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छुट्टियों के बोझ तले दबा प्रशासन: सरकारी कार्यसंस्कृति पर सवाल और अर्थव्यवस्था को नुकसान

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  • विकसित भारत का सपना तभी साकार होगा जब जवाबदेही बढ़ेगी, काम टालने की मानसिकता खत्म होगी – नागपुर के सामाजिक चिंतक संजय अग्रवाल का विस्तृत विश्लेषण

नागपुर – भारत को दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने और विकसित राष्ट्र कहलाने का सपना दिखाया जा रहा है। प्रतिभा है, युवा शक्ति है, उद्यमशीलता है, संसाधन हैं। पर सवाल है – क्या प्रशासनिक व्यवस्था आर्थिक क्षमता के अनुरूप काम कर रही है ?

एक तरफ किसान कर्ज, मौसम, बाजार झेलता है। मजदूर को रोज काम करना पड़ता है। निजी कर्मचारी को लक्ष्य पूरा करना होता है। व्यापारी को टिके रहने के लिए संघर्ष करना पड़ता है। दूसरी तरफ सरकारी कार्यालयों में शिकायत आम है – काम समय पर नहीं, फाइलें लंबित, अधिकारी उपलब्ध नहीं, नागरिक को अपने ही काम के लिए चक्कर लगाने पड़ते हैं।

यह सिर्फ असुविधा नहीं, उत्पादकता, निवेश, रोजगार और विकास से जुड़ा मामला है। जनता के कर से वेतन पाने वाली व्यवस्था जनता के प्रति कितनी जिम्मेदार है, यही सवाल है। कर्मचारी को विश्राम, परिवार और वैधानिक छुट्टी का अधिकार है, पर अधिकार के साथ कर्तव्य भी है। वेतन, पद, सुविधा के साथ गुणवत्ता और जवाबदेही भी सुनिश्चित हो।

  1. छुट्टियों की व्यवस्था –

भारत विविध धर्मों, पंथों का देश है। त्योहारों का सामाजिक महत्व है। पर अवकाश व्यवस्था पर विचार जरूरी है। केंद्र के सामान्य प्रशासनिक कार्यालयों में शनिवार-रविवार बंद – साल में 104 दिन। दिल्ली स्थित केंद्रीय कार्यालयों के लिए 2026 में 17 राजपत्रित अवकाश घोषित हैं, पर कुछ शनि-रवि को पड़ते हैं तो दोहराव जोड़ना सही नहीं। राज्यों में सूची अलग।

असली चिंता छुट्टियों की संख्या नहीं, उपलब्ध कार्यदिवसों का उत्पादक उपयोग है। समय पर काम शुरू न हो, निर्णय में देरी हो, तो कार्यदिवस का महत्व घट जाता है। जनता के कर से वेतन पाने वाले को जनता के समय की कीमत समझनी चाहिए।

  1. जवाबदेही कहां है ?

निजी में काम खराब तो मूल्यांकन और कार्रवाई। सरकारी में नागरिक को पता ही नहीं काम किसके पास अटका, जिम्मेदार कौन, शिकायत पर कार्रवाई होगी या नहीं।

एक वर्ग निष्ठा से काम करता है, पर जहां लापरवाही, कामचोरी है, वहां सख्त कार्रवाई जरूरी है। समय पर आना, उपस्थित रहना, फाइल बढ़ाना एहसान नहीं, बुनियादी जिम्मेदारी है। फिर भी प्रमाणपत्र के लिए हफ्तों इंतजार, पेंशन के लिए बुजुर्ग के चक्कर, किसान को सहायता के लिए चक्कर – तो सवाल उठना स्वाभाविक है। सरकारी नौकरी सेवा का दायित्व है, सिर्फ वेतन-सुरक्षा का साधन नहीं। कर्मचारी संगठनों को भी अधिकारों के साथ कार्यक्षमता, अनुशासन और नागरिक जिम्मेदारी पर जोर देना चाहिए। अच्छे काम पर प्रोत्साहन और लापरवाही पर जवाबदेही, दोनों हों।

  1. आर्थिक नुकसान के प्रमाणित आंकड़े –

क) शिकायतों का पहाड़ – CPGRAMS पर 2021 से फरवरी 2026 तक 1,11,89,384 शिकायतें। 2025 में ही 22,78,256। 2025 में केंद्रीय मंत्रालयों में औसत निस्तारण 15 दिन, 82.1% शिकायतें 21 दिन में निपटीं। निस्तारण अच्छी बात है, पर बेहतर होता लापरवाही पहले ही सुधरती ताकि शिकायत की नौबत कम आती।

