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मजदूर खोज रहे दूसरा कामपारंपरिक कवेलू उद्योग पर संकट

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NAGPUR – ग्रामीण अंचलों में कभी आजीविका का मजबूत आधार माना जाने वाला पारंपरिक कवेलू (खपरैल) उद्योग अब धीरे-धीरे समाप्ति की ओर बढ़ रहा है। आधुनिक निर्माण सामग्री और पक्के मकानों के बढ़ते चलन ने इस व्यवसाय की मांग को काफी हद तक कम कर दिया है। नतीजतन वर्षों से इस काम से जुड़े मजदूर और कारीगर आज रोजगार के नए साधनों की तलाश करने को मजबूर हैं।एक समय था जब गांवों में बनने वाले अधिकांश मकानों की छतें कवेलू से ढकी होती थीं। बारिश और गर्मी से सुरक्षा के लिए यह सबसे उपयुक्त और सस्ता विकल्प माना जाता था। कवेलू निर्माण के मौसम में सैकड़ों मजदूरों को काम मिलता था और अनेक परिवारों की रोजी-रोटी इसी उद्योग पर निर्भर रहती थी। लेकिन बदलते समय के साथ सीमेंट, कंक्रीट और आधुनिक छत निर्माण तकनीकों के उपयोग ने पारंपरिक कवेलू की जगह ले ली है।

पारिश्रमिक से कम हो रही रुचिकवेलू बनाने वाले कारीगरों का कहना है कि पहले जहां पूरे वर्ष काम मिलता था, वहीं अब मांग इतनी कम हो गई है कि मेहनत के अनुरूप आय नहीं हो पाती। मजदूरी दरों में भी अपेक्षित वृद्धि नहीं हुई है। ऐसे में युवाओं की रुचि इस कार्य से लगातार कम होती जा रही है। कई परिवारों ने यह पुश्तैनी व्यवसाय छोड़कर कृषि मजदूरी, निर्माण कार्य और अन्य असंगठित क्षेत्रों में रोजगार तलाशना शुरू कर दिया है।स्थानीय मजदूरों के अनुसार पहले पारशिवनी तहसिल मे गांव-गांव में कवेलू भट्टियां संचालित होती थीं, जहां बड़ी संख्या में श्रमिक कार्यरत रहते थे। आज अधिकांश भट्टियां बंद हो चुकी हैं या सीमित स्तर पर ही उत्पादन कर रही हैं। इससे रोजगार के अवसर लगातार घट चुके हैं।

ग्रामीणों के लिए था रोजगार का प्रमुख साधनविशेषज्ञों का मानना है कि कवेलू उद्योग केवल एक निर्माण सामग्री का व्यवसाय नहीं था, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा था। इससे जुड़े कारीगर मिट्टी तैयार करने, सांचे बनाने, पकाने और परिवहन जैसे कई कार्यों में रोजगार प्राप्त करते थे। उद्योग के कमजोर पड़ने से इन सभी गतिविधियों पर असर पड़ा है।ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी कुछ लोग पारंपरिक घरों के संरक्षण के लिए कवेलू का उपयोग कर रहे हैं, लेकिन संख्या बहुत कम रह गई है। मांग घटने के कारण उत्पादन लागत बढ़ रही है और छोटे कारीगर आर्थिक संकट का सामना कर रहे हैं।

परंपरागत कला के अस्तित्व पर भी खतराकवेलू निर्माण एक विशेष प्रकार की पारंपरिक कला और तकनीकी कौशल पर आधारित कार्य है, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होता आया है। रोजगार की कमी के कारण नई पीढ़ी इस व्यवसाय से दूरी बना रही है। यदि यही स्थिति बनी रही तो आने वाले वर्षों में यह पारंपरिक कौशल पूरी तरह लुप्त होने का खतरा झेल सकता है।संरक्षण और प्रोत्साहन की मांगकारीगरों और ग्रामीणों ने शासन-प्रशासन से मांग की है कि पारंपरिक उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए विशेष योजनाएं बनाई जाएं। उनका कहना है कि यदि कवेलू उद्योग को प्रोत्साहन, आधुनिक विपणन सुविधाएं और वित्तीय सहायता उपलब्ध कराई जाए तो न केवल रोजगार के अवसर बढ़ेंगे बल्कि ग्रामीण संस्कृति और पारंपरिक निर्माण कला का संरक्षण भी संभव हो सकेगा।

