलब्ध समाचार रिपोर्टों और सरकारी घोषणाओं के अनुसार, सितंबर 2026 के अंत तक राज्य के 358 तालुकों में से 265 तालुकों को सूखा प्रभावित घोषित किया गया था। अक्टूबर के मध्य तक यह संख्या बढ़कर लगभग 304-305 तालुकों तक पहुंचने की खबरें सामने आईं हैं। राज्य के लगभग 85 प्रतिशत क्षेत्र में सूखे की स्थिति से किसानों, खेतिहर मजदूरों, ग्रामीण परिवारों और कृषि पर निर्भर छोटे व्यवसायों पर गंभीर आर्थिक संकट उत्पन्न हो गया है।

जून से 18 सितंबर 2026 के बीच राज्य में सामान्य से लगभग 18.8 प्रतिशत कम वर्षा दर्ज की गई है। मराठवाड़ा, विदर्भ, नासिक क्षेत्र और अन्य वर्षा-अभाव वाले इलाकों में सोयाबीन, कपास, धान, मक्का तथा अन्य खरीफ फसलों को भारी नुकसान पहुंचा है। कोंकण क्षेत्र में धान की खेती भी प्रभावित हुई है। कम वर्षा के कारण भूजल स्तर में गिरावट, पेयजल संकट, पशुओं के लिए चारे और पानी की कमी तथा किसानों पर बढ़ते आर्थिक बोझ की स्थिति गंभीर होती जा रही है।

सरकारी उपाय स्वागतयोग्य, पर पर्याप्त नहीं

प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है कि राज्य सरकार द्वारा घोषित राहत उपाय – दिवाली से पहले ₹5,000 की अग्रिम सहायता, कृषि ऋणों का पुनर्गठन, ऋण वसूली स्थगित करना, भूमि राजस्व में छूट, कृषि पंपों के बिजली बिलों में राहत, विद्यार्थियों के परीक्षा शुल्क में छूट, पेयजल टैंकरों की व्यवस्था तथा पशुओं के लिए चारे और पानी की उपलब्धता – स्वागत योग्य हैं। हालांकि, किसानों की वास्तविक जरूरतों को देखते हुए इन उपायों के साथ पर्याप्त प्रत्यक्ष आर्थिक सहायता और शिक्षा संबंधी अतिरिक्त राहत देना आवश्यक है।

मुख्य मांगें

आर्थिक सहायता के लिए :

  • सूखा प्रभावित और फसल क्षति प्रमाणित किसानों को ₹1,00,000 प्रति हेक्टेयर विशेष राहत सहायता दी जाए।
  • सहायता राशि सीधे किसानों के बैंक खातों में समयबद्ध तरीके से जमा की जाए।
  • फसल क्षति के पंचनामे शीघ्र पूरे कर राहत वितरण में प्रशासनिक विलंब न किया जाए।
  • छोटे और सीमांत किसानों, बटाईदारों तथा अन्य पात्र खेती करने वाले परिवारों को भी राहत का लाभ दिया जाए।
  • गंभीर फसल क्षति वाले उन गांवों और राजस्व मंडलों को भी राहत दी जाए, जो प्रारंभिक सरकारी सूची में शामिल नहीं हो पाए हैं।

शिक्षा राहत के लिए :

  • सूखा प्रभावित क्षेत्रों के पात्र किसानों के बच्चों की एक शैक्षणिक वर्ष की संपूर्ण स्कूल एवं कॉलेज फीस 100 प्रतिशत माफ की जाए।
  • सरकारी, सहायता प्राप्त और नियमानुसार पात्र निजी शिक्षण संस्थानों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों को इस सुविधा में शामिल किया जाए।
  • ट्यूशन फीस, अनिवार्य शैक्षणिक शुल्क, परीक्षा शुल्क तथा अन्य पात्र फीस को राहत में शामिल किया जाए।
  • आईटीआई, पॉलिटेक्निक, स्नातक, स्नातकोत्तर और व्यावसायिक पाठ्यक्रमों के पात्र विद्यार्थियों को भी योजना का लाभ दिया जाए।
  • पहले से वसूली गई फीस की प्रतिपूर्ति अथवा अगली फीस में समायोजन की व्यवस्था की जाए।

अन्य मांगें

इसके अतिरिक्त, फसल बीमा दावों का शीघ्र निपटारा, कृषि ऋणों पर ब्याज राहत, पेयजल और पशुचारे की नियमित व्यवस्था, रोजगार गारंटी के कार्यों को प्राथमिकता, रबी की बुवाई के लिए बीज और खाद पर अतिरिक्त सहायता तथा पारदर्शी एवं समयबद्ध फसल क्षति सर्वेक्षण की मांग भी की गई है।

वक्तव्य में कहा गया कि ऋण पुनर्गठन या वसूली स्थगित करना उपयोगी है, लेकिन इससे किसानों की तत्काल नकदी की आवश्यकता पूरी नहीं होती। किसान को वर्तमान फसल की हानि के साथ-साथ अगली फसल के बीज, खाद, मजदूरी और अन्य कृषि खर्चों की भी व्यवस्था करनी होती है। इसलिए ₹1,00,000 प्रति हेक्टेयर की विशेष सहायता किसानों को महंगे निजी कर्ज से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