ख) अनुपस्थिति की कीमत – NBER में 2014 के अध्ययन में भारत में सरकारी शिक्षकों की अनधिकृत अनुपस्थिति की वेतन लागत लगभग 1.5 अरब डॉलर प्रतिवर्ष आंकी गई। यह 2026 का नुकसान नहीं, उस समय के आंकड़ों पर आधारित है। शोध में मिला कि निरीक्षण बढ़ने से अनुपस्थिति घटी। यह सिर्फ वेतन की बर्बादी नहीं, बच्चों की पढ़ाई, पाठ्यक्रम और गरीब बच्चों के अवसर पर असर है। सबक – सरकारी निष्क्रियता की कीमत खजाना ही नहीं, नागरिक भी चुकाता है।

ग) GDP पर गणितीय उदाहरण – PRS की अप्रैल 2026 समीक्षा में 2025-26 के लिए नाममात्र GDP लगभग ₹345 लाख करोड़ अनुमानित। इस पर –
0.1% उत्पादकता का मतलब ₹34,500 करोड़
0.5% का मतलब ₹1,72,500 करोड़
1% का मतलब ₹3,45,000 करोड़
यह वास्तविक नुकसान का दावा नहीं, बल्कि बड़ी अर्थव्यवस्था में छोटी उत्पादकता वृद्धि के महत्व को समझाने का उदाहरण है। सरकार को देरी, लंबित अनुमति, बाधाओं की आर्थिक लागत पर व्यवस्थित अध्ययन कराना चाहिए।

  1. छुट्टी से खतरनाक मानसिकता –

छुट्टी लेना अपराध नहीं। खतरनाक है छुट्टी के नाम पर काम ठप होना, पहले फाइल रोकना, खुलने के बाद भी निपटारा न करना। एक दिन जाओ तो अधिकारी नहीं, अगले दिन कर्मचारी नहीं, फिर दस्तावेज की कमी, हफ्तों लटकना। दिहाड़ी मजदूर की कमाई गई, छोटे व्यापारी का कारोबार अटका, किसान की बुआई अटकी। क्या व्यवस्था नुकसान की जिम्मेदारी लेती है? लापरवाह से पूछा जाता है क्यों देरी? पीड़ित को समाधान मिलता है? जवाब कागजी नियम से नहीं, कार्रवाई से मिलना चाहिए।

  1. चुनाव, हड़ताल, बंदी –

चुनाव, आपदा, कानून-व्यवस्था, आंदोलन का असर पड़ता है। चुनाव लोकतंत्र के लिए अनिवार्य, आपदा में राहत प्राथमिक। पर इनके बहाने नागरिक सेवाएं अनिश्चितकाल तक बाधित न हों। वैकल्पिक स्टाफ, जरूरी सेवाओं की निरंतरता, हड़ताल में भी जीवन-आजीविका से जुड़ी सेवाएं चालू रखने की योजना हो। जीवन, आजीविका, अधिकार से जुड़ी सेवाओं को प्राथमिकता मिले।

  1. 8 सख्त सुधार कदम –
  2. बायोमेट्रिक उपस्थिति + परिणाम समीक्षा – विश्वसनीय हाजिरी के साथ काम के नतीजों की जांच।
  3. हर काम की समयसीमा – नागरिक सेवाओं के लिए स्पष्ट टाइमलाइन, देरी पर कारण, लापरवाही पर कार्रवाई।
  4. काम पर मूल्यांकन – वार्षिक मूल्यांकन सिर्फ वरिष्ठ की राय नहीं, गुणवत्ता, लंबित, समयबद्ध निपटान और नागरिक प्रतिक्रिया पर।
  5. लापरवाही पर दंड – बार-बार अनुपस्थिति, फाइल रोकना, भ्रष्टाचार पर निष्पक्ष जांच, नियमानुसार कार्रवाई, पक्ष रखने का मौका देकर।
  6. अच्छे काम को इनाम – कम समय में गुणवत्तापूर्ण काम, समस्या समाधान पर सम्मान।
  7. डिजिटल व्यवस्था – आवेदन, भुगतान, फाइल स्टेटस ऑनलाइन, अधिकारी न होने पर दूसरे अधिकृत को ट्रांसफर।
  8. छुट्टियों की समीक्षा – सार्वजनिक और वैकल्पिक अवकाशों की समीक्षा, रोटेशन से जरूरी सेवाएं चालू, वैधानिक अधिकारों का उल्लंघन किए बिना निरंतरता।
  9. जवाबदेही सार्वजनिक – हर विभाग की वार्षिक रिपोर्ट में प्राप्त, निस्तारित, लंबित, देरी के कारण सार्वजनिक।

