- अनिल सोले की वापसी फडणवीस शासन के अंत की सूचना है या केवल अस्थायी समझौता
नागपुर,13 अक्टूबर 2026 :
नागपुर के राजनीतिक इतिहास में पिछले चार दिनों में घटा नाटक केवल विधान परिषद के एक उम्मीदवार चयन की कथा नहीं है। यह महाराष्ट्र की भारतीय जनता पार्टी के चरित्र का पतन है, निष्ठावान कार्यकर्ताओं का गला घोंटने की क्रूर कथा है और मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के असीमित, बेलगाम और एकतंत्रीय केंद्रीकरण की ज्वलंत साक्षी है।
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को स्वयं प्राध्यापक अनिल सोले के द्वार पर जाना पड़ा। चर्चा हुई। सोले ने विद्रोह वापस लिया। गिरीश व्यास ने त्यागपत्र वापस लिया। अब फडणवीस के प्रशंसक उनकी चतुराई के खोखले ढोल बजाएंगे। फडणवीस ने विद्रोह तोड़ दिया, ऐसी प्रशंसा की बातें फैलाई जाएंगी। पर मेरा प्रश्न भिन्न और अधिक चुभने वाला है।
देवेंद्र जी, विद्रोही को अस्थायी रूप से शांत कर दिया, पर विद्रोह को जन्म देने वाली आपकी एकतंत्रीय, दमनकारी और एकाधिकारवादी कार्यपद्धति कब बदलेंगे ?
जिस दल में कभी मतदान केंद्र का कार्यकर्ता सीधे वरिष्ठों से प्रश्न पूछता था, उसी दल में आज एक ज्येष्ठ, तपस्वी नेता को सुनने के लिए राज्य के मुख्यमंत्री को उसके घर पर झुकना पड़ता है, यह आंतरिक लोकतंत्र की करुणा नहीं, बल्कि उसकी समाधि पर अंतिम पत्थर है।
प्राध्यापक अनिल सोले ने केवल टिकट अस्वीकार किए जाने के कारण विद्रोह नहीं किया। उन्होंने आपकी बंद द्वारों के पीछे उम्मीदवार चयन की गुप्त योजना, पुराने निष्ठावानों को कचरे के समान फेंक देने की आपकी प्रवृत्ति और दल में लोकतंत्र का गला घोंटने की आपकी एकतंत्रीय शैली पर विस्फोट किया है।
उनके इस सत्य के संघर्ष का साथ देते हुए गिरीश व्यास ने दल से त्यागपत्र फेंक दिया। सैकड़ों पदाधिकारी और संघ परिवार से रक्त के संबंध से जुड़े कार्यकर्ता सोले के पीछे दृढ़ता से खड़े हुए। यह असंतोष का विस्फोट था।
यह दो व्यक्तियों की नाराजगी नहीं थी। यह फडणवीस शासन के विरुद्ध संघ की राजधानी से उठा विद्रोह का प्रथम रणभेरी नाद था।
मोहन भागवत जी से सीधा प्रश्न
आदरणीय पूज्य मोहन भागवत जी, संघ की राजधानी में यह कौन सा तमाशा चल रहा है ?
मेरा जन्म ऐसे घर में हुआ जहां सत्ता की कुर्सी नहीं थी, कोष में धन नहीं था, पर हृदय में विचारों के प्रति इस्पात की निष्ठा थी। मेरे पिता स्वर्गीय पंडित जमुनाशंकर उर्फ भय्याजी तिवारी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्णकालिक प्रचारक थे। उन्होंने पांढरकवडा क्षेत्र में जनसंघ का प्रथम दीपक जलाया। पश्चिम विदर्भ की मिट्टी में संगठन का पौधा लगाने के लिए उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन समर्पित किया। आपातकाल की अंधेरी कोठरी में कारावास भोगा।
उनकी पीढ़ी ने जनसंघ के लिए घर-बार छोड़ा, संसार को राख कर दिया, दरिद्रता के दंश सहे। उनकी आंखों के सामने मुख्यमंत्री पद नहीं था, देशहित और विचारनिष्ठा थी। आज उस त्याग की स्मृति आती है तो हृदय चीर जाता है। सहस्रों अनाम स्वयंसेवकों ने इसी एकतंत्र के लिए, इसी चापलूसी के दरबार के लिए अपना जीवन समर्पित किया था क्या ?
