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Politics

संख्याबल नहीं था तो काहे की उछलकूद

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  • विधान परिषद चुनाव में कांग्रेस की हार पर बावनकुले का तीखा हमला, बोले- पहले ही चेताया था

नागपुर, 6 जून 2026 :नागपुर में शुक्रवार को पत्रकारों से वार्ता करते हुए महाराष्ट्र के राजस्व मंत्री चंद्रशेखर बावनकुले ने विधान परिषद चुनाव में मिली हार को लेकर कांग्रेस पर जमकर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि कांग्रेस के पास संख्याबल न होते हुए भी उसने जबरन चुनाव लड़ा और अंत में विदर्भ के उम्मीदवारों को ही पार्टी को मुँह की खानी पड़ी।

क्या कहा बावनकुले ने?

  • पहले ही दी थी चेतावनी: बावनकुले ने बताया कि नामांकन दाखिल करने से पहले ही उन्होंने कांग्रेस से संख्याबल का विचार कर चुनाव बिनविरोध कराने का आग्रह किया था। उन्होंने प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष हर्षवर्धन सपकाळ और राकांपा नेता शरद पवार से चुनाव न लड़ने की विनती की थी, लेकिन कांग्रेस ने उनकी बात को ठुकरा दिया और सभी स्थानों पर उम्मीदवार खड़े कर दिए।
  • विदर्भ में फजीहत: बावनकुले ने कहा कि अब उन्हीं के उम्मीदवारों ने वर्धा-चंद्रपूर-गडचिरोली और यवतमाळ मतदारसंघ में पार्टी को बिना कोई संकेत दिए परस्पर नाम वापस लेकर बड़ा झटका दिया है। इससे कांग्रेस को मुँह छिपाने की नौबत आ गई।
  • 70% मत महायुति के पास: उन्होंने दावा किया कि भाजपा-महायुति के पास 70% मत होने के कारण उनकी जीत पहले से ही सुनिश्चित थी। “उगाही के इस दौर में ईंधन और धन का अपव्यय न करें” ऐसी सलाह पहले ही विपक्ष को दी गई थी। चुनाव घोषित होने के बाद एक माह की आचार संहिता लगती है और 15 दिन प्रचार करना पड़ता है। यदि हमारे पास बहुमत न होता तो हम स्वयं चुनाव लड़ने से बचते।
  • हार का ठीकरा भाजपा पर न फोड़े: बावनकुले ने हर्षवर्धन सपकाळ को नसीहत दी कि अब वे “भाजपा ने प्रलोभन दिया, दबाव डाला या पैसे बाँटे” जैसे रोने-धोने वाले गीत गाना बंद करें। पहले आत्मपरीक्षण करें कि उनके उम्मीदवार सच में जीत रहे थे या नहीं और उनके पास कितने मतदाता थे। यदि पहले ही सलाह मान ली होती तो आज यह नामुष्की नहीं झेलनी पड़ती।
  • नवनीत राणा पर टिप्पणी: इसी दौरान उन्होंने नवनीत राणा को सलाह दी कि राज्यसभा का चुनाव लड़ना है या नहीं, इसका निर्णय वे स्वयं करें।

किसान कर्जमाफी पर रोहित पवार को जवाब

महायुति सरकार द्वारा घोषित किसान कर्जमाफी के विरुद्ध आंदोलन करने वाले विधायक रोहित पवार को भी बावनकुले ने आड़े हाथों लिया। उन्होंने कहा कि भाजपा-महायुति ने अपने चुनावी घोषणापत्र में किसानों को 2 लाख रुपये तक की कर्जमाफी का जो वादा किया था, उसे शब्दशः निभाया गया है। यह कुल 36 हजार करोड़ रुपये की ‘ओरिजनल’ कर्जमाफी है। इसके बाद भी यदि विपक्ष में किसी को आंदोलन का स्टंट करना है तो यह उनका अधिकार है।

पृष्ठभूमि राज्य की 17 विधान परिषद सीटों में से 6 सीटें बिनविरोध घोषित हुई हैं, जिनमें विदर्भ की दो सीटें शामिल हैं। इसी मुद्दे पर बावनकुले ने कांग्रेस की रणनीति को विफल बताते हुए यह बयान दिया है।

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नागपुर पदवीधर रण – सीएम को बूथ-बूथ उतरना पड़ा, गोकुल जैसा झटका लगेगा क्या ? दूसरी पसंद से 5-7 हजार से जीत का कयास

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  • 2.55 लाख में से 1.65 लाख वोट (64.76%), संघ का शताब्दी वर्ष, RSS vs दीक्षाभूमि और तेली vs कुणबी फैक्टर, कोहले की होर्डिंग पर आचार संहिता की अनदेखी, 27 को तय होगी किस्मत