उद्देश्य कर्मचारी को शत्रु मानना नहीं, व्यवस्था को जनता के प्रति जिम्मेदार बनाना है।

निष्कर्ष –

भारत को विकसित बनना है तो प्रशासन में सुधार जरूरी है। किसान, मजदूर, व्यापारी, निजी कर्मचारी जवाबदेह हैं, सरकारी व्यवस्था से भी वही अपेक्षा हो। सरकारी कर्मचारी रीढ़ हैं, आलोचना अपमान के लिए नहीं, कमियों को उजागर करने के लिए है। ईमानदार को दोषी ठहराना भी गलत है, पर्याप्त स्टाफ, संसाधन, प्रशिक्षण के बिना बेहतर परिणाम नहीं। सुधार की जिम्मेदारी सरकार, नेतृत्व और कर्मचारी सबकी।

पर सिद्धांत पर समझौता नहीं – सार्वजनिक धन से चलने वाली व्यवस्था को सार्वजनिक हित में परिणाम देने ही होंगे। अधिकार के लिए आवाज तो नागरिक अधिकारों के प्रति संवेदनशीलता भी। समय पर वेतन चाहिए तो सेवा भी समय पर। नौकरी की सुरक्षा चाहिए तो जिम्मेदारी भी।

देश को छुट्टियों से नहीं, कामचोरी से नुकसान होता है। छुट्टी अधिकार है, लापरवाही किसी का अधिकार नहीं। विकसित भारत तभी बनेगा जब उपस्थिति के साथ उत्पादकता, पद के साथ जिम्मेदारी और वेतन के साथ जवाबदेही अनिवार्य होगी।

  • संजय अग्रवाल, सामाजिक चिंतक, नागपुर
    -स्रोत – प्रेस सूचना ब्यूरो, NBER, PRS लेजिस्लेटिव रिसर्च CPGRAMS

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जीवन से सीखी कूटनीति की कला

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  • सत्य को प्रिय बनाकर कहना ही सनातन धर्म है – डॉ. एस. एम. राजन का जीवन-दर्शन

नागपुर, 27 अक्टूबर :

किताबों से नहीं, जीवन के कड़वे, कठोर और सुंदर अनुभवों की यूनिवर्सिटी से मैंने कूटनीति का असली अर्थ सीखा है। यह दुनिया गुलाबों का बगीचा नहीं, बल्कि एक घना, अप्रत्याशित जंगल है। यहाँ अलग-अलग मानसिकता, विचारधारा, स्वभाव, महत्वाकांक्षा और परिपक्वता के लोग मिलते हैं। उनके बीच बिना टकराव, बिना दुश्मनी और बिना संघर्ष के चलना वास्तव में हिमालय जैसा कठिन कार्य है। ऐसी परिस्थिति में मैंने जाना कि कूटनीति पाखंड नहीं है। कूटनीति बुद्धिमत्ता है। कूटनीति गरिमा के साथ जीवित रहने की कला है।

इसी अनुभव से मैंने इस द्वेष और कटुता के युग में “कठोर से कठोर बात को भी सबसे मधुर तरीके से कहने की कला” सीखी है। और विनम्रता के साथ कह सकता हूँ कि मतभेदों को कम करने में, विरोधियों को परिचितों में बदलने में और कड़वाहट को मित्रता में बदलने में मैं काफी हद तक सफल रहा हूँ।

इस कला की शाश्वत नींव हमारे ऋषियों ने एक अमर संस्कृत सूत्र में दी है, जो मेरे जीवन का मार्गदर्शक मंत्र बन गया है –

सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात्, न ब्रूयात् सत्यम् अप्रियम्।
प्रियं च नानृतं ब्रूयात्, एष धर्मः सनातनः॥

अर्थात – सत्य बोलो, प्रिय बोलो, अप्रिय सत्य मत बोलो और प्रिय लगने वाला झूठ भी मत बोलो। यही सनातन धर्म है।

