- फडणवीस के लिए ‘गोड शेवट’, गिरीश व्यास ने भी लिया इस्तीफा वापस, भाजपा उम्मीदवार कोहले को मिलेगा समर्थन
नागपुर,12 अक्टूबर 2026 :
नागपुर में भाजपा के भीतर चल रहे बगावत के घटनाक्रम ने सोमवार को नया मोड़ ले लिया। दिनभर चर्चा थी कि बागी नेता प्रा. अनिल सोले दोपहर तक पार्टी उम्मीदवार को समर्थन देकर अपनी उम्मीदवारी वापस लेंगे। देर शाम तक इस पर भाजपा के विधायक, वरिष्ठ पदाधिकारी, कार्यकर्ता और पत्रकारों में भी चर्चा चलती रही।
कोराडी के नैवेद्यम होटल में भाजपा कोर कमेटी की बैठक खत्म होते ही रात करीब 8 बजे मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस सीधे प्रा. अनिल सोले के गंगोत्री, बुटी ले-आउट, लक्ष्मीनगर स्थित घर पहुंचे। उस समय सोले वर्धा में पदवीधर चुनाव के प्रचार दौरे पर थे। उन्हें मुख्यमंत्री के निवास पर आने की सूचना दी गई। पार्टी के इतने पुराने निष्ठावान कार्यकर्ता के घर स्वयं मुख्यमंत्री आए हैं, यह जानकर वे रुक नहीं सके और तुरंत वर्धा का प्रचार दौरा अधूरा छोड़कर नागपुर के लिए निकल पड़े। उन्होंने कहा, “मैं इतना बड़ा नहीं हुआ कि मुख्यमंत्री घर आएं और मैं उनसे न मिलूं।”
इससे पहले भाजपा प्रदेश अध्यक्ष रवींद्र चव्हाण भी सोले के घर जाकर उन्हें मनाने के लिए काफी देर तक प्रतीक्षा करते रहे थे, लेकिन सोले ‘नॉट रिचेबल’ रहे थे। हालांकि, जब स्वयं राज्य के मुख्यमंत्री सोले के घर पहुंचे, तो सोले के पास उनसे मिलने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा।
इसके बाद बंद कमरे में मुख्यमंत्री, राजस्व मंत्री चंद्रशेखर बावनकुले, अनिल सोले और पार्टी के एक अन्य वरिष्ठ कार्यकर्ता तथा पूर्व विधायक गिरीश व्यास के बीच लंबी चर्चा हुई। बाहर सोले के समर्थक बेचैनी से निर्णय की प्रतीक्षा कर रहे थे। बाहर आने के बाद मुख्यमंत्री ने मीडिया को बताया कि सोले ने पार्टी के अधिकृत उम्मीदवार सुधाकर कोहले को अपना समर्थन घोषित किया है।
फडणवीस के लिए गोड शेवट
मुख्यमंत्री फडणवीस ने कहा, “जब मैंने पार्टी का काम शुरू किया तब जो कुछ नेता थे उनमें अनिल सोले एक थे। उनके साथ कई वर्षों तक काम करने का अवसर मिला। विशेष रूप से पार्टी के कुछ कार्यकर्ताओं को संभालने का काम सोले करते हैं। इसलिए जब उन्होंने पदवीधर चुनाव का फॉर्म भरा तब उनकी बात सुनने और वे भाजपा के साथ रहें इसके लिए हमारी उनसे चर्चा शुरू हुई। उन्होंने स्पष्ट कहा कि पार्टी के संदर्भ में मेरी कोई नाराजगी नहीं है, कार्यपद्धति के संदर्भ में नाराजगी है।”
फडणवीस ने कहा कि निर्णय कौन सा होता है यह महत्वपूर्ण नहीं, निर्णय किस पद्धति से होता है यह महत्वपूर्ण है, यही सोले की नाराजगी थी। सोले ने कुछ महत्वपूर्ण बातें ध्यान में लाकर दीं। अधिक से अधिक लोगों को विश्वास में लेकर पार्टी स्तर पर निर्णय होने चाहिए, यह बात हमने मानी, उसकी नोट की और कार्यपद्धति में निश्चित बदलाव करेंगे, ऐसा आश्वासन हमने सोले को दिया है।
इसके अलावा पार्टी के कई ऐसे पुराने कार्यकर्ता हैं जिन्होंने पार्टी के लिए बहुत काम किया लेकिन अब पार्टी स्तर के किसी निर्णय में उन्हें शामिल नहीं किया जाता या पार्टी की मुख्यधारा से वे दूर हैं, उन पर ध्यान नहीं दिया जाता ऐसी शिकायत भी सोले ने की। इस संदर्भ में चर्चा करके उन कार्यकर्ताओं को फिर से मुख्यधारा में लाने के लिए हम निश्चित रूप से एक योजना बनाकर उन पर पार्टी या सरकार में विभिन्न जिम्मेदारियां कैसे दी जा सकती हैं, इस संदर्भ में प्रयास करेंगे।
