- 5 में से 3 सीट लड़ी, सिर्फ पुणे शिक्षक जीते – नागपुर पदवीधर जो जनसंघ काल से भाजपा का था, पुणे पदवीधर जो जावड़ेकर-चंद्रकांत पाटील का बालेकिल्ला था, दोनों हारे – अनिल सोले को नकार कर सुधाकर कोहले को थोपना और स्मिता जाधव को कोल्हापुर से लाकर लड़ाना पड़ा भारी – 15,000 अवैध वोटों में 9,000 पर सिर्फ ‘2’ लिखकर पर्ची खराब, कार्यकर्ताओं की नाराजगी का नतीजा ?
नागपुर/पुणे, 29 अक्टूबर 2026 : महाराष्ट्र विधान परिषद की 5 सीटों के लिए चुनाव खत्म, नतीजे आए – भाजपा 1, शिंदे शिवसेना 1, कांग्रेस 1 और शरद पवार NCP को 2 सीटें। सत्ता में बैठी महायुति और उसकी अगुवाई कर रही भाजपा के लिए यह आत्ममंथन का समय है।
भाजपा ने 5 में से 3 सीटें लड़ी थीं – नागपुर पदवीधर, पुणे पदवीधर और पुणे शिक्षक। जीती सिर्फ पुणे शिक्षक। नागपुर और पुणे दोनों पदवीधर सीटें, जो भाजपा की पक्की मानी जाती थीं, हाथ से निकल गईं।
“नागपुर – जनसंघ से भाजपा तक 60 साल का गढ़ ढहा “
नागपुर पदवीधर सीट महाराष्ट्र बनने से भी पहले से जनसंघ-भाजपा के पास थी।
- पंडित बच्छराज व्यास – जनसंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष, यहां से जीते
- गोविंदराव आठवले – जनसंघ से
- 1978 और 1984 – गंगाधरराव फडणवीस (देवेंद्र फडणवीस के पिता) जनता पार्टी/भाजपा से जीते
- नितीन गडकरी – 25 साल इस सीट के प्रतिनिधि
- 2014 – अनिल सोले जीते, सभागृह के अंदर-बाहर अच्छी छाप छोड़ी
2020 में सोले का टिकट कटा, देवेंद्र फडणवीस के करीबी संदीप जोशी को ऐनवक्त टिकट दिया, तैयारी नहीं, 6 जिलों में संपर्क नहीं, हारे और कांग्रेस के अभिजीत वंजारी पहली बार जीते।
2024 में इतिहास दोहराया गया। सोले फिर इच्छुक थे, तैयारी की थी, कहते हैं टिकट मिलता तो निकाल लेते। पर उन्हें फिर नकारा गया। पालकमंत्री चंद्रशेखर बावनकुळे के करीबी सुधाकर कोहले को टिकट दिया गया। चर्चा है कि सोले नहीं चाहिए, बावनकुळे को कोहले चाहिए इसलिए दिया।
जाति का गणित भी लगाया गया – वंजारी और कोहले की जात एक, वोट कटेंगे तो फायदा होगा। पर पदवीधर वोटर जात नहीं, काम देखता है। कोहले नागपुर महापालिका के नगरसेवक, एक टर्म विधायक रहे, पर नागपुर के बाहर 5 जिलों में पकड़ नहीं। फिर भी जिद से थोपे गए।
“बगावत और 150 वोट का किस्सा ” : सोले ने बगावत की। जनसंघ के संस्थापक अध्यक्ष बच्छराज व्यास के बेटे, पूर्व विधायक गिरीश व्यास ने प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। भाजपा के होश उड़े। प्रदेशाध्यक्ष रवींद्र चव्हाण सोले के घर मनाने गए, मिले ही नहीं। आखिर खुद मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को सारे प्रोटोकॉल छोड़कर सोले के घर जाना पड़ा। तब जाकर सोले ने पीछे हटने का ऐलान किया, पर नाराजगी आज भी कायम है।