इस एक श्लोक में पूरी कूटनीति का दर्शन समाया है। यह सत्य को दबाने के लिए नहीं कहता, सत्य को परिष्कृत करने के लिए कहता है। यह चापलूसी करने के लिए नहीं कहता, करुणा के साथ सत्यनिष्ठ होने के लिए कहता है।

1. सत्यं ब्रूयात् – मुझे सत्य बोलना ही चाहिए, क्योंकि सत्य के बिना कूटनीति छल बन जाती है।
2. प्रियं ब्रूयात् – सत्य को प्रिय तरीके से बोलना चाहिए, क्योंकि कठोरता से बोला गया सत्य हृदय को घायल करता है और दुश्मनी पैदा करता है।
3. सत्यम् अप्रियम् न ब्रूयात् – वह सत्य भी नहीं बोलना चाहिए जो अनावश्यक रूप से कठोर, अपमानजनक और दुखदायी हो, क्योंकि ऐसा सत्य संबंधों को सुधारने के बजाय नष्ट कर देता है।

यही वह स्वर्णिम मध्यम मार्ग है जिसका मैंने जीवन भर अभ्यास किया है।

जीवन के तीन अनुभव –

पहला अनुभव – वह सहकर्मी जो युद्ध चाहता था, मैंने कॉफी पेश की : अकादमिक जीवन में एक सहकर्मी ने दक्षिण भारतीय होने के कारण मेरे प्रति द्वेष पाल लिया। वह मेरी प्रतिष्ठा को धूमिल करने लगा। शुभचिंतकों ने पलटवार करने की सलाह दी। लेकिन मैंने कूटनीति चुनी। मैंने उसे घर बुलाया, सम्मान के साथ दक्षिण भारतीय फिल्टर कॉफी पेश की और मुस्कुराते हुए कहा – “भाई, आप इस पेशे में मेरे भाई हैं। अगर अनजाने में मैंने आपको ठेस पहुंचाई हो तो क्षमा करें।” वह टकराव की उम्मीद कर रहा था, उसे करुणा मिली। उस दिन दुश्मनी की दीवार ढह गई और वह मेरा सबसे करीबी मित्र बन गया। मैंने सीखा कि एक मधुर शब्द तेज से तेज तलवार को भी कुंद कर सकता है।

दूसरा अनुभव – क्रोधित मुवक्किल और शांत जीभ की शक्ति : रामनगर में वकालत के दौरान एक व्यक्ति क्रोध में जलता हुआ मेरे चैंबर में आया। वह सबको गाली दे रहा था। यदि मैं भी उसी लहजे में बोलता तो विस्फोट हो जाता। मैंने 45 मिनट तक बिना टोके उसकी बात सुनी। फिर धीरे से कहा – “आपका दर्द सच्चा है, आपका गुस्सा जायज है, लेकिन अगर हम इसे गुस्से में व्यक्त करेंगे तो केस हार जाएंगे। आइए इसे कानून में, गरिमा के साथ व्यक्त करें, हम जीतेंगे।” वह शांत हो गया, रो पड़ा और बोला – “सर, आज तक किसी ने मुझसे ऐसे बात नहीं की।”

तीसरा अनुभव – कठोर बोलने वाले वरिष्ठ छात्र को आशीर्वाद : हाल ही में वकालत में असफल एक मध्यम आयु के व्यक्ति ने फोन पर मुझसे कठोर भाषा में बात की। खून खौल उठा। पहली प्रतिक्रिया पलटवार करने की थी। लेकिन संस्कार बीच में आ गए। मैंने “सत्यम् अप्रियम् न ब्रूयात्” को याद रखा। मैं चुप रहा, एक भी अपशब्द नहीं बोला। बाद में मैंने गरिमा के साथ उसे बीस साल पुराने संबंध की याद दिलाई और कॉलेज में पढ़ाने के कुछ असाइनमेंट भी दिए।

यही कूटनीति है। उकसाए जाने पर भी न उकसाना। अपमानित होने पर भी अपमान न करना। आहत होने पर भी घाव भरना।

मित्रों, यह दुनिया वास्तव में जंगल जैसी है। यहाँ आपको अहंकार से दहाड़ते मानव रूपी बाघ मिलेंगे, वर्चस्व चाहने वाले शेर मिलेंगे, ईर्ष्या और विश्वासघात के साथ पीछे से डसने वाले विषैले सर्प मिलेंगे। यदि आप हर बाघ, हर शेर, हर सर्प से लड़ने की कोशिश करेंगे तो आप टुकड़े-टुकड़े हो जाएंगे।

