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अवैध पैथोलॉजी प्रयोगशालाओं पर अंकुश के लिए नए नियम

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  • उच्च न्यायालय ने सरकार से माँगा विस्तृत शपथपत्र

नागपुर, 22 जून 2026 :महाराष्ट्र में अवैध रूप से चल रही पैथोलॉजी प्रयोगशालाओं पर लगाम कसने के लिए राज्य सरकार ने नए नियम बनाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। यह जानकारी महाराष्ट्र सरकार ने नागपुर उच्च न्यायालय की खंडपीठ को दी। न्यायमूर्ति अनिल किलोर और न्यायमूर्ति राज वाकोदे की खंडपीठ ने सरकार को निर्देश दिया कि वह अगले सप्ताह तक प्रस्तावित नियमों और उनके प्रावधानों की पूरी जानकारी देते हुए विस्तृत शपथपत्र दाखिल करे।

यह मामला यवतमाल निवासी सामाजिक कार्यकर्ता दिगंबर पजगाड़े द्वारा दायर एक आपराधिक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान सामने आया। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि राज्य में हजारों पैथोलॉजी प्रयोगशालाएँ केवल मेडिकल लैबोरेटरी टेक्नोलॉजी में डिप्लोमा (DMLT) या सर्टिफिकेट (CMLT) रखने वाले तकनीशियनों द्वारा अवैध रूप से संचालित की जा रही हैं।

मौजूदा मानदंडों के अनुसार, पैथोलॉजी लैब केवल एमबीबीएस डिग्रीधारी डॉक्टर या पैथोलॉजी, माइक्रोबायोलॉजी या बायोकेमिस्ट्री में एमडी करने वाले विशेषज्ञ ही चला सकते हैं। याचिकाकर्ता का कहना है कि गैर-योग्य लोगों द्वारा चलाई जा रही लैब गलत निदान और उपचार का कारण बनती हैं, जो जन स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा है।

सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने मौखिक टिप्पणी की कि गलत पैथोलॉजी रिपोर्ट और आवश्यक दवाओं की समय पर अनुपलब्धता के कारण मरीजों को अक्सर गंभीर कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। न्यायालय ने जन स्वास्थ्य विभाग से कहा कि नए नियम बनाते समय मरीजों के हितों की मजबूती से रक्षा सुनिश्चित की जाए।

पिछली सुनवाई में उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार से अवैध पैथोलॉजी लैब के विरुद्ध की गई कार्रवाई का ब्योरा और एक व्यापक रिपोर्ट माँगी थी। नवीनतम सुनवाई में सरकार ने बताया कि जन स्वास्थ्य विभाग ऐसे संस्थानों के विरुद्ध प्रभावी कार्रवाई सुनिश्चित करने के लिए नए नियम तैयार कर रहा है।

याचिकाकर्ता दिगंबर पजगाड़े ने स्वयं मामले की पैरवी की, जबकि राज्य सरकार की ओर से अधिवक्ता रोहन चंदुरकर उपस्थित हुए।

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फर्जी शपथपत्र केस में चिमूर विधायक को दूसरा झटका

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  • इमामवाड़ा थाने के मामले में भी डिस्चार्ज अर्जी खारिज, कोर्ट ने कहा – जनता के साथ धोखाधड़ी, मुकदमा चलेगा

नागपुर, 5 सितंबर 2026 : फर्जी शपथपत्र देकर नागपुर सुधार प्रन्यास (NIT) के फ्लैट हड़पने के मामले में चिमूर के विधायक की मुश्किलें लगातार बढ़ रही हैं। सक्करदरा के बाद अब इमामवाड़ा पुलिस थाने में दर्ज मामले में भी अदालत ने विधायक की डिस्चार्ज अर्जी खारिज कर दी है।

प्रथम श्रेणी न्याय दंडाधिकारी (कोर्ट नं. 5) एन. एन. चिंतामणी ने R.C.C. No. 4517/2024, State Vs. Kirtikumar में 3 सितंबर 2026 को Order below Exh.10 पारित करते हुए अर्जी खारिज की।

क्या है दूसरा मामला :
पहले मामले की तरह ही इस मामले में भी नागपुर के अधिवक्ता ने http://Cr.PC की धारा 156(3) के तहत कोर्ट में अर्जी दी थी, जिसे मंजूर होने के बाद इमामवाड़ा थाने में IPC की धारा 199, 200 और 420 के तहत अपराध दर्ज हुआ।

आरोपी विधायक 2019 से चिमूर विधानसभा से विधायक हैं। अभियोजन का आरोप है कि आरोपी ने NIT की उस योजना में, जो नागपुर शहर में फ्लैट न रखने वाले आम नागरिकों के लिए थी, तथ्य छिपाकर झूठा शपथपत्र और फर्जी दस्तावेज तैयार किए और उसके आधार पर दहीपुरा, उंटखाना और आयुर्वेदिक लेआउट, नागपुर में फ्लैट और दुकान आवंटित करा ली, जिस पर वह आज तक काबिज है।