और इसलिए मेरा सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत से सीधा और सार्वजनिक प्रश्न है। आपके संघ का मुख्यालय नागपुर में है। उसी नागपुर में संघ की भट्टी में ढले अनिल सोले और गिरीश व्यास आपकी विचारधारा पर बढ़ी भारतीय जनता पार्टी की एकतंत्रीय कार्यपद्धति के विरुद्ध विद्रोह का ध्वज फहराते हैं।
संघ की दृष्टि से यह केवल भारतीय जनता पार्टी का आंतरिक विषय मानकर अनदेखा करने जितना क्षुद्र विषय है क्या? संघ ने भारतीय जनता पार्टी के प्रत्येक राजनीतिक निर्णय में हस्तक्षेप करना चाहिए, ऐसा मेरा बिल्कुल कहना नहीं है। पर जब संघ के संस्कार में ढले निष्ठावानों को पशु के समान हांका जा रहा हो, तब संघ के मूल्यों की चिता जल रही हो तो संघ को मौन का नाटक करना चाहिए क्या ?
आदरणीय पूज्य मोहन भागवत जी, इस फडणवीस शासन ने लाई हुई व्यक्तिपूजा, बेधुंध धनशक्ति, सत्ता का माज गया अहंकार और आंतरिक लोकतंत्र की हुई हत्या पर संघ का नैतिक मार्गदर्शन कहां है ? क्यों है यह भयानक मौन ? आप इस पर सार्वजनिक रूप से मुख खोलेंगे या नागपुर के सत्ता के दरबार के सामने संघ भी नतमस्तक हो गया है, ऐसी चर्चा अब संघ परिवार में शुरू हो गई है।
इस विद्रोह पर आपकी स्पष्ट सार्वजनिक प्रतिक्रिया अभी तक नहीं आई है, इसलिए यह प्रश्न अधिक ज्वलंत और गंभीर बन गया है।
मैं फडणवीस पीड़ित हूं
देवेंद्र फडणवीस के साथ सत्ता में कार्य करने के कारण मेरे प्रश्न अधिक धारदार हैं। मैं केवल बाहर से शोर मचाने वाला राजनीतिक टीकाकार नहीं हूं। देवेंद्र फडणवीस मुख्यमंत्री थे तब मैं वसंतराव नाईक किसान स्वावलंबन मिशन का अध्यक्ष के रूप में राज्य मंत्री पद के दर्जे से कार्य कर चुका हूं।
किसान आत्महत्या, कृषि ऋण का फंदा, ग्रामीण दरिद्रता और विदर्भ के उजड़े परिवारों की वेदना समीप से देखी है। शासन की निर्णय प्रक्रिया कैसे एक व्यक्ति के संकेत पर चलती है, इसका मुझे भीतर से अनुभव है। इसलिए आज का प्रश्न मुझे अधिक बेचैन करता है।
किसान की चीख सुनने के लिए आपके पास समय नहीं है और सत्ता के दलालों के लिए आपके द्वार 24 घंटे खुले हैं, ऐसी ही क्या आपकी व्यवस्था है ? आज महाराष्ट्र की सत्ता के घेरे में ठेकेदार, मध्यस्थ, प्रतिशतवीर, राजनीतिक दलाल और अदानी जैसे चुनिंदा उद्योग समूहों की धृष्टता बढ़ रही है, यह खुली चर्चा है।
अदानी समूह को मिलने वाले सरकारी प्रकल्प, सार्वजनिक संपत्तियों का बंटवारा, बिजली क्षेत्र के संदिग्ध व्यवहार और सहस्रों करोड़ की निविदाओं की न्यायालयीन निगरानी में स्वतंत्र जांच होनी ही चाहिए, यह मेरी दृढ़ मांग है।