नागपुर विभाग पदवीधर मतदारसंघ का चुनाव सिर्फ एक विधान परिषद सीट का चुनाव नहीं, बल्कि भाजपा, संघ और महाविकास आघाड़ी की प्रतिष्ठा की परीक्षा बन गया है। 2 लाख 55 हजार 603 पंजीकृत मतदाताओं में से 1 लाख 65 हजार 541 (64.76%) ने मतदान किया। अकेले नागपुर जिले में 1 लाख 44 हजार 466 मतदाता होने से मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को दक्षिण-पश्चिम सहित पूरे शहर में बूथ-निहाय दौरा करना पड़ा। डेढ़ लाख वोट के लिए CM को मैदान में उतरना पड़े, इसे सत्ताधारी भाजपा के लिए ‘शोकांतिका’ कहा जा रहा है।

1. मिशन कोहले नहीं, मिशन भाजपा और संघ का शताब्दी दांव –
संघ का यह शताब्दी वर्ष है, इसलिए किसी भी कीमत पर यह सीट भाजपा को जितानी है। स्वयंसेवकों के लिए ‘उम्मीदवार से बड़ा पक्ष’ है। चुनाव प्रमुख प्रवीण दटके ने भी झोंक कर काम किया। जनवरी में मनपा चुनाव में जेपी नड्डा के ‘अब भाजपा को संघ की जरूरत नहीं’ वाले बयान से नाराजगी थी, फिर भी हिंदुत्व भावना से संघ ने कमल का बटन दबाया था, वही पैटर्न इस बार भी दिखा।

बंडखोर अनिल सोले फैक्टर : अगर बंडखोर अनिल सोले को टिकट मिलता तो वंजारी के लिए मुश्किल बढ़ जाती। खुद वंजारी ने माना था कि सोले के लिए ब्राह्मण वर्ग के साथ संघ पूरी ताकत लगाता। संदीप जोशी के सामने वंजारी को OBC मोर्चाबंदी का फायदा मिला, इस बार तायवाडे फैक्टर कमजोर रहा।

2. जातीय समीकरण – तेली वर्सेस कुणबी और RSS वर्सेस दीक्षाभूमि –
इस चुनाव में दो एंगल हावी रहे। तेली vs कुणबी – चंद्रपुर में कुणबी बहुल होने से कोहले को लीड मिलने का अंदाज है, वहां प्रतिभा धानोरकर और बंटी भांगडिया का साथ है। तो नागपुर में भाजपा के कुछ तेली वोट वंजारी की ओर मुड़े। RSS vs दीक्षाभूमि – अनुसूचित जाति-जमात के मतदाताओं में बैठक में यही चर्चा थी कि RSS की जीत मतलब दीक्षाभूमि की हार। वे भावना में नहीं, जागरूक होकर वोट करते हैं। पहली पसंद जाति के डमी उम्मीदवार को और दूसरी पसंद वंजारी को देने का दावा है। कुल 38 उम्मीदवारों में 20 डमी एक ही पक्ष द्वारा खड़े करने की चर्चा है। मुस्लिम वोट 90% वंजारी की ओर गया, ऐसी भी चर्चा है। वंजारी पर SC उपवर्गीकरण और जातीय जनगणना पर चुप रहने की नाराजगी भी थी।

भंडारा-गोंदिया ने बढ़ाई टेंशन – वंजारी के लिए निराशाजनक बात भंडारा (21,349 में 14,319 – 67.07%) और गोंदिया (22,176 में 15,862 – 71.53%) में अपेक्षाकृत कम वोटिंग रही। यह नाना पटोले और प्रफुल्ल पटेल का गढ़ है। 2020 में पटेल MVA में थे, अब महायुति में हैं। आघाड़ी के नेताओं की मनधरणी में ही ताकत खर्च हुई। पटोले vs वडेट्टीवार और भोंडेकर vs फुके का छुपा वाद भी चर्चा में। उल्टा गडचिरोली (13,608 में 9,927 – 72.95%) में MVA एकजुट दिखी, जो नागपुर शहर का डॅमेज भरपाई करेगी।

3. कोटा का गणित – दूसरी पसंद तय करेगी विजेता –
चुनाव आयोग ने पहली पसंद के वोटों का कोटा तय करना है। अमूमन पहली फेरी में कोटा नहीं मिलता। CM का दावा है कोहले पहली फेरी में ही जीतेंगे।

विश्लेषकों का कयास है – अगर कोहले को 68 हजार और वंजारी को 65 हजार पहली पसंद मिली और कोहले कोटा पूरा न कर पाए तो दूसरी पसंद की गिनती में वंजारी 75 से 80 हजार तक पहुंच कर जीतेंगे। जीत का मार्जिन 2020 जैसा 17 हजार नहीं, 5 से 7 हजार ही रहेगा। बोगस/डुबार मतदाताओं के कागज ऐन चुनाव पहले जमा करने और विरोधी विचारधारा वालों के अर्ज पेंडिंग रखने के आरोप भी लगे।