ग्रामीण क्षेत्रों में बदलती निर्माण शैली ने जहां आधुनिकता को बढ़ावा दिया है, वहीं इसके कारण अनेक पारंपरिक व्यवसाय संकट के दौर से गुजर रहे हैं। कवेलू उद्योग इसका एक प्रमुख उदाहरण बनकर सामने आया है, जहां मजदूर और कारीगर अब अपने भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए दूसरे रोजगार की तलाश में जुटे हुए हैं।

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राज ठाकरे और संजय राउत के दिवास्वप्न – ‘कुछ महीनों में देश में प्रधानमंत्री ही नहीं होगा’ जैसा दावा कितना हास्यास्पद?

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  • स्पष्ट और बेबाक – संविधान में PM पद कभी खाली नहीं रह सकता, मोदी-विरोध में बेबुनियाद बयानबाजी और विदेशी शक्तियों की साजिश का विश्लेषण

महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना प्रमुख राज ठाकरे और शिवसेना (उबाठा) के स्वघोषित विश्व प्रवक्ता संजय राउत के दो बयान इन दिनों चर्चा में हैं। अलग-अलग लगने वाले इन बयानों का ध्वनित अर्थ एक ही है – मोदी-द्वेष से उपजी गैर-जिम्मेदार भविष्यवाणी।

राज ठाकरे का दावा –
एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में राज ठाकरे ने कहा कि अगले दो-तीन महीनों में देश में ऐसी स्थिति आएगी कि प्रधानमंत्री ही नहीं होगा। राज ठाकरे की राजनीति हमेशा ‘तळ्यात-मळ्यात’ वाली रही है। कभी वे खुद को शरद पवार के कुनबे में छोड़ देते हैं, कभी मोदी से नजदीकी दिखती है। वर्षों झगड़ने के बाद अब सगे चचेरे भाई से हाथ मिला रहे हैं, कभी कांग्रेस के साथ समझौता तो कभी अभिजीत दीपके को सिर पर बिठाकर नाचना। कुल मिलाकर स्थिर भूमिका के अभाव वाले नेता।

उन्होंने यह भविष्यवाणी किस आधार पर की? क्या संविधान पढ़ा? प्रथा-परंपरा देखी?

हमारे देश में संविधान के अनुसार प्रधानमंत्री का पद कभी रिक्त नहीं रखा जा सकता। यदि मुख्यमंत्री इस्तीफा दे दे या निधन हो जाए और नया मुख्यमंत्री न बन सके तो राष्ट्रपति शासन लग सकता है। महापौर, नगराध्यक्ष, जिला परिषद अध्यक्ष या सरपंच न हो तो प्रशासक नियुक्त हो सकता है। लेकिन प्रधानमंत्री न हो तो राष्ट्रपति शासन लगाकर राष्ट्रपति शासन चलाएंगे, ऐसी व्यवस्था ही नहीं है।

इसीलिए किसी कारण प्रधानमंत्री इस्तीफा भी दे दे तो नया प्रधानमंत्री आने तक उसे कार्यवाहक प्रधानमंत्री के रूप में काम करना ही पड़ता है। राष्ट्रपति वैसी सूचना देते हैं। यदि पद पर रहते प्रधानमंत्री का निधन हो जाए तो नए कार्यवाहक प्रधानमंत्री की शपथ होने तक आधिकारिक तौर पर निधन की घोषणा भी नहीं की जाती।