सूखे का सबसे गंभीर और दीर्घकालीन प्रभाव किसानों के बच्चों की शिक्षा पर पड़ता है। आर्थिक संकट के कारण स्कूल और कॉलेज की फीस, परिवहन, पुस्तकें, वर्दी, छात्रावास तथा अन्य शैक्षणिक खर्च उठाना कठिन हो जाता है। किसी भी विद्यार्थी की पढ़ाई आर्थिक कठिनाई के कारण बाधित नहीं होनी चाहिए।

संजय अग्रवाल ने मुख्यमंत्री से अपील की है कि वे किसानों और ग्रामीण विद्यार्थियों के हित में शीघ्र सकारात्मक निर्णय लें तथा राहत पैकेज की स्पष्ट समयसीमा घोषित कर सहायता राशि, फसल बीमा भुगतान, पेयजल, पशुचारा और शिक्षा शुल्क माफी की प्रगति की नियमित समीक्षा सुनिश्चित करें।

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संघ की राजधानी में निष्ठा का क्रय-विक्रय और सत्ता का अहंकार

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  • अनिल सोले की वापसी फडणवीस शासन के अंत की सूचना है या केवल अस्थायी समझौता

नागपुर,13 अक्टूबर 2026 :

नागपुर के राजनीतिक इतिहास में पिछले चार दिनों में घटा नाटक केवल विधान परिषद के एक उम्मीदवार चयन की कथा नहीं है। यह महाराष्ट्र की भारतीय जनता पार्टी के चरित्र का पतन है, निष्ठावान कार्यकर्ताओं का गला घोंटने की क्रूर कथा है और मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के असीमित, बेलगाम और एकतंत्रीय केंद्रीकरण की ज्वलंत साक्षी है।

मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को स्वयं प्राध्यापक अनिल सोले के द्वार पर जाना पड़ा। चर्चा हुई। सोले ने विद्रोह वापस लिया। गिरीश व्यास ने त्यागपत्र वापस लिया। अब फडणवीस के प्रशंसक उनकी चतुराई के खोखले ढोल बजाएंगे। फडणवीस ने विद्रोह तोड़ दिया, ऐसी प्रशंसा की बातें फैलाई जाएंगी। पर मेरा प्रश्न भिन्न और अधिक चुभने वाला है।

देवेंद्र जी, विद्रोही को अस्थायी रूप से शांत कर दिया, पर विद्रोह को जन्म देने वाली आपकी एकतंत्रीय, दमनकारी और एकाधिकारवादी कार्यपद्धति कब बदलेंगे ?

जिस दल में कभी मतदान केंद्र का कार्यकर्ता सीधे वरिष्ठों से प्रश्न पूछता था, उसी दल में आज एक ज्येष्ठ, तपस्वी नेता को सुनने के लिए राज्य के मुख्यमंत्री को उसके घर पर झुकना पड़ता है, यह आंतरिक लोकतंत्र की करुणा नहीं, बल्कि उसकी समाधि पर अंतिम पत्थर है।

प्राध्यापक अनिल सोले ने केवल टिकट अस्वीकार किए जाने के कारण विद्रोह नहीं किया। उन्होंने आपकी बंद द्वारों के पीछे उम्मीदवार चयन की गुप्त योजना, पुराने निष्ठावानों को कचरे के समान फेंक देने की आपकी प्रवृत्ति और दल में लोकतंत्र का गला घोंटने की आपकी एकतंत्रीय शैली पर विस्फोट किया है।

उनके इस सत्य के संघर्ष का साथ देते हुए गिरीश व्यास ने दल से त्यागपत्र फेंक दिया। सैकड़ों पदाधिकारी और संघ परिवार से रक्त के संबंध से जुड़े कार्यकर्ता सोले के पीछे दृढ़ता से खड़े हुए। यह असंतोष का विस्फोट था।

यह दो व्यक्तियों की नाराजगी नहीं थी। यह फडणवीस शासन के विरुद्ध संघ की राजधानी से उठा विद्रोह का प्रथम रणभेरी नाद था।

मोहन भागवत जी से सीधा प्रश्न

आदरणीय पूज्य मोहन भागवत जी, संघ की राजधानी में यह कौन सा तमाशा चल रहा है ?

मेरा जन्म ऐसे घर में हुआ जहां सत्ता की कुर्सी नहीं थी, कोष में धन नहीं था, पर हृदय में विचारों के प्रति इस्पात की निष्ठा थी। मेरे पिता स्वर्गीय पंडित जमुनाशंकर उर्फ भय्याजी तिवारी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्णकालिक प्रचारक थे। उन्होंने पांढरकवडा क्षेत्र में जनसंघ का प्रथम दीपक जलाया। पश्चिम विदर्भ की मिट्टी में संगठन का पौधा लगाने के लिए उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन समर्पित किया। आपातकाल की अंधेरी कोठरी में कारावास भोगा।

उनकी पीढ़ी ने जनसंघ के लिए घर-बार छोड़ा, संसार को राख कर दिया, दरिद्रता के दंश सहे। उनकी आंखों के सामने मुख्यमंत्री पद नहीं था, देशहित और विचारनिष्ठा थी। आज उस त्याग की स्मृति आती है तो हृदय चीर जाता है। सहस्रों अनाम स्वयंसेवकों ने इसी एकतंत्र के लिए, इसी चापलूसी के दरबार के लिए अपना जीवन समर्पित किया था क्या ?