लेकिन यदि आप कूटनीतिक रणनीति सीख लें – कब बोलना है, कब चुप रहना है, कब मुस्कुराना है, कब अनदेखा करना है, कब बिना अशिष्ट हुए दृढ़ होना है और कब बिना कमजोर हुए कोमल होना है – तो आप उसी जंगल में एक बुद्धिमान ऋषि की तरह सुरक्षित, शानदार तरीके से चल सकते हैं।

मैंने सीखा है कि कूटनीति साहस का सर्वोच्च रूप है। कायर गाली देता है, बुद्धिमान मनाता है। मूर्ख दुश्मन बनाता है, कूटनीतिज्ञ दुश्मनों को मित्र बना लेता है।

यही मेरे जीवन का सबक है, यही मेरा दर्शन है – सत्यं ब्रूयात्, प्रियं ब्रूयात्, न ब्रूयात् सत्यम् अप्रियम्। सत्य बोलो, पर मिठास के साथ बोलो। यदि तुम उस सत्य को प्रेम के साथ नहीं कह सकते तो बेहतर है कि वह सत्य मत कहो। दृढ़ बनो, पर कोमल बनो। निडर बनो, पर क्षमाशील बनो। इसी तरह मैंने इस दुनिया नामक जंगल में जीवित रहना और सफल होना सीखा है।

  • प्रो. डॉ. एस. एम. राजन

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क्या गडकरी की पाठशाला के शिष्यों को फडणवीस दे रहे हैं राजनीतिक वनवास ?

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  • राजनीतिक विश्लेषक किशोर तिवारी का बड़ा सवाल – मुनगंटीवार का मंत्रिमंडल से बाहर रहना संयोग या सत्ता के केंद्रीकरण का पैटर्न, खडसे-तावडे से लेकर खोपडे तक पुराने कार्यकर्ताओं में बेचैनी, संघ की सामूहिक नेतृत्व परंपरा पर उठे सवाल

नागपुर, 26 अक्टूबर 2026 :

महाराष्ट्र भाजपा के अंदर चल रही असहज खामोशी पर वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक किशोर तिवारी ने एक तीखा विश्लेषणात्मक लेख लिखकर सत्तारूढ़ नेतृत्व से सात सीधे सवाल पूछे हैं। लेख का मूल प्रश्न है – नितीन गडकरी ने जिन्हें गढ़ा, क्या उन्हीं को देवेंद्र फडणवीस राजनीतिक वनवास में भेज रहे हैं ?

तिवारी लिखते हैं, यह सवाल सिर्फ सात बार विधायक रहे सुधीर मुनगंटीवार तक सीमित नहीं है। यह जनसंघ, ABVP, संघ और भाजपा को खून-पसीने से सींचने वाले हजारों निष्ठावान कार्यकर्ताओं के राजनीतिक अस्तित्व का सवाल है। ‘सुपर भारत’ में छपी खबर ‘सुधीर मुनगंटीवार कितने दिन राजनीतिक वनवास भुगतेंगे ?’ इसी बेचैनी को आवाज देती है।

गडकरी की पाठशाला और फडणवीस का उदय –
लेख में तिवारी याद दिलाते हैं कि नितीन गडकरी सिर्फ नेता नहीं, कार्यकर्ता गढ़ने वाले व्यक्तित्व थे। देवेंद्र फडणवीस का नागपुर महापौर से लेकर मुख्यमंत्री तक का सफर गडकरी के राजनीतिक समर्थन के बिना नहीं समझा जा सकता। उस दौर में एकनाथ खडसे, मुनगंटीवार, विनोद तावडे जैसे वरिष्ठ नेता मौजूद थे, फिर भी गडकरी ने नई पीढ़ी को आगे लाने की उदारता दिखाई।

तिवारी का सवाल है – जिन्होंने आपके लिए राजनीतिक रास्ता खोला, क्या आज उन्हीं के साथियों के लिए दरवाजे बंद हो रहे हैं ?

खडसे, तावडे, मुनगंटीवार से खोपडे तक – संयोग या पैटर्न ?
लेखक सवालों की झड़ी लगाते हैं –
एकनाथ खडसे को भाजपा क्यों छोड़नी पड़ी ?
विनोद तावडे को महाराष्ट्र की सत्ता से दूर राष्ट्रीय संगठन में क्यों जाना पड़ा ?
मुनगंटीवार को मंत्रिमंडल के बाहर क्यों रखा गया ?
चंद्रशेखर बावनकुले के उतार-चढ़ाव, कृष्णा खोपडे, गिरीश व्यास, माधव भंडारी, केशव उपाध्ये, डॉ. उपेंद्र कोठेकर, गिरीश देशमुख जैसे संगठन की परंपरा से जुड़े नामों की वर्तमान स्थिति क्या इत्तेफाक है ?

