- स्पष्ट और बेबाक – संविधान में PM पद कभी खाली नहीं रह सकता, मोदी-विरोध में बेबुनियाद बयानबाजी और विदेशी शक्तियों की साजिश का विश्लेषण
महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना प्रमुख राज ठाकरे और शिवसेना (उबाठा) के स्वघोषित विश्व प्रवक्ता संजय राउत के दो बयान इन दिनों चर्चा में हैं। अलग-अलग लगने वाले इन बयानों का ध्वनित अर्थ एक ही है – मोदी-द्वेष से उपजी गैर-जिम्मेदार भविष्यवाणी।
राज ठाकरे का दावा –
एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में राज ठाकरे ने कहा कि अगले दो-तीन महीनों में देश में ऐसी स्थिति आएगी कि प्रधानमंत्री ही नहीं होगा। राज ठाकरे की राजनीति हमेशा ‘तळ्यात-मळ्यात’ वाली रही है। कभी वे खुद को शरद पवार के कुनबे में छोड़ देते हैं, कभी मोदी से नजदीकी दिखती है। वर्षों झगड़ने के बाद अब सगे चचेरे भाई से हाथ मिला रहे हैं, कभी कांग्रेस के साथ समझौता तो कभी अभिजीत दीपके को सिर पर बिठाकर नाचना। कुल मिलाकर स्थिर भूमिका के अभाव वाले नेता।
उन्होंने यह भविष्यवाणी किस आधार पर की? क्या संविधान पढ़ा? प्रथा-परंपरा देखी?
हमारे देश में संविधान के अनुसार प्रधानमंत्री का पद कभी रिक्त नहीं रखा जा सकता। यदि मुख्यमंत्री इस्तीफा दे दे या निधन हो जाए और नया मुख्यमंत्री न बन सके तो राष्ट्रपति शासन लग सकता है। महापौर, नगराध्यक्ष, जिला परिषद अध्यक्ष या सरपंच न हो तो प्रशासक नियुक्त हो सकता है। लेकिन प्रधानमंत्री न हो तो राष्ट्रपति शासन लगाकर राष्ट्रपति शासन चलाएंगे, ऐसी व्यवस्था ही नहीं है।
इसीलिए किसी कारण प्रधानमंत्री इस्तीफा भी दे दे तो नया प्रधानमंत्री आने तक उसे कार्यवाहक प्रधानमंत्री के रूप में काम करना ही पड़ता है। राष्ट्रपति वैसी सूचना देते हैं। यदि पद पर रहते प्रधानमंत्री का निधन हो जाए तो नए कार्यवाहक प्रधानमंत्री की शपथ होने तक आधिकारिक तौर पर निधन की घोषणा भी नहीं की जाती।
मेरी याद के अनुसार 1964 में पंडित नेहरू के निधन पर गुलजारीलाल नंदा को कार्यवाहक PM की शपथ दिलाने के बाद ही निधन की घोषणा हुई थी। यही लालबहादुर शास्त्री के निधन पर भी हुआ। इंदिरा गांधी की गोली मारकर हत्या सुबह करीब 10 बजे हुई थी, एम्स ले जाते-ले जाते उनका निधन हो गया था, लेकिन पश्चिम बंगाल से राजीव गांधी के दिल्ली लौटकर कार्यवाहक PM की शपथ लेने तक सिर्फ “गोली लगी, एम्स में भर्ती” यही खबर रेडियो-टीवी पर चलती रही।
1979 में चौधरी चरण सिंह ने संसद भंग की थी, फिर भी राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी ने उन्हें नई सरकार तक कार्यवाहक रहने को कहा। यही चंद्रशेखर (1991), इंद्रकुमार गुजराल (1997) और अटल बिहारी वाजपेयी (1999) के मामले में हुआ। इसलिए “देश में प्रधानमंत्री ही नहीं होगा” यह दावा हास्यास्पद है। मान लो अगले चार महीने में गड़बड़ी हुई और मोदी को इस्तीफा देना भी पड़ा, तब भी नए PM तक उन्हें ही कार्यवाहक रहना पड़ेगा। यह संवैधानिक प्रावधान है। राज ठाकरे मन में आए वैसा बोल देते हैं, अक्सर बिना आधार के।