और इसलिए मेरा सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत से सीधा और सार्वजनिक प्रश्न है। आपके संघ का मुख्यालय नागपुर में है। उसी नागपुर में संघ की भट्टी में ढले अनिल सोले और गिरीश व्यास आपकी विचारधारा पर बढ़ी भारतीय जनता पार्टी की एकतंत्रीय कार्यपद्धति के विरुद्ध विद्रोह का ध्वज फहराते हैं।

संघ की दृष्टि से यह केवल भारतीय जनता पार्टी का आंतरिक विषय मानकर अनदेखा करने जितना क्षुद्र विषय है क्या? संघ ने भारतीय जनता पार्टी के प्रत्येक राजनीतिक निर्णय में हस्तक्षेप करना चाहिए, ऐसा मेरा बिल्कुल कहना नहीं है। पर जब संघ के संस्कार में ढले निष्ठावानों को पशु के समान हांका जा रहा हो, तब संघ के मूल्यों की चिता जल रही हो तो संघ को मौन का नाटक करना चाहिए क्या ?

आदरणीय पूज्य मोहन भागवत जी, इस फडणवीस शासन ने लाई हुई व्यक्तिपूजा, बेधुंध धनशक्ति, सत्ता का माज गया अहंकार और आंतरिक लोकतंत्र की हुई हत्या पर संघ का नैतिक मार्गदर्शन कहां है ? क्यों है यह भयानक मौन ? आप इस पर सार्वजनिक रूप से मुख खोलेंगे या नागपुर के सत्ता के दरबार के सामने संघ भी नतमस्तक हो गया है, ऐसी चर्चा अब संघ परिवार में शुरू हो गई है।

इस विद्रोह पर आपकी स्पष्ट सार्वजनिक प्रतिक्रिया अभी तक नहीं आई है, इसलिए यह प्रश्न अधिक ज्वलंत और गंभीर बन गया है।

मैं फडणवीस पीड़ित हूं

देवेंद्र फडणवीस के साथ सत्ता में कार्य करने के कारण मेरे प्रश्न अधिक धारदार हैं। मैं केवल बाहर से शोर मचाने वाला राजनीतिक टीकाकार नहीं हूं। देवेंद्र फडणवीस मुख्यमंत्री थे तब मैं वसंतराव नाईक किसान स्वावलंबन मिशन का अध्यक्ष के रूप में राज्य मंत्री पद के दर्जे से कार्य कर चुका हूं।

किसान आत्महत्या, कृषि ऋण का फंदा, ग्रामीण दरिद्रता और विदर्भ के उजड़े परिवारों की वेदना समीप से देखी है। शासन की निर्णय प्रक्रिया कैसे एक व्यक्ति के संकेत पर चलती है, इसका मुझे भीतर से अनुभव है। इसलिए आज का प्रश्न मुझे अधिक बेचैन करता है।

किसान की चीख सुनने के लिए आपके पास समय नहीं है और सत्ता के दलालों के लिए आपके द्वार 24 घंटे खुले हैं, ऐसी ही क्या आपकी व्यवस्था है ? आज महाराष्ट्र की सत्ता के घेरे में ठेकेदार, मध्यस्थ, प्रतिशतवीर, राजनीतिक दलाल और अदानी जैसे चुनिंदा उद्योग समूहों की धृष्टता बढ़ रही है, यह खुली चर्चा है।

अदानी समूह को मिलने वाले सरकारी प्रकल्प, सार्वजनिक संपत्तियों का बंटवारा, बिजली क्षेत्र के संदिग्ध व्यवहार और सहस्रों करोड़ की निविदाओं की न्यायालयीन निगरानी में स्वतंत्र जांच होनी ही चाहिए, यह मेरी दृढ़ मांग है।

उसी प्रकार विश्वास पाठक ने सौर ऊर्जा विकास करते हुए अपना सहस्रों करोड़ रुपये का विकास किया और उसके बिजली भवन के प्रसंग, इन सबकी पूर्ण जानकारी होते हुए भी ऐसे विवादास्पद व्यक्ति को आप भारतीय जनता पार्टी का प्रवक्ता बनाते हैं और सार्वजनिक संस्थाओं में निदेशक बैठाकर विजय राठौड़ कथा सहित हितों का जो खुला टकराव पैदा किया जा रहा है, उसमें स्वायत्तता और पारदर्शिता के नियम पैरों तले कुचले जा रहे हैं क्या, यह जनता के सामने आना चाहिए। धन लेकर कार्य करने वाली उपद्रवी अंजली दमानिया जैसे आरोप लगाने वाली कार्यकर्ता को आप हमेशा संरक्षण और विशेष व्यवहार देते हैं। उनके विवादास्पद पति को आपने महाराष्ट्र सरकार का सलाहकार नियुक्त किया है और अंजली दमानिया जी लगातार सभी दलों के उद्योग क्षेत्र के नेताओं पर पहले गंभीर आरोप करती हैं और बाद में शांत हो जाती हैं, इसे अब देवेंद्र-अंजली दमानिया गठजोड़ की ओर भारतीय जनता पार्टी के नेता और सांसद-विधायक शंका से देखते हैं। चुनिंदा लोगों को निशाना बनाना और फडणवीस के निकटवर्ती घेरे पर मौन रखना यह दोहरापन अब सभी को समझ आ गया है। मगर किसके आरोप सही हैं, किसके हितसंबंध क्या हैं और किसको किसका राजनीतिक लाभ होता है, यह प्रमाणों की कसौटी पर जांचा ही जाना चाहिए।