मेरी याद के अनुसार 1964 में पंडित नेहरू के निधन पर गुलजारीलाल नंदा को कार्यवाहक PM की शपथ दिलाने के बाद ही निधन की घोषणा हुई थी। यही लालबहादुर शास्त्री के निधन पर भी हुआ। इंदिरा गांधी की गोली मारकर हत्या सुबह करीब 10 बजे हुई थी, एम्स ले जाते-ले जाते उनका निधन हो गया था, लेकिन पश्चिम बंगाल से राजीव गांधी के दिल्ली लौटकर कार्यवाहक PM की शपथ लेने तक सिर्फ “गोली लगी, एम्स में भर्ती” यही खबर रेडियो-टीवी पर चलती रही।

1979 में चौधरी चरण सिंह ने संसद भंग की थी, फिर भी राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी ने उन्हें नई सरकार तक कार्यवाहक रहने को कहा। यही चंद्रशेखर (1991), इंद्रकुमार गुजराल (1997) और अटल बिहारी वाजपेयी (1999) के मामले में हुआ। इसलिए “देश में प्रधानमंत्री ही नहीं होगा” यह दावा हास्यास्पद है। मान लो अगले चार महीने में गड़बड़ी हुई और मोदी को इस्तीफा देना भी पड़ा, तब भी नए PM तक उन्हें ही कार्यवाहक रहना पड़ेगा। यह संवैधानिक प्रावधान है। राज ठाकरे मन में आए वैसा बोल देते हैं, अक्सर बिना आधार के।

संजय राउत का भाकित –
शिवसेना के दशहरा मेले में संजय राउत ने कहा कि अगले 3-4 महीने में देश में भारी गड़बड़ी होगी, नरेंद्र मोदी PM नहीं रहेंगे, सत्ता परिवर्तन होगा। अभिजीत दीपके के पहले आंदोलन के बाद से ही विपक्ष को सत्ता परिवर्तन के दिवास्वप्न दिखने लगे हैं।

वास्तव में मोदी और सहयोगी पिछले 12 साल से शासन चला रहे हैं, कई अच्छे काम किए हैं, इसलिए आम आदमी कहीं न कहीं उनके साथ दिखता है। 2024 में भाजपा को झटका लगा, 303 से 240 पर आ गई। तब विपक्ष सरकार बनाएगा क्या, भाजपा ने कुछ समय इंतजार किया, लेकिन विपक्ष की आपसी खींचतान देखकर कई छोटे दलों ने मोदी के नेतृत्व वाली सरकार के साथ ही रहने का फैसला किया। आज धीरे-धीरे भाजपा का समर्थन फिर बढ़ रहा है। कुछ दलों में टूट से सांसद भाजपा में आए हैं। अप्रैल 2026 में दो-तिहाई बहुमत के अभाव में खारिज हुआ महिला आरक्षण विधेयक अब फिर पारित कराने के लिए विशेष सत्र बुलाने की हलचल है।

विपक्ष किसी तरह मौजूदा सरकार को गिराना चाहता है। यह सिर्फ इच्छा नहीं, इसके पीछे विदेशी शक्तियों का साथ होने के पुख्ता सबूत मिलने की जानकारी है। पिछले 12 साल में मोदी नेतृत्व में देश की जो प्रगति हुई, वह बाहर के विकसित देशों को पच नहीं रही। इसलिए देश में अशांति फैलाकर सरकार गिराने के प्रयास हैं। अशांति फैलाने के लिए ही ऐसे आंदोलनों को स्पॉन्सर किया जाता है। नहीं तो विदेश में पढ़ाई छोड़कर अभिजीत दीपके को विशेष विमान से भारत लाना और आंदोलन का ढांचा खड़ा करने में मदद करना, इसका क्या अर्थ निकाला जाए? अभी मतदाता सूची पुनरीक्षण के मुद्दे पर भी आंदोलन भड़काया जा रहा है, पर उसमें आम आदमी कितना है, यह जांचना जरूरी है। आम आदमी को पहले रोजी-रोटी की चिंता है, वह ऐसे आंदोलन में कभी नहीं आएगा।