उसी प्रकार विश्वास पाठक ने सौर ऊर्जा विकास करते हुए अपना सहस्रों करोड़ रुपये का विकास किया और उसके बिजली भवन के प्रसंग, इन सबकी पूर्ण जानकारी होते हुए भी ऐसे विवादास्पद व्यक्ति को आप भारतीय जनता पार्टी का प्रवक्ता बनाते हैं और सार्वजनिक संस्थाओं में निदेशक बैठाकर विजय राठौड़ कथा सहित हितों का जो खुला टकराव पैदा किया जा रहा है, उसमें स्वायत्तता और पारदर्शिता के नियम पैरों तले कुचले जा रहे हैं क्या, यह जनता के सामने आना चाहिए। धन लेकर कार्य करने वाली उपद्रवी अंजली दमानिया जैसे आरोप लगाने वाली कार्यकर्ता को आप हमेशा संरक्षण और विशेष व्यवहार देते हैं। उनके विवादास्पद पति को आपने महाराष्ट्र सरकार का सलाहकार नियुक्त किया है और अंजली दमानिया जी लगातार सभी दलों के उद्योग क्षेत्र के नेताओं पर पहले गंभीर आरोप करती हैं और बाद में शांत हो जाती हैं, इसे अब देवेंद्र-अंजली दमानिया गठजोड़ की ओर भारतीय जनता पार्टी के नेता और सांसद-विधायक शंका से देखते हैं। चुनिंदा लोगों को निशाना बनाना और फडणवीस के निकटवर्ती घेरे पर मौन रखना यह दोहरापन अब सभी को समझ आ गया है। मगर किसके आरोप सही हैं, किसके हितसंबंध क्या हैं और किसको किसका राजनीतिक लाभ होता है, यह प्रमाणों की कसौटी पर जांचा ही जाना चाहिए।
देवेंद्र जी, आपको निष्ठावान कार्यकर्ताओं से अधिक आपके चरणों में लोटने वाली, आपकी स्तुति करने वाली और सत्ता के टुकड़े पर जीने वाली चापलूस मंडली ही अधिक प्रिय हो गई है क्या ? यह प्रश्न केवल मेरा नहीं है, यह भावना आज भारतीय जनता पार्टी के प्रत्येक पुराने कार्यकर्ता के मन में चुभ रही है। इसकी संपूर्ण जिम्मेदारी आपके एकाधिकारवादी नेतृत्व की है।
तेरह वर्षों में भारतीय जनता पार्टी का चेहरा कितना विकृत हुआ
2014 के बाद महाराष्ट्र भारतीय जनता पार्टी में सत्ता का विकृत केंद्रीकरण हुआ। एक ही व्यक्ति के हाथ में सभी सूत्र आ गए। एकनाथ खडसे को समाप्त किया गया, उन्हें खुली आलोचना करने के लिए बाध्य किया गया। पंकजा मुंडे को दरकिनार कर उनकी अस्मिता पर घाव लगाया गया। प्रकाश मेहता जैसे पुराने योद्धाओं को अपमानजनक व्यवहार देकर राजनीतिक वनवास में भेजा गया।
प्रत्येक घटना के कारण भिन्न बताए जाएंगे। पर इस श्रृंखला का अर्थ एक ही है। महाराष्ट्र भारतीय जनता पार्टी में फडणवीस के मत के विरुद्ध बोलने वालों के लिए सम्मान की नहीं, बल्कि निष्कासन की ही जगह बची है क्या ? राष्ट्रीय भारतीय जनता पार्टी के नेता सांसद नितिन गडकरी की संगठनात्मक परंपरा में ढले पुराने कार्यकर्ताओं का स्थान क्या है ? उन्हें समाप्त करने का यह षड्यंत्र है क्या ?