देवेंद्र जी, आपको निष्ठावान कार्यकर्ताओं से अधिक आपके चरणों में लोटने वाली, आपकी स्तुति करने वाली और सत्ता के टुकड़े पर जीने वाली चापलूस मंडली ही अधिक प्रिय हो गई है क्या ? यह प्रश्न केवल मेरा नहीं है, यह भावना आज भारतीय जनता पार्टी के प्रत्येक पुराने कार्यकर्ता के मन में चुभ रही है। इसकी संपूर्ण जिम्मेदारी आपके एकाधिकारवादी नेतृत्व की है।

तेरह वर्षों में भारतीय जनता पार्टी का चेहरा कितना विकृत हुआ

2014 के बाद महाराष्ट्र भारतीय जनता पार्टी में सत्ता का विकृत केंद्रीकरण हुआ। एक ही व्यक्ति के हाथ में सभी सूत्र आ गए। एकनाथ खडसे को समाप्त किया गया, उन्हें खुली आलोचना करने के लिए बाध्य किया गया। पंकजा मुंडे को दरकिनार कर उनकी अस्मिता पर घाव लगाया गया। प्रकाश मेहता जैसे पुराने योद्धाओं को अपमानजनक व्यवहार देकर राजनीतिक वनवास में भेजा गया।

प्रत्येक घटना के कारण भिन्न बताए जाएंगे। पर इस श्रृंखला का अर्थ एक ही है। महाराष्ट्र भारतीय जनता पार्टी में फडणवीस के मत के विरुद्ध बोलने वालों के लिए सम्मान की नहीं, बल्कि निष्कासन की ही जगह बची है क्या ? राष्ट्रीय भारतीय जनता पार्टी के नेता सांसद नितिन गडकरी की संगठनात्मक परंपरा में ढले पुराने कार्यकर्ताओं का स्थान क्या है ? उन्हें समाप्त करने का यह षड्यंत्र है क्या ?

सुधीर मुनगंटीवार, माधव भंडारी, केशव उपाध्ये, विनोद तावडे, राजाभाऊ ठाकरे, उपेंद्र कोठेकर, प्राध्यापक श्रीकांत देशपांडे, किरण पातूरकर जैसे विभिन्न पीढ़ियों के निष्ठावानों के योगदान का माप किस तराजू में होता है ? चापलूसी के तराजू में ?

इन सभी ने विद्रोह किया है, ऐसा मैं नहीं कहता। पर उनके अनुभव को, उनकी स्वतंत्र वाणी को इस एकतंत्र में स्थान है क्या, यह प्रश्न पूछना ही पड़ेगा। भारतीय जनता पार्टी की पहचान कार्यकर्ताओं का दल ऐसी थी। आज वह केवल एक व्यक्ति के अहंकार के चारों ओर घूमने वाला चापलूसों का दरबार बन गया है क्या ? नागपुर में स्वयं मुख्यमंत्री बनकर आप समझौते की मध्यस्थता करते हैं। प्रत्येक प्रकरण भिन्न होगा। पर दल अनुशासन मापने के दो भिन्न-भिन्न मापदंड क्यों ? आपकी इच्छा के लोगों के लिए एक न्याय और शेष के लिए दूसरा न्याय ?

और सबसे बड़ा प्रश्न, अनिल सोले को समझाने के लिए आपको स्वयं जाना पड़ा, इसका अर्थ उनकी नाराजगी सही थी, उनका आक्रोश उचित था, यह आपने ही स्वीकार किया क्या? अगर सोले के प्रश्न उचित थे, तो वे प्रश्न उत्पन्न होने से पहले उन्हें विश्वास में क्यों नहीं लिया ? यही क्या आपकी कार्यपद्धति है ? पहले अपमान करना और बाद में मनाने का नाटक करना ?

महाराष्ट्र में शाहशाही या संगठनात्मक लोकतंत्र ? नरेंद्र मोदी और अमित शाह के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी ने चुनाव जीते, यह सत्य है। पर चुनाव जीतना मतलब दल का लोकतंत्र जीवित रखना नहीं है। मेरे स्पष्ट राजनीतिक अवलोकन के अनुसार महाराष्ट्र में देवेंद्र फडणवीस की नेतृत्व शैली पर दिल्ली की एकतंत्रीय राजनीति का पक्का ठप्पा लगा है। सभी राजनीतिक निर्णय केवल दो-चार व्यक्तियों के बंद कक्ष में हो रहे हों तो ग्राम स्तर के कार्यकर्ता की चीख दिल्ली तक कैसे पहुंचेगी ?

संगठन में विचारों का अनुशासन चाहिए या एक व्यक्ति के सामने की दासता ?