मुख्यमंत्री नागपुर में डेरा डाले रहे, बैठकें लीं, गडकरी, बावनकुळे ने जोर लगाया, फिर भी नहीं बची। कार्यकर्ता कोहले के लिए घूमते नहीं दिखे। पदवीधर चुनाव व्यक्तिगत संपर्क का है – मतदाता पंजीकरण से लेकर मार्गदर्शन तक कार्यकर्ता ही पहुंचता है। योग्य उम्मीदवार न होने और वरिष्ठों को विश्वास में न लेने से कार्यकर्ता निष्क्रिय रहे।
और फिर 15,000 वोट अवैध। इसमें 9,000 पर्चियों पर सिर्फ कोहले के नाम के सामने ‘2’ लिखा था, ‘1’ कहीं नहीं। अगर ‘1’ लिखते तो वैध हो जातीं। कार्यकर्ताओं ने सही मार्गदर्शन नहीं किया। कुछ का कहना है – जानबूझकर ‘2’ लिखकर पर्ची खराब की गई – कोहले योग्य नहीं, पर वंजारी को भी वोट नहीं देना, इसलिए घापा किया। किसी गुट ने ऐसा करने को कहा हो सकता है। हालांकि स्थानीय वरिष्ठ नेता इसे खारिज करते हैं, कहते हैं 9,000 वोटर अलग-अलग इलाके के थे, चूक न होती तो कोहले आसानी से जीतते।
“पुणे पदवीधर – वही गलती ” : यह सीट भी पुराना बालेकिल्ला – प्रकाश जावड़ेकर, फिर चंद्रकांतदादा पाटील जीते। 2020 में चंद्रकांतदादा विधानसभा में गए तो भाजपा हार गई। इस बार फिर वही – कोल्हापुर की स्मिता जाधव को टिकट, जो पहले कभी राजनीति-समाजकारण में सक्रिय नहीं। पुढारी दैनिक और पुढारी न्यूज के मालक प्रतापसिंह जाधव की बहू, पूर्व राज्यपाल डी.वाई. पाटील की नात, इसके अलावा कोई क्वालिफिकेशन नहीं। टिकट मिलने के बाद ही भाजपा सदस्य बनीं। संगठन, संवाद, मतदाता तक पहुंचने का अनुभव नहीं, प्रचार कमजोर। जबकि पुणे में राजेश पांडे जैसे पुराने कार्यकर्ता इच्छुक थे, जिन्होंने मतदाता पंजीकरण भी कराया था। उन्हें दरकिनार कर ब्राह्मण चेहरा नहीं चाहिए और पुढारी समूह हाथ में आएगा, इस हिसाब से टिकट दिया गया। सामने शरद पवार की उम्मीदवार हर्षदा देशमुख जाधव, 5 साल से बंधणी कर रही थीं, पवार की ताकत पीछे, उन्होंने धोबीपछाड़ दे दी।
पुरानी परंपरा टूटी : पहले जनसंघ-भाजपा में इस सीट के लिए 2 साल पहले उम्मीदवार तय कर बंधणी करने को कहते थे। तभी कांग्रेस की सत्ता में भी बच्छराज व्यास, आठवले, मोतीराम लहाने, दादा देशकर, प्रमिला टोपले, गंगाधरराव फडणवीस जैसे लोग परिषद में चुनकर सरकार को घेरते थे। अब तीसरे किसी को मतदाता पंजीकरण का काम दिया जाता है, ऐनवक्त उम्मीदवार तय होता है, स्थानीय कार्यकर्ता को पूछा ही नहीं जाता, तो हार तो होगी ही।
निष्कर्ष : देशभर में 28 विधान परिषद सीटों पर चुनाव हुए, कांग्रेस को देश में सिर्फ 1 सीट मिली और वो भी नागपुर में – जहां संघ का मुख्यालय है, भाजपा की मातृसंस्था का जन्मस्थान है। भाजपा के लिए यह सिर्फ हार नहीं, संदेश है।
पुराने, वर्षों से झिजले कार्यकर्ता सतरंजी उठाने के लिए ही हैं क्या? नए आए लोगों को सिर पर बिठाना और पुरानों का अपमान, यही नाराजगी का कारण है। अब प्रदेश के वरिष्ठों को कठोर आत्मपरीक्षण करना होगा, चूक कहां हुई देखना होगा और पुराने कार्यकर्ताओं को विश्वास में लेकर मौका देना होगा, तभी पुराने गढ़ वापस मिलेंगे।