तिवारी कहते हैं, पद सबको मिले हैं, लेकिन मूल प्रश्न है – क्या गडकरी के करीबी माने जाने वाले कार्यकर्ताओं को निर्णय प्रक्रिया में न्यायोचित स्थान मिल रहा है ? महाराष्ट्र के हर जिले में जनसंघ के कठिन दिनों में, आपातकाल में जेल भुगतने वाले, घर-परिवार दांव पर लगाकर संगठन खड़ा करने वाले पुराने स्वयंसेवक आज उपेक्षित महसूस कर रहे हैं।

मोदी-शाह के समर्थन से एक नेतृत्व की मोनोपॉली ?
तिवारी लिखते हैं, फडणवीस के पास आज सत्ता और संगठन दोनों की ताकत है, उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह का खुला समर्थन प्राप्त है। लेकिन क्या इस समर्थन का इस्तेमाल पुरानों को जोड़ने के लिए हो रहा है या वैकल्पिक नेतृत्व को कमजोर करने के लिए ?

कभी सामूहिक नेतृत्व, कार्यकर्ता का सम्मान और वैचारिक निष्ठा का आग्रह करने वाली भाजपा में आज निष्ठा का पैमाना क्या है – पार्टी के लिए किया गया त्याग या मौजूदा सत्ता केंद्र से निकटता ?

संघ संस्कार या सत्ता का अहंकार ?
संघ में व्यक्ति से बड़ा संगठन, पद से बड़ा कार्य माना जाता है। फिर संघ के संस्कारों से निकले वरिष्ठ कार्यकर्ताओं को अपने भविष्य को लेकर असुरक्षा क्यो?

“पार्टी में अनुशासन होना चाहिए, लेकिन अनुशासन का मतलब मौन नहीं। निष्ठा होनी चाहिए, लेकिन निष्ठा का मतलब व्यक्तिपूजा नहीं। और नेतृत्व होना चाहिए, लेकिन नेतृत्व का मतलब एकाधिकार नहीं!” – तिवारी लिखते हैं।

फडणवीस से अपील और सात सीधे सवाल –
लेखक स्पष्ट करते हैं कि फडणवीस के कर्तृत्व को कम आंकना मकसद नहीं। लेकिन कोई भी नेतृत्व शून्य से नहीं बनता। गडकरी ने कई लोगों को मौका दिया, वही उदारता अब फडणवीस से अपेक्षित है।

अंत में तिवारी ने सात सवाल पूछे हैं :

  1. सात बार चुने गए मुनगंटीवार को मंत्रिमंडल से बाहर रखने का राजनीतिक कारण क्या है ?
  2. क्या गडकरी के करीबी कार्यकर्ताओं के लिए अलग मानदंड अपनाए जा रहे हैं ?
  3. खडसे, तावडे जैसे वरिष्ठों के राजनीतिक मोड़ में संगठन का निर्णय कितना और आंतरिक सत्ता संघर्ष कितना ?
  4. नागपुर-विदर्भ के पुराने संघनिष्ठ कार्यकर्ताओं को निर्णय प्रक्रिया में उचित स्थान मिल रहा है क्या ?
  5. क्या वरिष्ठ नेताओं को मतभिन्नता रखने की स्वतंत्रता बची है ?
  6. मोदी-शाह नेतृत्व में महाराष्ट्र में सामूहिक नेतृत्व की परंपरा टिकेगी क्या ?
  7. जिन्होंने फडणवीस को गढ़ने में मदद की, उन्हीं के साथियों को आज अस्तित्व के लिए संघर्ष क्यों करना पड़ रहा है ?

तिवारी का निष्कर्ष है – “यह सिर्फ मुनगंटीवार की पीड़ा नहीं, यह भाजपा की पुरानी पीढ़ी के सम्मान का सवाल है। सत्ता स्थायी नहीं होती, पर संघर्ष से खड़े हुए कार्यकर्ता ही किसी भी दल की असली नींव होते हैं। इतिहास में सत्ता के साल नहीं गिने जाते, सत्ता में रहते हुए आपने साथियों से कैसा व्यवहार किया, यह दर्ज होता है।”

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राज ठाकरे और संजय राउत के दिवास्वप्न – ‘कुछ महीनों में देश में प्रधानमंत्री ही नहीं होगा’ जैसा दावा कितना हास्यास्पद?