भारतीय जनता पार्टी में आज भी लाखों ईमानदार कार्यकर्ता हैं। वे सभी नाराज हैं, ऐसा मैं नहीं कहूंगा। पर उनके मन की बेचैनी की वाणी को अगर आप विद्रोह कहकर कुचलेंगे तो भविष्य में उसका विस्फोट हुए बिना नहीं रहेगा।

तरुण पीढ़ी को आप कौन सा आदर्श दे रहे हैं? महाराष्ट्र का बेरोजगार युवा नौकरी के लिए भटक रहा है। किसान ऋण के फंदे पर लटक रहा है। ग्रामीण परिवार महंगाई की खाई में धकेले जा रहे हैं। और दूसरी ओर आपकी राजनीति में भारी धन का खेल, संपत्ति का घिनौना प्रदर्शन, चुनाव में धनशक्ति का नंगा नाच और सत्ता का दुरुपयोग इस पर गंभीर प्रश्न खड़े हो रहे हैं।

राजनेताओं और उनके निकटवर्तियों की बेतहाशा संपत्ति में हुई वृद्धि की कानूनी, पारदर्शी और न्यायालयीन जांच होनी ही चाहिए। सरकारी ठेके और राजनीतिक चंदे के काले संबंध जनता के सामने आने चाहिए। क्योंकि युवा पीढ़ी पूछ रही है, सामान्य कार्यकर्ता ने जीवनभर ध्वज ढोना है और सत्ता आने पर कुछ चुनिंदा चापलूस और ठेकेदारों ने ही उसकी लूट करनी है, यही क्या आपकी भारतीय जनता पार्टी का नया अर्थ है ?

आदरणीय प्राध्यापक अनिल जी,
आपने वापसी ली, पर फडणवीस शासन के मुख पर प्रहार किया है। मैंने 8 अक्टूबर को आपको संयम की सलाह दी थी। आज आपने विद्रोह वापस लिया, उसका मैं स्वागत करता हूं। परंतु आपके चार दिन के रणसंग्राम ने फडणवीस की एकतंत्र का नकाब फाड़ दिया है और दल में कार्यकर्ताओं के सम्मान का प्रश्न देश के सामने ला दिया है। आप और गिरीश व्यास ने उठाए प्रश्नों के उत्तर केवल मुख्यमंत्री की एक भेंट से नहीं मिलेंगे।

आदरणीय देवेंद्र जी,
आपने अनिल सोले जी की नाराजगी अस्थायी रूप से शांत की होगी। पर दल में विश्वास का जो धागा आपने तोड़ा, उसे फिर जोड़ने के लिए आपकी यह दिखावटी मध्यस्थता पर्याप्त नहीं है। इसके लिए अहंकार के स्थान पर संवाद की, एकाधिकारशाही के स्थान पर लोकतंत्र की और चापलूसी के स्थान पर निष्ठा को सम्मान देने की सच्ची साहस दिखानी होगी। क्योंकि संगठन की शक्ति मुख्यमंत्री के वर्षा निवास में नहीं होती। वह उस अनाम कार्यकर्ता के रक्त में होती है, जिसने जीवनभर किसी पद की अपेक्षा किए बिना दल का ध्वज कंधे पर ढोया।

मेरे पिता की पीढ़ी ने जनसंघ खड़ा करते हुए सत्ता नहीं देखी, उन्होंने विचार देखा। आज आपके पास सत्ता है, धन है, प्रचार यंत्रणा है, बड़े-बड़े प्रशंसक हैं। पर उस पुराने कार्यकर्ता के मन में विश्वास आपने जीवित रखा है क्या या उसे भी अपने अहंकार के नीचे कुचल दिया है ?

यह प्रश्न भारतीय जनता पार्टी से पूछना ही पड़ेगा। और सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत से भी पूछना ही पड़ेगा।

आदरणीय भागवत जी, जनसंघ के त्याग से खड़े हुए दल में निष्ठावान कार्यकर्ता को अपना सम्मान बचाने के लिए विद्रोह करना पड़ता है, यह संघ के संस्कारों की विजय कहें या आपके मौन की पराजय ?

अंत में देवेंद्र फडणवीस से यही कहना है, सत्ता के बल पर विरोधियों को हराया जा सकता है, विद्रोहियों को अस्थायी रूप से शांत कराया जा सकता है, पर कार्यकर्ताओं के मन में आपके प्रति उत्पन्न हुआ अविश्वास और क्रोध किसी भी राजनीतिक मध्यस्थता से एक रात में मिटाया नहीं जा सकता।

अनिल सोले की वापसी संघर्ष का अंत होगी या महाराष्ट्र भारतीय जनता पार्टी में फडणवीस शासन के विरुद्ध महासंग्राम की शुरुआत, यह आने वाला समय तय करेगा। आज नागपुर में दिख रही शांति समाधान की नहीं, बल्कि तूफान से पहले की भयानक शांति है।

किशोर तिवारी
स्व. पंडित भय्याजी तिवारी के पुत्र
पूर्व अध्यक्ष, वसंतराव नाईक किसान स्वावलंबन मिशन (राज्यमंत्री पद दर्जा)
एक देवेंद्र फडणवीसपीड़ित

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शासन की दूरदृष्टि से सूखे में मिली राहत

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  • मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व में जल संरक्षण, चारा बैंक और किसान सहायता पर जोर, विदर्भ के लिए दूरगामी योजना

