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नागपुर पदवीधर में कांग्रेस के अभिजीत वंजारी विजयी, 41 घंटे चली मतगणना के बाद प्रमाणपत्र मिला

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  • वंजारी को 67,231 वोट, भाजपा के सुधाकर कोहले को 63,960, कोटा 75,438 पूरा न होने पर दूसरी पसंद से फैसला, 15,032 वोट अवैध

नागपुर, 29 अक्टूबर – नागपुर विभाग विधान परिषद पदवीधर मतदारसंघ में इंडियन नेशनल कांग्रेस के अभिजीत वंजारी ने जीत दर्ज की। चुनाव निर्णय अधिकारी और विभागीय आयुक्त विजयलक्ष्मी बिदरी ने उन्हें विजय प्रमाणपत्र प्रदान किया।

41 घंटे चली मतगणना : मानकापुर स्थित विभागीय क्रीडा संकुल में मंगलवार 27 अक्टूबर सुबह 8 बजे 84 टेबल पर मतगणना शुरू हुई थी। 41 घंटे से ज्यादा चली इस प्रक्रिया में चुनाव निरीक्षक डॉ. हर्षदीप कांबले, सभी जिलों के सहायक निर्णय अधिकारी और जिलाधिकारी मौजूद रहे।

कोटा पूरा नहीं, दूसरी पसंद से फैसला – पहली पसंद के दो राउंड में किसी को जीत के लिए जरूरी 75,438 वोटों का कोटा नहीं मिला। इसलिए दूसरी पसंद की बाद फेरी करनी पड़ी। पहली पसंद में कुल 1,65,906 वोटों में से 15,032 अवैध ठहरे और 1,50,874 वैध रहे।

दूसरी पसंद की बाद फेरी में भी कोटा पूरा नहीं हुआ, इसलिए पहली और दूसरी पसंद मिलाकर सबसे ज्यादा वोट पाने वाले अभिजीत वंजारी को विजयी घोषित किया गया।

  • अभिजीत वंजारी (कांग्रेस) – 67,231 वोट
  • सुधाकर कोहले (भाजपा) – 63,960 वोट

चुनाव का कार्यक्रम – भारत निर्वाचन आयोग ने 22 सितंबर को कार्यक्रम घोषित किया था। 29 सितंबर को अधिसूचना, 23 अक्टूबर को सुबह 8 से शाम 4 बजे तक मतदान हुआ था। 27 अक्टूबर से मतगणना शुरू होकर 41 घंटे बाद पूरी हुई। आयोग ने पूरी प्रक्रिया 31 अक्टूबर तक पूरी करने का कार्यक्रम तय किया है।

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सरकारी जमीन बिल्डर को सौंपने का नया फॉर्मूला? स्वाती बंगला एक रुपये में

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  • पत्रकार क्लब ऑफ नागपुर को 30 साल के लिए सिविल लाइंस की सरकारी जमीन, बिल्डर श्रवण कुकरेजा से 55% हिस्सेदारी का समझौता, करोड़ों के चूने का आरोप – जम्मू आनंद और राजीव रंजन कुशवाहा ने मुख्य सचिव से विभागीय आयुक्त या सेवानिवृत्त न्यायाधीश से जांच की मांग की

नागपुर, 29 अक्टूबर : नागपुर के सबसे महंगे इलाके सिविल लाइंस में न्यायाधीश के लिए आरक्षित ‘स्वाती’ बंगला और उसकी पूरी सरकारी जमीन को पुनर्विकास के नाम पर निजी बिल्डर को सौंपने का सनसनीखेज मामला सामने आया है।

आज पत्रपरिषद में भाई जम्मू आनंद ने पत्रकारों से कहा – पत्रकार क्लब ऑफ नागपुर नामक कंपनी के कामकाज और उसे सरकारी जमीन देने का मुद्दा वर्षों से उठ रहा है, पर प्रशासन और सरकार चुप है। इस चुप्पी और फैसलों में दिखाई गई असाधारण तेजी से संदेह गहरा रहा है।

क्या है मामला –
जानकारी के अनुसार स्वाती बंगले की जमीन पत्रकार क्लब ऑफ नागपुर कंपनी को मात्र 1 रुपया सालाना किराए पर 30 साल के लिए दी गई है। कंपनी और बिल्डर श्रवण कुकरेजा के बीच हुए कथित समझौते के तहत पुनर्विकसित प्रॉपर्टी का 55% हिस्सा बिल्डर को मिलेगा, जिसका वह व्यावसायिक उपयोग करेगा।

यहां बहुमंजिला कमर्शियल टावर प्रस्तावित है – दुकानें, प्रोफेशनल चेंबर, कॉर्पोरेट ऑफिस, हॉस्पिटैलिटी यूनिट्स। इससे करोड़ों की आय होगी, पर सरकारी खजाने को करोड़ों का नुकसान होने की आशंका है।