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  • स्पष्ट और बेबाक – संविधान में PM पद कभी खाली नहीं रह सकता, मोदी-विरोध में बेबुनियाद बयानबाजी और विदेशी शक्तियों की साजिश का विश्लेषण

महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना प्रमुख राज ठाकरे और शिवसेना (उबाठा) के स्वघोषित विश्व प्रवक्ता संजय राउत के दो बयान इन दिनों चर्चा में हैं। अलग-अलग लगने वाले इन बयानों का ध्वनित अर्थ एक ही है – मोदी-द्वेष से उपजी गैर-जिम्मेदार भविष्यवाणी।

राज ठाकरे का दावा –
एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में राज ठाकरे ने कहा कि अगले दो-तीन महीनों में देश में ऐसी स्थिति आएगी कि प्रधानमंत्री ही नहीं होगा। राज ठाकरे की राजनीति हमेशा ‘तळ्यात-मळ्यात’ वाली रही है। कभी वे खुद को शरद पवार के कुनबे में छोड़ देते हैं, कभी मोदी से नजदीकी दिखती है। वर्षों झगड़ने के बाद अब सगे चचेरे भाई से हाथ मिला रहे हैं, कभी कांग्रेस के साथ समझौता तो कभी अभिजीत दीपके को सिर पर बिठाकर नाचना। कुल मिलाकर स्थिर भूमिका के अभाव वाले नेता।

उन्होंने यह भविष्यवाणी किस आधार पर की? क्या संविधान पढ़ा? प्रथा-परंपरा देखी?

हमारे देश में संविधान के अनुसार प्रधानमंत्री का पद कभी रिक्त नहीं रखा जा सकता। यदि मुख्यमंत्री इस्तीफा दे दे या निधन हो जाए और नया मुख्यमंत्री न बन सके तो राष्ट्रपति शासन लग सकता है। महापौर, नगराध्यक्ष, जिला परिषद अध्यक्ष या सरपंच न हो तो प्रशासक नियुक्त हो सकता है। लेकिन प्रधानमंत्री न हो तो राष्ट्रपति शासन लगाकर राष्ट्रपति शासन चलाएंगे, ऐसी व्यवस्था ही नहीं है।

इसीलिए किसी कारण प्रधानमंत्री इस्तीफा भी दे दे तो नया प्रधानमंत्री आने तक उसे कार्यवाहक प्रधानमंत्री के रूप में काम करना ही पड़ता है। राष्ट्रपति वैसी सूचना देते हैं। यदि पद पर रहते प्रधानमंत्री का निधन हो जाए तो नए कार्यवाहक प्रधानमंत्री की शपथ होने तक आधिकारिक तौर पर निधन की घोषणा भी नहीं की जाती।

मेरी याद के अनुसार 1964 में पंडित नेहरू के निधन पर गुलजारीलाल नंदा को कार्यवाहक PM की शपथ दिलाने के बाद ही निधन की घोषणा हुई थी। यही लालबहादुर शास्त्री के निधन पर भी हुआ। इंदिरा गांधी की गोली मारकर हत्या सुबह करीब 10 बजे हुई थी, एम्स ले जाते-ले जाते उनका निधन हो गया था, लेकिन पश्चिम बंगाल से राजीव गांधी के दिल्ली लौटकर कार्यवाहक PM की शपथ लेने तक सिर्फ “गोली लगी, एम्स में भर्ती” यही खबर रेडियो-टीवी पर चलती रही।

1979 में चौधरी चरण सिंह ने संसद भंग की थी, फिर भी राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी ने उन्हें नई सरकार तक कार्यवाहक रहने को कहा। यही चंद्रशेखर (1991), इंद्रकुमार गुजराल (1997) और अटल बिहारी वाजपेयी (1999) के मामले में हुआ। इसलिए “देश में प्रधानमंत्री ही नहीं होगा” यह दावा हास्यास्पद है। मान लो अगले चार महीने में गड़बड़ी हुई और मोदी को इस्तीफा देना भी पड़ा, तब भी नए PM तक उन्हें ही कार्यवाहक रहना पड़ेगा। यह संवैधानिक प्रावधान है। राज ठाकरे मन में आए वैसा बोल देते हैं, अक्सर बिना आधार के।