अल नीनो के कारण इस वर्ष सूखे का साया नहीं, बल्कि राज्य के कई जिलों में सूखा आकर ठहर गया है। फसल हाथ आने के समय धूप से सूख गई फसलों के पंचनामे शुरू हैं। सामान्यतः इस समय हरी-भरी दिखने वाली खेतें सूखे के कारण काली-पीली दिखने लगी हैं। वातावरण में बदलाव के कारण पैदा हुई सूखे की स्थिति किसानों की आंखों में पानी लाने वाली है, लेकिन उसी समय इस सूखे पर पूरी ताकत से विजय पाने का राज्य शासन का संकल्प राहत देने वाला है। ऐसे संकटों पर विजय पाने के लिए दूरदृष्टि होनी चाहिए। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व वाली महाराष्ट्र सरकार ने यही दूरदृष्टि दिखाकर जो उपाययोजनाएं की हैं, उन्हें अनदेखा नहीं किया जा सकता।

नागपुर और अमरावती विभाग में कपास, सोयाबीन, तूर, धान और अन्य फसलों पर ग्रामीण अर्थव्यवस्था बड़े पैमाने पर निर्भर है। हालांकि, अनियमित वर्षा, वर्षा में अंतराल, भूजल स्तर में गिरावट और सिंचाई की सीमित सुविधाओं के कारण विदर्भ के कई क्षेत्रों को बार-बार पानी की कमी और सूखे जैसी स्थिति का सामना करना पड़ता है। इसलिए सूखा निवारण केवल पानी की आपूर्ति का प्रश्न नहीं है, बल्कि खेती, रोजगार, पशुधन और ग्रामीण जनजीवन से जुड़ा महत्वपूर्ण विषय है।

‘जलयुक्त शिवार’ से जल संरक्षण

सूखे पर दीर्घकालिक उपाय के रूप में महाराष्ट्र शासन ने जलयुक्त शिवार अभियान चलाया। इस अभियान के तहत नालों का गहरीकरण और चौड़ीकरण, सीमेंट नाला बांध, मिट्टी के बांध, खेत तालाब और वर्षा का पानी रोकने के लिए विभिन्न कार्य किए गए। आगे जलयुक्त शिवार अभियान 2.0 शुरू किया गया। इस चरण में जल संरक्षण के कार्यों के साथ जल साक्षरता और उपलब्ध भूजल के स्थायी उपयोग पर भी जोर दिया गया। विदर्भ के वर्षा पर निर्भर गांवों के लिए ये उपाययोजनाएं महत्वपूर्ण हैं। प्रत्येक कार्य से कितना पानी रुका, भूजल स्तर में कितना सुधार हुआ और कितने किसानों को सिंचाई का लाभ मिला, इसका मूल्यांकन भी सरकार कर रही है।

धरणों, तालाबों और बांधों में वर्षों से जमा गाद पानी भंडारण क्षमता पर प्रभाव डालती है। इस क्षमता को फिर से बढ़ाने के लिए राज्य में ‘गाद मुक्त धरण और गाद युक्त शिवार’ योजना चलाई जा रही है। जलाशयों से गाद निकालकर उसे खेत में उपयोग करने से पानी भंडारण क्षमता बहाल करने के साथ भूमि की उत्पादकता भी बढ़ सकती है। इसी दृष्टि से शासन परियोजना चला रहा है। नहरों की मरम्मत, अधूरी सिंचाई योजनाओं की पूर्ति, खेत तक पानी पहुंचाने की व्यवस्था और जलाशयों के उचित नियोजन को प्राथमिकता दी जा रही है। मुख्यमंत्री जल संवर्धन योजना के माध्यम से लघु सिंचाई तालाब, भंडारण तालाब, सीमेंट नाला बांध और अन्य जल स्रोतों की मरम्मत कर सिंचाई क्षमता बहाल करने का प्रयास किया जा रहा है।

उसी के साथ टपक और फव्वारा सिंचाई जैसी सूक्ष्म सिंचाई पद्धतियों का उपयोग बढ़ाना महत्वपूर्ण है। पानी की उपलब्धता को ध्यान में रखकर फसल पद्धति तय करना, भूमि में नमी बनाए रखना और वर्षा के पानी का खेत स्तर पर नियोजन करना, ये उपाययोजनाएं सूखे के प्रभाव को कम कर सकती हैं।

पेयजल, पशु और रोजगार

सूखे का सबसे अधिक प्रभाव ग्रामीण क्षेत्र पर पड़ता है। नागरिकों को पेयजल, पशुओं के लिए चारा और पानी उपलब्ध करना भी चुनौती बन जाता है। इसलिए टैंकर द्वारा पानी की आपूर्ति, कुओं की मरम्मत, अस्थायी पानी आपूर्ति योजना और आवश्यकता अनुसार चारा छावनियों की व्यवस्था करना महत्वपूर्ण हो जाता है। सूखे के समय रोजगार गारंटी के कार्यों को भी विशेष महत्व है। रोजगार उपलब्ध कराने के साथ जल संरक्षण, नाला गहरीकरण, मृदा संरक्षण और वर्षा का पानी रोकने वाले कार्यों को प्राथमिकता दी जा रही है।

प्रत्येक गांव ने अपनी पानी की जरूरतों और उपलब्ध स्रोतों को ध्यान में रखकर जल प्रबंधन रूपरेखा तैयार करना आवश्यक है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने इस दिशा में पहल की है। शहरी और ग्रामीण भाग में 10 प्रतिशत पानी कटौती लागू करने के साथ ही, किसानों को ऋण वसूली के लिए परेशान करने वाले बैंकों पर कार्रवाई, चारे की कमी दूर करना और दीपावली से पहले सहायता वितरण के नियोजन के बारे में कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए हैं।