4. गोकुल से नागपुर तक – सत्ता के दुरुपयोग का पैटर्न और आचार संहिता की धज्जियां –

इस लेख का दूसरा हिस्सा कोल्हापुर के गोकुल दूध महासंघ चुनाव से जुड़ा है, जिसका ट्रेलर नागपुर में दिखा।

गोकुल में मंत्री चंद्रकांत पाटिल, मुश्रीफ सहित पूरी यंत्रणा उतरी। पहले चुनाव टाल कर प्रशासक बैठाया गया, ठरावधारकों को कोर्ट जाना पड़ा, फिर अपात्र करने का दांव चला। सतेज (बंटी) पाटिल ने फिर कोर्ट से पात्र कराया। सभा में ठेकेदारों को ‘देवीची शपथ’ दिलाई गई और वोट न देने पर ‘ब्रेन स्ट्रोक’ की धमकी खुलेआम दी गई। अदृश्य शक्ति के तौर पर फडणवीस का हस्तक्षेप कोल्हापुरवासियों को नहीं रुचा। नतीजा – प्रतिकूल स्थिति में भी सतेज पाटिल ने 13 पदाधिकारी जिताकर सत्ता बरकरार रखी।

आरोप है कि मुख्यमंत्री दिल्लीश्वरों की आज्ञा से फायदे में चल रही ‘महानंदा’ को गुजराती ‘अमूल’ की दावणी में बांधना चाहते हैं, ताकि 20 लाख किसानों की जीवन संजीवनी गोकुल के जरिए अमूल की एकाधिकारशाही मुंबई-पुणे में टूट न सके। कोल्हापुरवासियों ने इसका झटका दिया, वही अगर नागपुर में दोहराया गया तो राज्य की राजनीति में दूरगामी परिणाम होंगे।

वही पैटर्न नागपुर में आचार संहिता के मामले में दिखा। नियम के अनुसार मतदान पूर्व प्रचार नहीं कर सकते, पर सुधाकर कोहले के बड़े-बड़े फ्लेक्स छत्रपति नगर, यशवंत स्टेडियम, मेहाडिया चौक, मानकापुर, मेडिकल चौक, उदय नगर सहित हर चौक-चौराहे पर लगे थे। मनपा और चुनाव यंत्रणा से शिकायत पर सिर्फ ‘तपास करून कारवाई’ का सरकारी जवाब मिला। विरोधक का होता तो आचार संहिता भंग में उम्मीदवारी रद्द तक की कार्रवाई होती, पर सत्ताधारी होने से ‘कायदेशीर हक’ जैसा बर्ताव दिखा, जो भाजपा ने 65 साल राज करने वाली कांग्रेस से ही सीखा है।

कुल मिलाकर 27 तारीख को पता चलेगा कि क्या गोकुल की तरह नागपुर भी सत्ता को झटका देता है और क्या तेली-मुस्लिम-SC/ST की दूसरी पसंद वंजारी को तारती है या संघ का शताब्दी जोश कोहले को पहली फेरी में ही कोटा पार कराता है।

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कोहले के नाम पर घमासान, मुख्यमंत्री ने संभाला मोर्चा

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  • नागपुर भाजपा में टिकट बंटवारे की पद्धति पर उठे सवाल, सोले के मनाने के बाद भविष्य में पारदर्शी प्रक्रिया का आश्वासन

नागपुर,13 अक्टूबर 2026 :

नागपुर विभागीय स्नातक मतदारसंघ के चुनाव में उम्मीदवार चयन की प्रक्रिया ने भारतीय जनता पार्टी के भीतर गहरी नाराजगी को जन्म दिया है। पूर्व विधायक अनिल सोले के बगावती तेवर के बाद मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को स्वयं नागपुर आकर हस्तक्षेप करना पड़ा।

मुख्यमंत्री ने सोले के घर जाकर उनसे मुलाकात की और उनकी नाराजगी दूर की। इस अवसर पर उन्होंने स्पष्ट चेतावनी दी कि भविष्य में किसी भी नेता को परस्पर उम्मीदवारों के नाम सार्वजनिक रूप से घोषित नहीं करने चाहिए। स्थानीय नेताओं के कान ऐंठते हुए उन्होंने कहा कि यह प्रक्रिया पार्टी के संसदीय मंडल और वरिष्ठ स्तर पर तय होती है।

बिना बैठक के हुई घोषणा

पार्टी सूत्रों के अनुसार, संसदीय मंडल की कोई बैठक लिए बिना और वरिष्ठ स्तर पर कोई चर्चा किए बिना स्थानीय स्तर पर सुधाकर कोहले का नाम घोषित करने की पद्धति पर मुख्यमंत्री ने नाराजगी व्यक्त की। उन्होंने कहा कि आगे से इस तरह की परस्पर घोषणा बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