संजय राउत का भाकित –
शिवसेना के दशहरा मेले में संजय राउत ने कहा कि अगले 3-4 महीने में देश में भारी गड़बड़ी होगी, नरेंद्र मोदी PM नहीं रहेंगे, सत्ता परिवर्तन होगा। अभिजीत दीपके के पहले आंदोलन के बाद से ही विपक्ष को सत्ता परिवर्तन के दिवास्वप्न दिखने लगे हैं।
वास्तव में मोदी और सहयोगी पिछले 12 साल से शासन चला रहे हैं, कई अच्छे काम किए हैं, इसलिए आम आदमी कहीं न कहीं उनके साथ दिखता है। 2024 में भाजपा को झटका लगा, 303 से 240 पर आ गई। तब विपक्ष सरकार बनाएगा क्या, भाजपा ने कुछ समय इंतजार किया, लेकिन विपक्ष की आपसी खींचतान देखकर कई छोटे दलों ने मोदी के नेतृत्व वाली सरकार के साथ ही रहने का फैसला किया। आज धीरे-धीरे भाजपा का समर्थन फिर बढ़ रहा है। कुछ दलों में टूट से सांसद भाजपा में आए हैं। अप्रैल 2026 में दो-तिहाई बहुमत के अभाव में खारिज हुआ महिला आरक्षण विधेयक अब फिर पारित कराने के लिए विशेष सत्र बुलाने की हलचल है।
विपक्ष किसी तरह मौजूदा सरकार को गिराना चाहता है। यह सिर्फ इच्छा नहीं, इसके पीछे विदेशी शक्तियों का साथ होने के पुख्ता सबूत मिलने की जानकारी है। पिछले 12 साल में मोदी नेतृत्व में देश की जो प्रगति हुई, वह बाहर के विकसित देशों को पच नहीं रही। इसलिए देश में अशांति फैलाकर सरकार गिराने के प्रयास हैं। अशांति फैलाने के लिए ही ऐसे आंदोलनों को स्पॉन्सर किया जाता है। नहीं तो विदेश में पढ़ाई छोड़कर अभिजीत दीपके को विशेष विमान से भारत लाना और आंदोलन का ढांचा खड़ा करने में मदद करना, इसका क्या अर्थ निकाला जाए? अभी मतदाता सूची पुनरीक्षण के मुद्दे पर भी आंदोलन भड़काया जा रहा है, पर उसमें आम आदमी कितना है, यह जांचना जरूरी है। आम आदमी को पहले रोजी-रोटी की चिंता है, वह ऐसे आंदोलन में कभी नहीं आएगा।
आज संजय राउत की बात को कोई गंभीरता से लेता है, ऐसा किसी को नहीं लगता। वे रोज सुबह मीडिया को बुलाकर अलग-अलग फोकनाड (शेखी) हांकते हैं। कुछ मराठी चैनलों को छोड़कर कोई गंभीरता से नहीं लेता। मराठी न्यूज चैनल पर उनका बोलना दिखता है तो आम आदमी टाइमपास के तौर पर देखता है। उनकी ज्यादातर कहानियां कपोल-कल्पित और सिर्फ मनोरंजक होती हैं, तथ्य कम।
आज विपक्ष ने कुछ आंदोलन खड़े करने की कोशिश जरूर की, हिंसा भड़काने के इरादे के संकेत भी मिले, लेकिन हिंसा अभी तक नहीं हुई और मोदी सरकार होने भी नहीं देगी, ऐसा आज का चित्र है। ऐसी स्थिति में अगले चार महीने में सरकार गिरने के क्या कारण होंगे, यह राउत को तथ्यों के साथ स्पष्ट करना चाहिए, हवाई बातों से नहीं। नहीं तो आम आदमी इसे “सुबह का भोंगा” समझकर अनदेखा कर देगा, जैसे मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस उन्हें “सुबह 9 बजे का भोंगा” कहते हैं।
कुल मिलाकर अगले कुछ महीनों में देश में अराजकता और सत्ता परिवर्तन होगा और कुछ महीने PM ही नहीं रहेगा, ऐसा चित्र आज तो नहीं दिखता। राज ठाकरे और संजय राउत को दिवास्वप्न आते हैं, यह मानसिक बीमारी भी हो सकती है। हो तो इलाज कराएं।