सोले के साथ सकारात्मक चर्चा हुई। हमें विश्वास था कि इतने वर्षों से सोले ने पार्टी के खिलाफ भूमिका नहीं ली, बल्कि वर्षों से जब कोई व्यक्ति पार्टी से नाराज हुआ तब उसे समझाने की जिम्मेदारी अनिल सोले की ही होती थी। इसलिए हमें विश्वास था कि जब हम उनसे चर्चा करेंगे तो उन्हें कितना भी गुस्सा हो या सात्विक संताप हो, वह दूर होगा और वे पार्टी के साथ रहने का निर्णय करेंगे और मुझे आनंद है कि उन्होंने वही निर्णय लिया और इस चुनाव की बागडोर हाथ में लेकर भाजपा उम्मीदवार को जिताने के लिए फिर से अपनी मानसिकता बनाई है।
गिरीश व्यास ने भी लिया इस्तीफा वापस
फडणवीस ने कहा कि हमारे दूसरे प्रमुख नेता पूर्व विधायक गिरीश व्यास ने भी कई वर्षों तक पार्टी की सेवा की। वे पार्टी के अध्यक्ष रहे, विभिन्न पदों पर काम किया, उन्होंने भी इसी बात को लेकर नाराज होकर पार्टी सदस्यता का इस्तीफा दिया था, आज उनसे भी चर्चा हुई और उनकी बात भी हमने सुनी और उनके आरोप हमने माने। उन्होंने भी अपना इस्तीफा वापस लिया है। वे भी पार्टी के साथ हैं। पार्टी के लिए हमारे साथ काम करेंगे।
मुझे इस बात का आनंद है कि सोले और व्यास जैसे हमारे ज्येष्ठ कार्यकर्ता कभी कार्यपद्धति से हम पर नाराज होते हैं परंतु आज फिर पार्टी के पीछे खड़े हैं और पार्टी मजबूत कर रहे हैं। हम सब फिर एक बार पार्टी को बल देकर अपना उम्मीदवार चुनकर लाएंगे ही, साथ ही भविष्य में सभी कार्यकर्ताओं को लेकर मजबूत संगठन खड़ा करेंगे, ऐसा संकल्प हमने किया है। बावनकुले इस चर्चा में थे, उन्होंने आगे की सभी जिम्मेदारियां स्वीकार कीं। एक गोड शेवट हुआ है, ऐसा मुख्यमंत्री ने जोड़ा।
भावुक हुए सोले
संक्षेप में, स्वयंसेवक कभी भी अनुशासन के विरुद्ध काम नहीं करता, यह सोले की वापसी के बाद फिर एक बार सिद्ध हुआ। सोले ने कहा, “मैं नागपुर पदवीधर चुनाव से पीछे हटता हूं। मुख्यमंत्री स्वयं विनती करने मेरे घर आए, यह किसी को कुछ लगे लेकिन मुझे अच्छा नहीं लगा, भाजपा को बढ़ाने का काम मैंने किया है और पार्टी को कभी धोखा नहीं होगा।” यह कहते हुए सोले के आंसू छलक आए।
“मैं अपनी उम्मीदवारी वापस लेता हूं। बैलेट पेपर पर मेरी उम्मीदवारी कायम रही तो भी छह जिलों से एक भी वोट मुझे नहीं मिलेगा, ऐसा मेरा प्रयास रहेगा,” सोले ने कहा।
इस चुनाव की बागडोर सोले ही संभालेंगे। वे स्वयं पदवीधर के विधायक रहे हैं इसलिए उनके साथ पुराने लोग जुड़े हैं, सोले के इस निर्णय के बाद अन्य पुराने कार्यकर्ताओं को भी आनंद होगा। सोले का भाजपा के अधिकृत उम्मीदवार को समर्थन यह खबर हमारी बढ़त को मजबूत करती है, ऐसा फडणवीस ने कहा।
राजनीतिक विश्लेषकों का कयास
वास्तव में सोले की वापसी कांग्रेस के उम्मीदवार एड. अभिजीत वंजारी के पाले को फिर से 2020 की तरह इस चुनाव में भारी करती है, ऐसा राजनीतिक विश्लेषकों का कयास है। जिन पदवीधर मतदाताओं का झुकाव भाजपा के सुधाकर कोहले और कांग्रेस के अभिजीत वंजारी दोनों की ओर नहीं था, वे सोले को मतदान करने के विचार में थे। लेकिन सोले की वापसी के बाद सोले को मिलने वाले वोट वंजारी की ओर जाएंगे, ऐसा वे कहते हैं।