जांच की मांग – विभागीय आयुक्त नागपुर के माध्यम से 28 अक्टूबर 2026 को जम्मू आनंद और राजीव रंजन कुशवाहा ने मुख्य सचिव, महाराष्ट्र सरकार को निवेदन सौंपा है। मांग है – पूरे मामले की जांच विभागीय आयुक्त या सेवानिवृत्त न्यायिक मजिस्ट्रेट से कराई जाए।

जांच के बिंदु –

  1. 18 जनवरी 2017 को बनी कंपनी का पंजीकरण और शुरुआती 5 साल में स्वाती बंगले की जमीन का ट्रांसफर
  2. किराए की शर्त बदलकर 1 रुपया सालाना कैसे किया गया
  3. पुनर्विकास के लिए बिल्डर से समझौता किस आधार पर हुआ
  4. निचले स्तर से मंत्रालय तक किन अधिकारियों ने मंजूरी दी, किस नियम से दी, इतनी तत्परता क्यों दिखाई गई

उद्देश्य से भटकाव – कंपनी का मूल उद्देश्य था पत्रकारों को शेयरधारक बनाकर क्लब हाउस बनाना – रीडिंग रूम, ग्रंथालय, इनडोर गेम्स, शोध, गैर-लाभकारी धर्मार्थ काम, सॉफ्टवेयर प्रशिक्षण, व्यक्तित्व विकास, शिक्षा, कार्यशाला आदि। 9 साल में ही उद्देश्य बदलकर प्रीमियम कमर्शियल प्रोजेक्ट कैसे बन गया?

सवाल सीधा है – क्या सामाजिक-शैक्षणिक-सांस्कृतिक उद्देश्य के लिए रियायती दर पर दी गई सरकारी जमीन का उपयोग बड़े व्यावसायिक कॉम्प्लेक्स के लिए किया जा सकता है? क्या यह आवंटन की शर्तों के अनुरूप है?

जम्मू आनंद ने कहा – सार्वजनिक संपत्ति के उपयोग में पारदर्शिता सरकार की जिम्मेदारी है। सरकार चुप्पी तोड़े, दस्तावेज सार्वजनिक करे और दोषी अधिकारियों की भूमिका तय करे, ताकि पता चले जनहित हुआ या निजी लाभ पहुंचाया गया।

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38 प्रत्याशियों में वंजारी 67,231 वोट से जीते, कोहले 63,960 पर हारे

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  • आधिकारिक अंतिम गणना पत्रक जारी – निर्दलीय कराले गुरुजी को 26,066, संजय ठूल को 3,995, सोले को 275 वोट, 1,071 वोट वंचित, 931 समाजवादी गणराज्य को – 15,032 वोट अवैध होने से बदला खेल

नागपुर, 29 अक्टूबर – नागपुर विभाग पदवीधर विधान परिषद चुनाव की अंतिम मतगणना का सरकारी पत्रक जारी हो गया है। इसमें 38 उम्मीदवारों को मिले वैध वोटों का पूरा ब्योरा है।

फाइनल आंकड़ा –

  1. अभिजीत गोविंदराव वंजारी (कांग्रेस) – 67,231 – विजयी
  2. सुधाकर विठ्ठलराव कोहले (भाजपा) – 63,960
  3. नितेश बालकृष्णाजी कराले (निर्दलीय) – 26,066
  4. संजय ठूल (निर्दलीय) – 3,995
  5. सुमेध बौद्ध गडापायले (निर्दलीय) – 1,218
  6. मंगेश वानखेड़े (वंचित बहुजन आघाडी) – 1,071
  7. अतुल देशमुख (समाजवादी गणराज्य पार्टी) – 931
  8. बोर्कर धनंजय तुलशीराम – 863

बाकी सभी उम्मीदवार 500 से नीचे – प्रो. देवराम नंदनवार 429, दुर्गावती सरियाम 365, सोले अनिल मधुकर (भाजपा बागी) 275, भंडारकर शरद 149, आनंद मेश्राम 83, रोहन सतोने 71, गीता मेहार 66, नितिन नागदेवते 61, सिद्धार्थ निकोसे 56, अरविंद लिलोरे 57, मनोज मेंढे 51, प्रदीप सोमकुवार 44, सचिन कलभांडे 40, सुरेंद्र खोब्रागड़े 40, संदीप शेंडे 40, अशोक लांजेवार 30, राजेंद्र आत्राम 28, मंजिल गेडाम 27, उत्तमप्रकाश शहारे 26, राजकुमार गेडाम 26, नरेंद्र पाटील 19, विनायक अवचट 17, गजानन लोकहांडे 17, पराग भोंगाडे 17, रघुनाथ सोनटक्के 16, प्रशांत पिंपले 16, नरेश पिल्लई 13, प्रज्वल गवांडे 9, बिपिन तुपे 7.