सुधीर मुनगंटीवार, माधव भंडारी, केशव उपाध्ये, विनोद तावडे, राजाभाऊ ठाकरे, उपेंद्र कोठेकर, प्राध्यापक श्रीकांत देशपांडे, किरण पातूरकर जैसे विभिन्न पीढ़ियों के निष्ठावानों के योगदान का माप किस तराजू में होता है ? चापलूसी के तराजू में ?
इन सभी ने विद्रोह किया है, ऐसा मैं नहीं कहता। पर उनके अनुभव को, उनकी स्वतंत्र वाणी को इस एकतंत्र में स्थान है क्या, यह प्रश्न पूछना ही पड़ेगा। भारतीय जनता पार्टी की पहचान कार्यकर्ताओं का दल ऐसी थी। आज वह केवल एक व्यक्ति के अहंकार के चारों ओर घूमने वाला चापलूसों का दरबार बन गया है क्या ? नागपुर में स्वयं मुख्यमंत्री बनकर आप समझौते की मध्यस्थता करते हैं। प्रत्येक प्रकरण भिन्न होगा। पर दल अनुशासन मापने के दो भिन्न-भिन्न मापदंड क्यों ? आपकी इच्छा के लोगों के लिए एक न्याय और शेष के लिए दूसरा न्याय ?
और सबसे बड़ा प्रश्न, अनिल सोले को समझाने के लिए आपको स्वयं जाना पड़ा, इसका अर्थ उनकी नाराजगी सही थी, उनका आक्रोश उचित था, यह आपने ही स्वीकार किया क्या? अगर सोले के प्रश्न उचित थे, तो वे प्रश्न उत्पन्न होने से पहले उन्हें विश्वास में क्यों नहीं लिया ? यही क्या आपकी कार्यपद्धति है ? पहले अपमान करना और बाद में मनाने का नाटक करना ?
महाराष्ट्र में शाहशाही या संगठनात्मक लोकतंत्र ? नरेंद्र मोदी और अमित शाह के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी ने चुनाव जीते, यह सत्य है। पर चुनाव जीतना मतलब दल का लोकतंत्र जीवित रखना नहीं है। मेरे स्पष्ट राजनीतिक अवलोकन के अनुसार महाराष्ट्र में देवेंद्र फडणवीस की नेतृत्व शैली पर दिल्ली की एकतंत्रीय राजनीति का पक्का ठप्पा लगा है। सभी राजनीतिक निर्णय केवल दो-चार व्यक्तियों के बंद कक्ष में हो रहे हों तो ग्राम स्तर के कार्यकर्ता की चीख दिल्ली तक कैसे पहुंचेगी ?
संगठन में विचारों का अनुशासन चाहिए या एक व्यक्ति के सामने की दासता ?
भारतीय जनता पार्टी में आज भी लाखों ईमानदार कार्यकर्ता हैं। वे सभी नाराज हैं, ऐसा मैं नहीं कहूंगा। पर उनके मन की बेचैनी की वाणी को अगर आप विद्रोह कहकर कुचलेंगे तो भविष्य में उसका विस्फोट हुए बिना नहीं रहेगा।
तरुण पीढ़ी को आप कौन सा आदर्श दे रहे हैं? महाराष्ट्र का बेरोजगार युवा नौकरी के लिए भटक रहा है। किसान ऋण के फंदे पर लटक रहा है। ग्रामीण परिवार महंगाई की खाई में धकेले जा रहे हैं। और दूसरी ओर आपकी राजनीति में भारी धन का खेल, संपत्ति का घिनौना प्रदर्शन, चुनाव में धनशक्ति का नंगा नाच और सत्ता का दुरुपयोग इस पर गंभीर प्रश्न खड़े हो रहे हैं।
राजनेताओं और उनके निकटवर्तियों की बेतहाशा संपत्ति में हुई वृद्धि की कानूनी, पारदर्शी और न्यायालयीन जांच होनी ही चाहिए। सरकारी ठेके और राजनीतिक चंदे के काले संबंध जनता के सामने आने चाहिए। क्योंकि युवा पीढ़ी पूछ रही है, सामान्य कार्यकर्ता ने जीवनभर ध्वज ढोना है और सत्ता आने पर कुछ चुनिंदा चापलूस और ठेकेदारों ने ही उसकी लूट करनी है, यही क्या आपकी भारतीय जनता पार्टी का नया अर्थ है ?