इतना ही नहीं, कोहले के बजाय सोले को फिर से उम्मीदवारी दी जाती तो शायद भाजपा को 2020 में 52 साल बाद नागपुर पदवीधर चुनाव में जो हार का झटका लगा था, उसका बदला लिया जा सकता था। मतदाताओं का झुकाव उच्च शिक्षित और स्वच्छ छवि वाले सोले की ओर था और चमत्कार होता, ऐसा दावा भी वे करते हैं। अब यह चुनाव 2020 की तरह ‘एकतरफा’ हो गया है और वंजारी का पलड़ा भारी है, ऐसा विश्लेषक कहते हैं।
मूल रूप से सोले स्वयं के साथ पार्टी की प्रतिष्ठा बचाने वाले व्यक्तित्व हैं। स्वयं राज्य के मुख्यमंत्री उनके घर पहुंचे तो उनके पास वापसी के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा। उनकी बगावत शाब्दिक निकली, कृती भाजपा संस्कार की ही रही।
फडणवीस ने यह प्रयास शुक्रवार दिनांक 8 अक्टूबर से पहले किया होता तो अधिक प्रभावी रहता, शुक्रवार उम्मीदवारी अर्ज वापस लेने का अंतिम दिन था। लेकिन फडणवीस ने आज की कृती से पार्टी के बागियों को विशेष रूप से गडकरी गुट के पदाधिकारियों को ‘मैं कहूंगा वही पूर्व दिशा’ यह योग्य संदेश पहुंचाया। इसके अलावा स्वयं मुख्यमंत्री के दक्षिण-पश्चिम मतदारसंघ में सोले का विजय होता तो सत्ता के समीकरण भी बदल जाते, जगत के किसी भी कदावर नेता को उसका प्रतिस्पर्धी अपने ही मतदारसंघ में निर्माण हुआ चालत नहीं, यह राजनीतिक इतिहास पुराना नहीं है।
2020 में भाजपा के पदवीधर उम्मीदवार संदीप जोशी पक्षादेश के बाद पश्चिम में हिरिरीने कोहले के प्रचार कार्य को लगे थे, कोहले विजयी होकर विधान परिषद में जाने के बाद पश्चिम से 2029 की विधानसभा चुनाव में संदीप जोशी की दावेदारी मजबूत होती, ऐसा होने पर भाजपा शहर अध्यक्ष दयाशंकर तिवारी क्या केवल गरबा खेलेंगे? ऐसा उपहासात्मक प्रश्न भी किया जाता है। दयाशंकर तिवारी ने पश्चिम में बड़ा तामझाम करके गरबा का आयोजन किया है, लेकिन जो प्रतिसाद उन्हें मध्य नागपुर में चिटणीस पार्क में मिलता था वह पश्चिम में बिल्कुल नगण्य है। 2029 की विधानसभा चुनाव में ही उन्होंने मध्य नागपुर से अपनी दावेदारी पक्षश्रेष्ठों के सामने की थी। इसके लिए हिंदी भाषिक कार्ड भी खेला गया, लेकिन पार्टी ने टिकट नकारा और उनकी भी समझ निकाली।
नागपुर महानगरपालिका में संदीप जोशी बनाम दयाशंकर तिवारी में 2020 में महापौर पद के लिए भी अच्छी टक्कर हुई थी, इसके बाद एक-एक वर्ष का महापौर पद दोनों के हिस्से आया। जोशी के दुर्भाग्य से तुकराम मुंढे नाम का वादळ उद्धव ठाकरे सरकार ने नागपुर मनपा में आयुक्त पद पर भेजा और 24 मार्च 2020 से कोरोना ने नागपुर सहित जगभर में धमाका किया। 2029 में पश्चिम से फिर एक बार संदीप जोशी बनाम दयाशंकर तिवारी ऐसी टक्कर भाजपा में देखने को मिली तो नागपुरकरों को आश्चर्य नहीं होगा।
संक्षेप में, सोले आज मीडिया के सामने केवल कोसने के बाकी थे। उनकी निराशा, हताशा, देहबोली, शब्द और भाव बिल्कुल वैसे ही थे जैसे 2019 में बावनकुले के कामठी से विधानसभा का टिकट कटने के बाद थे। परिणामस्वरूप, सोले के मानसिक, भावनिक और आंतरिक द्वंद्व बावनकुले के अलावा कोई और समझ नहीं सकता। हालांकि, बावनकुले ने टिकट कटने के बाद भी प्रदेशाध्यक्ष पद स्वीकार करके संपूर्ण महाराष्ट्र घूमकर निकाला। दिन-रात पार्टी के लिए झटले और उसका फल उन्हें स्थानीय स्वराज्य संस्था के चुनाव से विधान परिषद का द्वार खुलने में मिला।
सोले के त्याग की दखल, भविष्य में मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस लेंगे या दिल्ली में लालकृष्ण आडवाणी की तरह उनका भी मार्गदर्शक मंडल में प्रस्थान होगा, इस पर अब भाजपा कार्यकर्ताओं की नजर है।