क्या कहता है पत्रक – कोटा 75,438 था, किसी को पहली पसंद में नहीं मिला। 15,032 वोट अवैध घोषित हुए, जिनमें 9,000 पर सिर्फ ‘2’ लिखा था। एलिमिनेशन के बाद कराले के 24,249 में से बड़ी संख्या में वोट वंजारी को ट्रांसफर होने से वे 67,231 तक पहुंचे और कोहले 63,960 पर रह गए।

अनिल सोले को लेकर पहले 150 वोट की चर्चा थी, पर सरकारी शीट में उन्हें अंतिम गणना तक 275 वैध वोट मिले दिखाए गए हैं।

यह पत्रक विभागीय आयुक्त कार्यालय द्वारा जारी मतगणना की अंतिम शीट है, जो 84 टेबल पर 41 घंटे चली गिनती के बाद तैयार हुई।

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भाजपा महाराष्ट्र नेतृत्व अब करे कठोर आत्ममंथन, नहीं तो पुराने गढ़ भी हाथ से जाएंगे

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  • 5 में से 3 सीट लड़ी, सिर्फ पुणे शिक्षक जीते – नागपुर पदवीधर जो जनसंघ काल से भाजपा का था, पुणे पदवीधर जो जावड़ेकर-चंद्रकांत पाटील का बालेकिल्ला था, दोनों हारे – अनिल सोले को नकार कर सुधाकर कोहले को थोपना और स्मिता जाधव को कोल्हापुर से लाकर लड़ाना पड़ा भारी – 15,000 अवैध वोटों में 9,000 पर सिर्फ ‘2’ लिखकर पर्ची खराब, कार्यकर्ताओं की नाराजगी का नतीजा ?

नागपुर/पुणे, 29 अक्टूबर 2026 : महाराष्ट्र विधान परिषद की 5 सीटों के लिए चुनाव खत्म, नतीजे आए – भाजपा 1, शिंदे शिवसेना 1, कांग्रेस 1 और शरद पवार NCP को 2 सीटें। सत्ता में बैठी महायुति और उसकी अगुवाई कर रही भाजपा के लिए यह आत्ममंथन का समय है।

भाजपा ने 5 में से 3 सीटें लड़ी थीं – नागपुर पदवीधर, पुणे पदवीधर और पुणे शिक्षक। जीती सिर्फ पुणे शिक्षक। नागपुर और पुणे दोनों पदवीधर सीटें, जो भाजपा की पक्की मानी जाती थीं, हाथ से निकल गईं।

“नागपुर – जनसंघ से भाजपा तक 60 साल का गढ़ ढहा “

नागपुर पदवीधर सीट महाराष्ट्र बनने से भी पहले से जनसंघ-भाजपा के पास थी।

  • पंडित बच्छराज व्यास – जनसंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष, यहां से जीते
  • गोविंदराव आठवले – जनसंघ से
  • 1978 और 1984 – गंगाधरराव फडणवीस (देवेंद्र फडणवीस के पिता) जनता पार्टी/भाजपा से जीते
  • नितीन गडकरी – 25 साल इस सीट के प्रतिनिधि
  • 2014 – अनिल सोले जीते, सभागृह के अंदर-बाहर अच्छी छाप छोड़ी

2020 में सोले का टिकट कटा, देवेंद्र फडणवीस के करीबी संदीप जोशी को ऐनवक्त टिकट दिया, तैयारी नहीं, 6 जिलों में संपर्क नहीं, हारे और कांग्रेस के अभिजीत वंजारी पहली बार जीते।

2024 में इतिहास दोहराया गया। सोले फिर इच्छुक थे, तैयारी की थी, कहते हैं टिकट मिलता तो निकाल लेते। पर उन्हें फिर नकारा गया। पालकमंत्री चंद्रशेखर बावनकुळे के करीबी सुधाकर कोहले को टिकट दिया गया। चर्चा है कि सोले नहीं चाहिए, बावनकुळे को कोहले चाहिए इसलिए दिया।

जाति का गणित भी लगाया गया – वंजारी और कोहले की जात एक, वोट कटेंगे तो फायदा होगा। पर पदवीधर वोटर जात नहीं, काम देखता है। कोहले नागपुर महापालिका के नगरसेवक, एक टर्म विधायक रहे, पर नागपुर के बाहर 5 जिलों में पकड़ नहीं। फिर भी जिद से थोपे गए।