आज संजय राउत की बात को कोई गंभीरता से लेता है, ऐसा किसी को नहीं लगता। वे रोज सुबह मीडिया को बुलाकर अलग-अलग फोकनाड (शेखी) हांकते हैं। कुछ मराठी चैनलों को छोड़कर कोई गंभीरता से नहीं लेता। मराठी न्यूज चैनल पर उनका बोलना दिखता है तो आम आदमी टाइमपास के तौर पर देखता है। उनकी ज्यादातर कहानियां कपोल-कल्पित और सिर्फ मनोरंजक होती हैं, तथ्य कम।

आज विपक्ष ने कुछ आंदोलन खड़े करने की कोशिश जरूर की, हिंसा भड़काने के इरादे के संकेत भी मिले, लेकिन हिंसा अभी तक नहीं हुई और मोदी सरकार होने भी नहीं देगी, ऐसा आज का चित्र है। ऐसी स्थिति में अगले चार महीने में सरकार गिरने के क्या कारण होंगे, यह राउत को तथ्यों के साथ स्पष्ट करना चाहिए, हवाई बातों से नहीं। नहीं तो आम आदमी इसे “सुबह का भोंगा” समझकर अनदेखा कर देगा, जैसे मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस उन्हें “सुबह 9 बजे का भोंगा” कहते हैं।

कुल मिलाकर अगले कुछ महीनों में देश में अराजकता और सत्ता परिवर्तन होगा और कुछ महीने PM ही नहीं रहेगा, ऐसा चित्र आज तो नहीं दिखता। राज ठाकरे और संजय राउत को दिवास्वप्न आते हैं, यह मानसिक बीमारी भी हो सकती है। हो तो इलाज कराएं।

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कन्हान में 74.71% तो पारशिवनी में 67.13% मतदान, मतदाताओं में भारी उत्साह

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  • तहसील के तीन बूथों पर 2079 में से 1496 स्नातकों ने किया मतदान, कन्हान पुलिस व पारशिवनी पुलिस का चोख बंदोबस्त, एक भी अप्रिय घटना नहीं

पारशिवनी, 23 अक्टूबर :

विधान परिषद नागपुर विभाग पदवीधर मतदारसंघ के लिए पारशिवनी तहसील अंतर्गत तीन मतदान केंद्रों पर मतदान शांतिपूर्ण और सौहार्दपूर्ण वातावरण में संपन्न हुआ। कन्हान पुलिस थाना क्षेत्र और पारशिवनी पुलिस थाना के अधिकारियों द्वारा कड़े सुरक्षा इंतजाम किए गए थे। लोकतंत्र के इस पर्व में स्नातक मतदाताओं ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।

तहसील के तीनों केंद्रों पर कुल 2,079 पंजीकृत मतदाताओं में से 1,496 मतदाताओं ने वोट डाला, औसत मतदान 71.95% रहा।

कन्हान के बूथों पर बंपर वोटिंग – 74.71% –

कन्हान पुलिस थाना क्षेत्र के दो बूथों पर सबसे अधिक उत्साह देखा गया :

  • बूथ क्र. 41 : कुल 518 मतदाताओं ने मतदान किया (79.32%)। इनमें 274 पुरुष और 244 महिला मतदाता शामिल।
  • बूथ क्र. 42 : कुल 463 मतदाताओं ने वोट डाला (70.15%)। इनमें 233 पुरुष और 230 महिला।

दोनों बूथों पर महिला-पुरुष भागीदारी लगभग बराबर रही, जिससे जागरूकता का पता चलता है।

पारशिवनी मुख्य केंद्र –

पारशिवनी तहसील कार्यालय के बूथ क्रमांक 14 में कुल 766 मतदाताओं में से 515 मतदाताओं ने मतदान किया, मतदान प्रतिशत 67.13% (67.15%) रहा।