बचाव पक्ष ने http://Cr.PC की धारा 239 के तहत डिस्चार्ज मांगते हुए कहा था कि रिकॉर्ड पर कोई सबूत नहीं है कि शपथपत्र झूठा है, धोखाधड़ी का कोई तत्व नहीं है, शिकायतकर्ता का कोई लोकस स्टैंडी नहीं है और आरोप बेबुनियाद, काल्पनिक हैं। बचाव ने सुप्रीम कोर्ट के मोहम्मद इब्राहिम विरुद्ध बिहार राज्य (2009) और बॉम्बे हाईकोर्ट के विजय नारायणदास रिजवानी केस का हवाला दिया।

कोर्ट ने क्या कहा :
APP ने अर्जी का कड़ा विरोध करते हुए कहा कि आरोपी ने सरकार और आम जनता दोनों को धोखा दिया है। जांच अधिकारी ने गवाहों के बयान दर्ज किए हैं जो आरोपी की भूमिका दिखाते हैं। आरोपी ने 2020 में बॉम्बे हाईकोर्ट, नागपुर बेंच में क्रिमिनल अप्लीकेशन (APL) No. 875/2020 दायर की थी, जिसे बाद में वापस ले लिया और प्रोसेस जारी करने के आदेश को ऊपरी अदालत में चुनौती भी नहीं दी।

रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद कोर्ट ने कहा कि मामला आरोप तय करने के स्तर पर है और प्रथम दृष्टया पर्याप्त सामग्री है। कोर्ट ने माना कि बचाव द्वारा बताए गए दोनों न्यायिक दृष्टांतों के तथ्य इस मामले से अलग हैं। यहां अपराध आम जनता के खिलाफ है, इसलिए FIR कानून को गति में लाने के लिए वैध है और शिकायतकर्ता को रिपोर्ट दर्ज कराने का पूरा अधिकार है।

कोर्ट ने कहा, “अभियोजन का आरोप है कि आरोपी ने आम जनता को धोखा देकर फर्जी शपथपत्र तैयार किया है। यह तर्क कि शिकायतकर्ता पीड़ित नहीं है, में कोई दम नहीं है। अर्जी में कोई मेरिट नहीं है।”

इसी आधार पर कोर्ट ने डिस्चार्ज अर्जी खारिज करते हुए आदेश दिया कि आरोपी के खिलाफ मुकदमा चलेगा।

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चिमूर के विधायक को झटका : फर्जी शपथपत्र मामले में डिस्चार्ज अर्जी खारिज

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  • NIT के फ्लैट हड़पने के लिए झूठा हलफनामा देने का आरोप, कोर्ट ने कहा – आरोपी के खिलाफ प्रथम दृष्टया पर्याप्त सबूत, चलेगा मुकदमा

नागपुर,5 सितंबर 2026 : नागपुर सुधार प्रन्यास (NIT) की योजना में फ्लैट हड़पने के लिए फर्जी शपथपत्र देने के मामले में चिमूर विधानसभा क्षेत्र के विधायक की मुश्किलें बढ़ गई हैं। प्रथम श्रेणी न्याय दंडाधिकारी (कोर्ट नं. 5) एन. एन. चिंतामणी ने विधायक की डिस्चार्ज अर्जी को खारिज कर दिया है।

यह मामला R.C.C. No. 2685/2024, State Vs. Kirtikumar है। आदेश 3 सितंबर 2026 को Exh. 9 के नीचे पारित किया गया।

क्या है मामला :
नागपुर के अधिवक्ता की 156(3) http://Cr.PC के तहत दायर शिकायत पर सक्करदरा पुलिस थाने में IPC की धारा 199, 200 और 420 के तहत अपराध दर्ज हुआ था। अभियोजन का आरोप है कि 2019 से चिमूर से विधायक आरोपी ने NIT की उस योजना का लाभ लेने के लिए, जो नागपुर शहर में फ्लैट न रखने वाले आम जनता के लिए थी, तथ्य छिपाकर झूठा शपथपत्र तैयार किया। इसी दस्तावेज के आधार पर NIT ने दहीपुरा, उंटखाना और आयुर्वेदिक लेआउट में फ्लैट और दुकान आवंटित कर दी, जिस पर आरोपी आज तक काबिज है। अभियोजन के अनुसार यह जनता के साथ धोखाधड़ी है।

आरोपी ने http://Cr.PC की धारा 239 के तहत डिस्चार्ज के लिए अर्जी दी थी। बचाव पक्ष का तर्क था कि FIR में धोखाधड़ी का कोई तत्व नहीं है, शपथपत्र झूठा साबित करने का कोई ठोस सबूत नहीं है, शिकायतकर्ता का कोई लोकस स्टैंडी नहीं है क्योंकि वह धोखा खाया हुआ व्यक्ति नहीं है। बचाव ने सुप्रीम कोर्ट के मोहम्मद इब्राहिम विरुद्ध बिहार राज्य (2009) 8 SCC 751 और बॉम्बे हाईकोर्ट के विजय रिजवानी केस का हवाला दिया।