“बगावत और 150 वोट का किस्सा ” : सोले ने बगावत की। जनसंघ के संस्थापक अध्यक्ष बच्छराज व्यास के बेटे, पूर्व विधायक गिरीश व्यास ने प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। भाजपा के होश उड़े। प्रदेशाध्यक्ष रवींद्र चव्हाण सोले के घर मनाने गए, मिले ही नहीं। आखिर खुद मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को सारे प्रोटोकॉल छोड़कर सोले के घर जाना पड़ा। तब जाकर सोले ने पीछे हटने का ऐलान किया, पर नाराजगी आज भी कायम है।

मुख्यमंत्री नागपुर में डेरा डाले रहे, बैठकें लीं, गडकरी, बावनकुळे ने जोर लगाया, फिर भी नहीं बची। कार्यकर्ता कोहले के लिए घूमते नहीं दिखे। पदवीधर चुनाव व्यक्तिगत संपर्क का है – मतदाता पंजीकरण से लेकर मार्गदर्शन तक कार्यकर्ता ही पहुंचता है। योग्य उम्मीदवार न होने और वरिष्ठों को विश्वास में न लेने से कार्यकर्ता निष्क्रिय रहे।

और फिर 15,000 वोट अवैध। इसमें 9,000 पर्चियों पर सिर्फ कोहले के नाम के सामने ‘2’ लिखा था, ‘1’ कहीं नहीं। अगर ‘1’ लिखते तो वैध हो जातीं। कार्यकर्ताओं ने सही मार्गदर्शन नहीं किया। कुछ का कहना है – जानबूझकर ‘2’ लिखकर पर्ची खराब की गई – कोहले योग्य नहीं, पर वंजारी को भी वोट नहीं देना, इसलिए घापा किया। किसी गुट ने ऐसा करने को कहा हो सकता है। हालांकि स्थानीय वरिष्ठ नेता इसे खारिज करते हैं, कहते हैं 9,000 वोटर अलग-अलग इलाके के थे, चूक न होती तो कोहले आसानी से जीतते।

“पुणे पदवीधर – वही गलती ” : यह सीट भी पुराना बालेकिल्ला – प्रकाश जावड़ेकर, फिर चंद्रकांतदादा पाटील जीते। 2020 में चंद्रकांतदादा विधानसभा में गए तो भाजपा हार गई। इस बार फिर वही – कोल्हापुर की स्मिता जाधव को टिकट, जो पहले कभी राजनीति-समाजकारण में सक्रिय नहीं। पुढारी दैनिक और पुढारी न्यूज के मालक प्रतापसिंह जाधव की बहू, पूर्व राज्यपाल डी.वाई. पाटील की नात, इसके अलावा कोई क्वालिफिकेशन नहीं। टिकट मिलने के बाद ही भाजपा सदस्य बनीं। संगठन, संवाद, मतदाता तक पहुंचने का अनुभव नहीं, प्रचार कमजोर। जबकि पुणे में राजेश पांडे जैसे पुराने कार्यकर्ता इच्छुक थे, जिन्होंने मतदाता पंजीकरण भी कराया था। उन्हें दरकिनार कर ब्राह्मण चेहरा नहीं चाहिए और पुढारी समूह हाथ में आएगा, इस हिसाब से टिकट दिया गया। सामने शरद पवार की उम्मीदवार हर्षदा देशमुख जाधव, 5 साल से बंधणी कर रही थीं, पवार की ताकत पीछे, उन्होंने धोबीपछाड़ दे दी।

पुरानी परंपरा टूटी : पहले जनसंघ-भाजपा में इस सीट के लिए 2 साल पहले उम्मीदवार तय कर बंधणी करने को कहते थे। तभी कांग्रेस की सत्ता में भी बच्छराज व्यास, आठवले, मोतीराम लहाने, दादा देशकर, प्रमिला टोपले, गंगाधरराव फडणवीस जैसे लोग परिषद में चुनकर सरकार को घेरते थे। अब तीसरे किसी को मतदाता पंजीकरण का काम दिया जाता है, ऐनवक्त उम्मीदवार तय होता है, स्थानीय कार्यकर्ता को पूछा ही नहीं जाता, तो हार तो होगी ही।

निष्कर्ष : देशभर में 28 विधान परिषद सीटों पर चुनाव हुए, कांग्रेस को देश में सिर्फ 1 सीट मिली और वो भी नागपुर में – जहां संघ का मुख्यालय है, भाजपा की मातृसंस्था का जन्मस्थान है। भाजपा के लिए यह सिर्फ हार नहीं, संदेश है।

पुराने, वर्षों से झिजले कार्यकर्ता सतरंजी उठाने के लिए ही हैं क्या? नए आए लोगों को सिर पर बिठाना और पुरानों का अपमान, यही नाराजगी का कारण है। अब प्रदेश के वरिष्ठों को कठोर आत्मपरीक्षण करना होगा, चूक कहां हुई देखना होगा और पुराने कार्यकर्ताओं को विश्वास में लेकर मौका देना होगा, तभी पुराने गढ़ वापस मिलेंगे।

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