प्रशासनिक सतर्कता –

मतदान के दौरान सभी केंद्रों पर आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध थीं। पुलिस व प्रशासन की सतर्कता से दिनभर चली प्रक्रिया में किसी भी अप्रिय घटना की सूचना नहीं मिली और पूरी प्रक्रिया पूरी तरह शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हुई।

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फ्रीमेसन बिरादरी ने RGM सराफ और RGM-नामित तरुण श्रीवास्तव का किया सम्मान

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  • फ्रीमेसन हॉल, सिविल लाइंस में भव्य समारोह, डॉ. यज्ञेश ठाकर मुख्य अतिथि, ‘बंधुत्व, राहत और सत्य’ के सिद्धांतों पर सेवा कार्य बढ़ाने का आह्वान

नागपुर, 23 अक्टूबर :

रीजनल ग्रैंड लॉज ऑफ वेस्टर्न इंडिया (RGLWI) के रीजनल ग्रैंड मास्टर सुभाष लक्ष्मण सराफ और RGM-नामित तरुण श्रीवास्तव का नागपुर फ्रीमेसन बिरादरी ने गुरुवार शाम फ्रीमेसन हॉल, सिविल लाइंस में आयोजित एक गरिमामय समारोह में अभिनंदन किया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि पूर्व RGM डॉ. यज्ञेश ठाकर, OSM थे।

अपने सम्मान के उत्तर में सुभाष सराफ ने पश्चिमी क्षेत्र की पूरी बिरादरी से फ्रीमेसनरी की इमारत को और मजबूत करने का आह्वान किया। उन्होंने सभी लॉज से मानवता की सेवा में अधिक चैरिटेबल प्रोजेक्ट लेने की अपील करते हुए कहा कि निस्वार्थ सेवा ही ‘ब्रदरली लव, रिलीफ और ट्रुथ’ के शाश्वत सिद्धांतों का सच्चा प्रतीक है और समाज में इनकी रोशनी फैलाने का सबसे प्रभावी तरीका है।

RGM-नामित तरुण श्रीवास्तव ने भरोसा दिलाया कि वे क्षेत्र के हजारों मेसन भाइयों के सहयोग से पश्चिमी क्षेत्र के लॉज को अधिक सक्रिय और जीवंत बनाने के लिए कड़ी मेहनत करेंगे।

मुख्य अतिथि डॉ. यज्ञेश ठाकर ने कहा कि तरुण श्रीवास्तव फ्रीमेसनरी के प्रति गहराई से समर्पित हैं, सभी लॉज के भाइयों से उनका घनिष्ठ संबंध है और वे मददगार स्वभाव के हैं। उन्होंने विश्वास जताया कि वे नई जिम्मेदारी सफलतापूर्वक निभाएंगे।

समारोह में डॉ. ठाकर ने सुभाष सराफ को शॉल, श्रीफल और स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया, वहीं सराफ ने तरुण श्रीवास्तव का सम्मान किया। तरुण मेहरा, लॉज कोरिंथ नं. 1122 के सचिव प्रवीण साहनी और मेसोनिक विमेंस एसोसिएशन की अंशिता कनेतकर ने भी विचार व्यक्त किए।

प्रारंभ में अमलेश पुरोहित ने स्वागत भाषण दिया। डॉ. हेमंत जहागिरदार, रवींद्र तिवारी और अनुज हैमिल्टन ने अतिथियों का परिचय दिया, जबकि संचालन डॉ. संजय चरालवार ने किया। आभार प्रदर्शन आदित्य वरंगावकर ने किया।

इस अवसर पर स्वदेश भार्गव, सरोश दोरडी, रवींद्र तिवारी, मंगेश शास्त्री, विनायक केवडकर, अंजन बिस्वास, प्रवीण कोटेश्वर, संजय चतुर्वेदी, नीलिमा श्रीवास्तव सहित विभिन्न लॉज के मास्टर, सेक्रेटरी और ग्रैंड लॉज ऑफ इंडिया व RGLWI के अधिकारी प्रमुख रूप से उपस्थित थे।

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