बैंकों ने किसानों से एक बार फसल ऋण लेने पर फिर से कागजात नहीं मांगने चाहिए और किसी भी राष्ट्रीयकृत या निजी बैंक ने इस अवधि में किसानों को ऋण भरने के लिए फोन करके परेशान नहीं करना चाहिए। ऐसा होने पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी, ऐसा आदेश दिया गया है।

चारा कमी पर विजय पाने के लिए वन विभाग की भूमि पर, परती भूमि पर तथा जल संसाधन के तालाबों के पास की शासकीय भूमि पर ‘ग्रासलैंड डेवलपमेंट’ करके बड़ी चारा बैंक बनाने का निर्णय भी राहत देने वाला है।

जिन किसानों की ई-केवाईसी पूरी नहीं हुई है या जिन किसानों की ई-केवाईसी लंबित है, ऐसे किसानों को फसल ऋण तत्काल उपलब्ध कराने के लिए किसानों की ई-केवाईसी पूरी की जाएगी, जबकि एग्रीस्टैक पर पंजीकृत नहीं किसानों का पंजीकरण करके उन्हें केंद्र और राज्य शासन की योजनाओं का लाभ दिलाया जाएगा। बंद पड़ी पानी आपूर्ति योजनाओं को फिर से शुरू करने सहित भूमि में बड़े पैमाने पर पानी पुनर्भरण के लिए रिचार्ज शाफ्ट योजना चलाने पर जोर दिया जा रहा है। जल संसाधन विभाग ने इस बारे में उपलब्ध पानी के किफायती उपयोग और उसके नियोजन के लिए शासन निर्णय जारी किया है।

राज्य में चारा बैंक बनाएगी

राज्य में चारे की उपलब्धता बढ़ाने के लिए वन विभाग की खाली भूमि, तालाब परिसर और जल संसाधन विभाग के तालाबों के पास की शासकीय भूमि पर घास क्षेत्र विकसित करके चारा बैंक स्थापित किए जाएंगे, धान उत्पादक भाग में धान की पुआल जलाने के बजाय उसे संग्रहित करके उसका चारे के लिए उपयोग किया जाएगा। अन्य राज्यों से चारा लाने के बजाय राज्य में उपलब्ध स्रोतों से अधिकतम चारा निर्माण पर जोर दिया जा रहा है।

सूखे का संकट तो आ ही गया है, लेकिन उसी समय तत्काल कार्रवाई करके सूखे पर विजय पाने के शासन के प्रयास भी सराहनीय हैं।

  • संचालक (सूचना) कार्यालय नागपुर

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मनोज जरांगे के आंदोलन का असली सच अब सामने आना चाहिए

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  • 15 दिन से जारी अनशन, 19 सितंबर से मुंबई के आजाद मैदान में आंदोलन की चेतावनी – अभय बारस्कर के वसूली के आरोप, मराठा नेताओं में फूट और अदृश्य शक्ति की चर्चा के बीच क्या है सच्चाई ?

मराठा समाज के नेता मनोज जरांगे के उपोषण का आज पन्द्रहवां दिन है। कल उन्होंने घोषणा की है कि वे 15 सितंबर को मुंबई की ओर कूच करेंगे और 19 सितंबर से आजाद मैदान में उपोषण शुरू करेंगे। इसी बीच कुछ न्यूज चैनलों ने खबर चलाई है कि मुंबई पुलिस ने उन्हें आजाद मैदान में उपोषण की अनुमति देने से इनकार कर दिया है। लेकिन जरांगे आंदोलन पर अड़े हैं, इसलिए नए विवाद की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

इसी दौरान जरांगे के आंदोलन का विरोध भी शुरू हो गया है। मराठा समाज के अभ्यासक अभय बारस्कर ने आरोप लगाया है कि जरांगे का यह आंदोलन मराठों के भले के लिए नहीं है, बल्कि इस आंदोलन की आड़ में जरांगे और उनके कुछ करीबी साथियों ने रेत माफिया से करोड़ों की माया जमा की है। वहीं ओबीसी समाज के नेता लक्ष्मण हाके, बबन तायवाडे ने भी इस आंदोलन का विरोध किया है।

पातळी सोडून टीका

राजनीति में विरोधी पर टीका करते समय मर्यादा नहीं लांघनी चाहिए। लेकिन मनोज जरांगे ने इस बार मर्यादा लांघकर सभी मंत्रियों पर एकेरी भाषा में टीका-टिप्पणी शुरू कर दी है। विशेषकर उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे पर एकेरी में टीका करने से शिवसेना के अन्य मंत्री उनसे नाराज हैं।

इसी बीच चर्चा के लिए उनके पास गए मंत्री उदय सामंत ने दावा किया है कि संविधान के दायरे में आने वाली सभी मांगें हमने मान ली हैं। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने भी स्पष्ट किया है कि हम संविधान के दायरे की सभी मांगें पूरी कर रहे हैं, जो अधूरी हैं उनमें भी रास्ता निकालने की कोशिश जारी है। फिर भी मुंबई आकर आंदोलन करने की जिद जरांगे की कायम है। ऐसे में ऐन गणपति उत्सव में वे मुंबई आकर आंदोलन शुरू करते हैं तो मुंबई में फिर से कानून-व्यवस्था का सवाल खड़ा हो सकता है।