कोर्ट ने क्या कहा :
सरकार की ओर से APP ने अर्जी का कड़ा विरोध किया। कोर्ट ने दोनों पक्षों को सुनने और रिकॉर्ड देखने के बाद कहा कि मामला आरोप तय करने के स्तर पर है। जांच अधिकारी ने गवाहों के बयान दर्ज किए हैं जो आरोपी की संलिप्तता दिखाते हैं।

कोर्ट ने माना कि आरोपी द्वारा उद्धृत दोनों न्यायिक दृष्टांतों के तथ्य इस मामले से अलग हैं। यहां आरोप आम जनता को धोखा देने का है, इसलिए FIR कानून को गति में लाने के लिए वैध है और शिकायतकर्ता को रिपोर्ट दर्ज कराने का अधिकार है। कोर्ट ने कहा, “रिकॉर्ड देखने पर यह मानने का आधार है कि आरोपी ने अपराध किया है। आरोपी के खिलाफ प्रथम दृष्टया पर्याप्त सामग्री है।”

इसी आधार पर कोर्ट ने डिस्चार्ज अर्जी में कोई दम नहीं पाते हुए उसे खारिज कर दिया और स्पष्ट किया कि आरोपी के खिलाफ धारा 420, 465, 471 सहित अन्य धाराओं में मुकदमा चलेगा।

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घरकुल घोटाले में आमदार बंटी भांगड़िया को झटका, डिस्चार्ज अर्जी खारिज

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  • JMFC नागपुर कोर्ट ने कहा – आरोप तय करने के लिए पर्याप्त सबूत मौजूद, अगली सुनवाई 7 सितंबर को; हाईकोर्ट से याचिका वापस लेकर निचली अदालत में ली थी जमानत

नागपुर,04 सितंबर 2026:

चिमूर के आमदार कीर्तिकुमार उर्फ बंटी भांगड़िया के खिलाफ चल रहे चर्चित NIT घरकुल घोटाला मामले में अदालत ने बड़ा फैसला सुनाया है। नागपुर के प्रथम श्रेणी न्यायदंडाधिकारी (JMFC) की अदालत ने आमदार की दोनों डिस्चार्ज अर्जियां खारिज कर दी हैं।

क्या है न्यायालय का आदेश?

16वें सह दिवानी न्यायाधीश, जूनियर डिवीजन, JMFC, नागपुर, श्री नितीन निवृत्ती चिंतामणि की अदालत में यह मामला सुना गया।

  • प्रकरण क्रमांक: R.C.C. 2685/2024 और R.C.C. 4517/2024
  • CNR नंबर: MHNG030175102024 व MHNG030301762024
  • आदेश दिनांक: 03-09-2026
  • शीर्षक: महाराष्ट्र राज्य विरुद्ध कीर्तिकुमार मितेश भांगड़िया

न्यायालय ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा कि दोनों प्रकरणों में भरपूर पुरावे उपलब्ध हैं और आरोप (Charges) निश्चित करने के लिए पर्याप्त आधार है। इस आधार पर Exh. 09 और Exh. 10 पर दायर डिस्चार्ज के आवेदन खारिज किए जाते हैं। आरोपी को अगली तारीख पर व्यक्तिगत रूप से उपस्थित रहने का निर्देश दिया गया है।

अदालत ने आरोप तय (Charge Frame) करने के लिए अगली तारीख 07-09-2026 निश्चित की है। कल 3 सितंबर को आरोपी के वकील उपस्थित थे, आरोपी की ओर से हाजिरी माफी (Exemption) का आवेदन Exh. 20 और 21 पर दिया गया था, जिसे केवल उसी दिन के लिए मंजूर किया गया।

हाईकोर्ट से याचिका वापस, फिर JMFC में जमानत

इससे पहले आमदार भांगड़िया ने मा. उच्च न्यायालय में दोषारोप पत्र रद्द करने के लिए दो याचिकाएं दायर की थीं, जिन्हें उन्होंने 04/08/2026 को वापस (प्रत्याहृत) ले लिया था। उसके बाद उन्होंने JMFC नागपुर कोर्ट में हाजिर होकर जमानत प्राप्त की और तुरंत डिस्चार्ज अर्ज दाखिल की थी, जो अब खारिज हो गई है।

पूरा मामला क्या है?

हकीकत यह है कि एड. सतीश उके के माध्यम से तक्रारदार एड. तरुण परमार ने प्रथम श्रेणी न्यायदंडाधिकारी (विशेष आमदार-खासदार न्यायालय), नागपुर में दो अलग-अलग शिकायतें दर्ज कराई थीं।

न्यायालय ने सन 2020 में पुलिस स्टेशन सक्करदरा और इमामवाड़ा, नागपुर को NIT घरकुल घोटाले में दो अलग-अलग अपराध दर्ज कर रिपोर्ट पेश करने का आदेश दिया था। पुलिस ने जांच कर भांगड़िया के खिलाफ न्यायालय में दोषारोप पत्र दाखिल किए।

शिकायत में आरोप है कि भांगड़िया ने खुद को बेघर दिखाकर NIT की दो बड़ी सदनिकाएं अत्यल्प दर पर हासिल कीं, फिर उनमें विभाजन कर उन्हें भाड़े पर चढ़ा दिया और उससे आर्थिक लाभ कमाया।

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