आदरणीय प्राध्यापक अनिल जी,
आपने वापसी ली, पर फडणवीस शासन के मुख पर प्रहार किया है। मैंने 8 अक्टूबर को आपको संयम की सलाह दी थी। आज आपने विद्रोह वापस लिया, उसका मैं स्वागत करता हूं। परंतु आपके चार दिन के रणसंग्राम ने फडणवीस की एकतंत्र का नकाब फाड़ दिया है और दल में कार्यकर्ताओं के सम्मान का प्रश्न देश के सामने ला दिया है। आप और गिरीश व्यास ने उठाए प्रश्नों के उत्तर केवल मुख्यमंत्री की एक भेंट से नहीं मिलेंगे।
आदरणीय देवेंद्र जी,
आपने अनिल सोले जी की नाराजगी अस्थायी रूप से शांत की होगी। पर दल में विश्वास का जो धागा आपने तोड़ा, उसे फिर जोड़ने के लिए आपकी यह दिखावटी मध्यस्थता पर्याप्त नहीं है। इसके लिए अहंकार के स्थान पर संवाद की, एकाधिकारशाही के स्थान पर लोकतंत्र की और चापलूसी के स्थान पर निष्ठा को सम्मान देने की सच्ची साहस दिखानी होगी। क्योंकि संगठन की शक्ति मुख्यमंत्री के वर्षा निवास में नहीं होती। वह उस अनाम कार्यकर्ता के रक्त में होती है, जिसने जीवनभर किसी पद की अपेक्षा किए बिना दल का ध्वज कंधे पर ढोया।
मेरे पिता की पीढ़ी ने जनसंघ खड़ा करते हुए सत्ता नहीं देखी, उन्होंने विचार देखा। आज आपके पास सत्ता है, धन है, प्रचार यंत्रणा है, बड़े-बड़े प्रशंसक हैं। पर उस पुराने कार्यकर्ता के मन में विश्वास आपने जीवित रखा है क्या या उसे भी अपने अहंकार के नीचे कुचल दिया है ?
यह प्रश्न भारतीय जनता पार्टी से पूछना ही पड़ेगा। और सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत से भी पूछना ही पड़ेगा।
आदरणीय भागवत जी, जनसंघ के त्याग से खड़े हुए दल में निष्ठावान कार्यकर्ता को अपना सम्मान बचाने के लिए विद्रोह करना पड़ता है, यह संघ के संस्कारों की विजय कहें या आपके मौन की पराजय ?
अंत में देवेंद्र फडणवीस से यही कहना है, सत्ता के बल पर विरोधियों को हराया जा सकता है, विद्रोहियों को अस्थायी रूप से शांत कराया जा सकता है, पर कार्यकर्ताओं के मन में आपके प्रति उत्पन्न हुआ अविश्वास और क्रोध किसी भी राजनीतिक मध्यस्थता से एक रात में मिटाया नहीं जा सकता।
अनिल सोले की वापसी संघर्ष का अंत होगी या महाराष्ट्र भारतीय जनता पार्टी में फडणवीस शासन के विरुद्ध महासंग्राम की शुरुआत, यह आने वाला समय तय करेगा। आज नागपुर में दिख रही शांति समाधान की नहीं, बल्कि तूफान से पहले की भयानक शांति है।
किशोर तिवारी
स्व. पंडित भय्याजी तिवारी के पुत्र
पूर्व अध्यक्ष, वसंतराव नाईक किसान स्वावलंबन मिशन (राज्यमंत्री पद दर्जा)
एक देवेंद्र फडणवीसपीड़ित