अचानक आए नेता – अदृश्य शक्ति का सवाल

मनोज जरांगे पिछले चार वर्षों में ही मराठा आरक्षण आंदोलन के नेता के रूप में सामने आए हैं। इससे पहले उनका नाम कहीं नहीं था। 2014 से 2019 के बीच मराठों ने आरक्षण के लिए कई आंदोलन किए, लेकिन उनमें जरांगे कहीं नहीं थे। अचानक वे बरसात में उगने वाले कुकुरमुत्ते की तरह ऊपर आए और पिछले तीन-चार वर्षों में उन्होंने सरकार और समाज दोनों को बंधक बना लिया है। सरकार भी नरम रुख अपना रही है, जिससे आंदोलन और बिगड़ रहा है। कल ही एक ओबीसी नेता ने कहा कि राज्य सरकार ने जरांगे को लाड़-प्यार से बिगाड़ा है, वे ‘लाडोबा’ हैं।

पिछले चार साल से अचानक सामने आए जरांगे के पीछे मुख्यमंत्री फडणवीस का विरोध करने वाली कोई अदृश्य शक्ति होने की भी चर्चा है। कुछ साल पहले पुणे में संभाजी ब्रिगेड ने ब्राह्मणों के विरोध में दादोजी कोंडदेव की मूर्ति तोड़ने की कोशिश की थी, उसमें एक आरोपी के तौर पर मनोज जरांगे का नाम सामने आया था। इसे देखते हुए सिर्फ फडणवीस का विरोध करने के लिए जरांगे किसी के इशारे पर आंदोलन कर रहे हैं, इस शक को आधार मिलता है। फिर भी फिलहाल मराठा समाज उनके पीछे खड़ा है, ऐसा चित्र बनाने में वे या उनके पीछे की अदृश्य शक्ति सफल हुई दिखती है।

सरसकट आरक्षण का आग्रह क्यों?

सवाल यह है कि मराठा समाज को सरसकट आरक्षण मिले, यह आग्रह क्यों? आर्थिक रूप से पिछड़े मराठों को सरकार ने पहले ही EWS आरक्षण की घोषणा की है। साथ ही राज्य सरकार ने मराठा समाज के लिए कई अन्य रियायतें और योजनाएं भी घोषित की हैं। फिर भी जरांगे यह कथित भीड़ जुटाने में कैसे सफल होते हैं, यह सवाल अभ्यासकों को परेशान कर रहा है।

आज मराठा समाज में जरांगे ही एकमात्र नेतृत्व हैं, ऐसा नहीं है। राजनीति में भी कई मराठा नेता सक्रिय हैं। सत्ताधारी महायुति में खुद उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे और सुनेत्रा पवार मराठा समाज के नेता हैं। चंद्रकांत दादा पाटिल, नितेश राणे भी मराठा हैं। लेखक को याद है कि 2006 में नागपुर के चिटणीस पार्क स्टेडियम में हुए मराठा सम्मेलन में तत्कालीन राजस्व मंत्री नारायणराव राणे ने कहा था – “छत्रपती शिवाजी महाराज को कोई आरक्षण नहीं था, फिर भी उन्होंने मराठा साम्राज्य खड़ा किया, फिर मराठों को आरक्षण क्यों मांगना चाहिए।” इस पर विवाद भी हुआ था।

तो फिर मराठा समाज के ये नेता सरकार ने मराठा समाज के लिए जो कदम उठाए हैं, वे कदम और उससे जुड़े अन्य मुद्दे लेकर समाज के सामने क्यों नहीं आते? अगर किसी अदृश्य शक्ति के इशारे पर नाचकर जरांगे मराठा समाज को अपने पीछे घसीट रहे हैं, तो समाज के इन नेताओं को आगे आकर यह घसीटना रोकना चाहिए। अगर जरांगे गलत मांगें लेकर समाज को गुमराह कर रहे हैं, तो वह भी उजागर होना चाहिए। इसके लिए सरकार और समाज के समझदार, सुबुद्ध नेताओं को सामने आकर हकीकत समाज के सामने रखनी चाहिए। आज अभय बारस्कर जैसे अभ्यासक इस दिशा में पहल कर रहे हैं, उन्हें समाज के अन्य समझदार लोगों को समर्थन देना चाहिए।

साथ ही बारस्कर ने जरांगे और उनके साथियों पर जो आर्थिक लेन-देन के आरोप लगाए हैं, उनकी भी गहन जांच होनी चाहिए। तभी असली सच्चाई सामने आएगी।

पिछड़े समाज के भले के लिए कोई आंदोलन करता है तो उसका स्वागत है। लेकिन उस आंदोलन की आड़ में कोई सरकार को बंधक बनाता है तो वह गलत है। मनोज जरांगे असल में क्या कर रहे हैं, यह सच अब सामने लाने का समय आ गया है। अगर वे सच में समाज हित में आंदोलन कर रहे हैं तो संविधान के दायरे में ही मांग करें। अवास्तविक मांगें कर सरकार और समाज को बंधक न बनाएं। आंदोलन करते समय अन्य नेताओं पर स्तरहीन गाली-गलौज न करें। अगर वे ऐसा करेंगे तो सरकार को समय रहते उन्हें रोकना होगा, अब वह समय आ गया है।

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