संजय राउत का भाकित –
शिवसेना के दशहरा मेले में संजय राउत ने कहा कि अगले 3-4 महीने में देश में भारी गड़बड़ी होगी, नरेंद्र मोदी PM नहीं रहेंगे, सत्ता परिवर्तन होगा। अभिजीत दीपके के पहले आंदोलन के बाद से ही विपक्ष को सत्ता परिवर्तन के दिवास्वप्न दिखने लगे हैं।

वास्तव में मोदी और सहयोगी पिछले 12 साल से शासन चला रहे हैं, कई अच्छे काम किए हैं, इसलिए आम आदमी कहीं न कहीं उनके साथ दिखता है। 2024 में भाजपा को झटका लगा, 303 से 240 पर आ गई। तब विपक्ष सरकार बनाएगा क्या, भाजपा ने कुछ समय इंतजार किया, लेकिन विपक्ष की आपसी खींचतान देखकर कई छोटे दलों ने मोदी के नेतृत्व वाली सरकार के साथ ही रहने का फैसला किया। आज धीरे-धीरे भाजपा का समर्थन फिर बढ़ रहा है। कुछ दलों में टूट से सांसद भाजपा में आए हैं। अप्रैल 2026 में दो-तिहाई बहुमत के अभाव में खारिज हुआ महिला आरक्षण विधेयक अब फिर पारित कराने के लिए विशेष सत्र बुलाने की हलचल है।

विपक्ष किसी तरह मौजूदा सरकार को गिराना चाहता है। यह सिर्फ इच्छा नहीं, इसके पीछे विदेशी शक्तियों का साथ होने के पुख्ता सबूत मिलने की जानकारी है। पिछले 12 साल में मोदी नेतृत्व में देश की जो प्रगति हुई, वह बाहर के विकसित देशों को पच नहीं रही। इसलिए देश में अशांति फैलाकर सरकार गिराने के प्रयास हैं। अशांति फैलाने के लिए ही ऐसे आंदोलनों को स्पॉन्सर किया जाता है। नहीं तो विदेश में पढ़ाई छोड़कर अभिजीत दीपके को विशेष विमान से भारत लाना और आंदोलन का ढांचा खड़ा करने में मदद करना, इसका क्या अर्थ निकाला जाए? अभी मतदाता सूची पुनरीक्षण के मुद्दे पर भी आंदोलन भड़काया जा रहा है, पर उसमें आम आदमी कितना है, यह जांचना जरूरी है। आम आदमी को पहले रोजी-रोटी की चिंता है, वह ऐसे आंदोलन में कभी नहीं आएगा।

आज संजय राउत की बात को कोई गंभीरता से लेता है, ऐसा किसी को नहीं लगता। वे रोज सुबह मीडिया को बुलाकर अलग-अलग फोकनाड (शेखी) हांकते हैं। कुछ मराठी चैनलों को छोड़कर कोई गंभीरता से नहीं लेता। मराठी न्यूज चैनल पर उनका बोलना दिखता है तो आम आदमी टाइमपास के तौर पर देखता है। उनकी ज्यादातर कहानियां कपोल-कल्पित और सिर्फ मनोरंजक होती हैं, तथ्य कम।

आज विपक्ष ने कुछ आंदोलन खड़े करने की कोशिश जरूर की, हिंसा भड़काने के इरादे के संकेत भी मिले, लेकिन हिंसा अभी तक नहीं हुई और मोदी सरकार होने भी नहीं देगी, ऐसा आज का चित्र है। ऐसी स्थिति में अगले चार महीने में सरकार गिरने के क्या कारण होंगे, यह राउत को तथ्यों के साथ स्पष्ट करना चाहिए, हवाई बातों से नहीं। नहीं तो आम आदमी इसे “सुबह का भोंगा” समझकर अनदेखा कर देगा, जैसे मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस उन्हें “सुबह 9 बजे का भोंगा” कहते हैं।

कुल मिलाकर अगले कुछ महीनों में देश में अराजकता और सत्ता परिवर्तन होगा और कुछ महीने PM ही नहीं रहेगा, ऐसा चित्र आज तो नहीं दिखता। राज ठाकरे और संजय राउत को दिवास्वप्न आते हैं, यह मानसिक बीमारी भी हो सकती है। हो तो इलाज कराएं।

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