सुधाकर कोहले के नाम की अचानक घोषणा के बाद अनिल सोले ने बगावत का झंडा उठाया था। वे पार्टी के आदेश को न मानते हुए बडकस चौक में स्वतंत्र प्रचार कार्यालय खोलने के लिए तैयार थे।

बावनकुले की भूमिका पर आपत्ति

सोले का मुख्य आक्षेप प्रदेश के राजस्व मंत्री चंद्रशेखर बावनकुले की कार्यप्रणाली पर था। बावनकुले कई बैठकों में कोहले ही स्नातक मतदारसंघ के उम्मीदवार हैं, यह सार्वजनिक रूप से कह रहे थे। उन्होंने कार्यकर्ताओं से कोहले का नाम बुलवाकर उनकी उम्मीदवारी पक्की होने का दावा किया था। पंजीकरण प्रमुख बनाने का अर्थ उम्मीदवार तय होना नहीं होता, लेकिन बावनकुले ने इसे ही अंतिम बताया था।

इससे सोले बुरी तरह दुखी हुए और उन्होंने बगावत का फैसला लिया था। उन्होंने रवींद्र चव्हाण और केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी के फोन भी नहीं उठाए।

पूर्व विधायक गिरीश व्यास के इस्तीफे की पेशकश और अनेक पूर्व विधायकों के सोले को मिल रहे आंतरिक समर्थन से कोहले के सामने बड़ा संकट खड़ा हो गया था। इसी आंतरिक विवाद को रोकने के लिए मुख्यमंत्री को स्वयं मध्यस्थता करनी पड़ी।

मुख्यमंत्री ने सोले के सामने खुले तौर पर स्वीकार किया कि उम्मीदवार घोषित करने की पद्धति में गलती हुई है। साथ ही उन्होंने आश्वासन दिया कि भविष्य में उम्मीदवार चयन के लिए पारदर्शी प्रक्रिया तैयार की जाएगी और पुराने व अनुभवी नेताओं को मुख्य धारा में लाकर योग्य जिम्मेदारियां दी जाएंगी।

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मुख्यमंत्री की घर पहुंचकर मनाने की कोशिश, सोले ने वापस ली उम्मीदवारी

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  • फडणवीस के लिए ‘गोड शेवट’, गिरीश व्यास ने भी लिया इस्तीफा वापस, भाजपा उम्मीदवार कोहले को मिलेगा समर्थन

नागपुर,12 अक्टूबर 2026 :

नागपुर में भाजपा के भीतर चल रहे बगावत के घटनाक्रम ने सोमवार को नया मोड़ ले लिया। दिनभर चर्चा थी कि बागी नेता प्रा. अनिल सोले दोपहर तक पार्टी उम्मीदवार को समर्थन देकर अपनी उम्मीदवारी वापस लेंगे। देर शाम तक इस पर भाजपा के विधायक, वरिष्ठ पदाधिकारी, कार्यकर्ता और पत्रकारों में भी चर्चा चलती रही।

कोराडी के नैवेद्यम होटल में भाजपा कोर कमेटी की बैठक खत्म होते ही रात करीब 8 बजे मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस सीधे प्रा. अनिल सोले के गंगोत्री, बुटी ले-आउट, लक्ष्मीनगर स्थित घर पहुंचे। उस समय सोले वर्धा में पदवीधर चुनाव के प्रचार दौरे पर थे। उन्हें मुख्यमंत्री के निवास पर आने की सूचना दी गई। पार्टी के इतने पुराने निष्ठावान कार्यकर्ता के घर स्वयं मुख्यमंत्री आए हैं, यह जानकर वे रुक नहीं सके और तुरंत वर्धा का प्रचार दौरा अधूरा छोड़कर नागपुर के लिए निकल पड़े। उन्होंने कहा, “मैं इतना बड़ा नहीं हुआ कि मुख्यमंत्री घर आएं और मैं उनसे न मिलूं।”

इससे पहले भाजपा प्रदेश अध्यक्ष रवींद्र चव्हाण भी सोले के घर जाकर उन्हें मनाने के लिए काफी देर तक प्रतीक्षा करते रहे थे, लेकिन सोले ‘नॉट रिचेबल’ रहे थे। हालांकि, जब स्वयं राज्य के मुख्यमंत्री सोले के घर पहुंचे, तो सोले के पास उनसे मिलने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा।

इसके बाद बंद कमरे में मुख्यमंत्री, राजस्व मंत्री चंद्रशेखर बावनकुले, अनिल सोले और पार्टी के एक अन्य वरिष्ठ कार्यकर्ता तथा पूर्व विधायक गिरीश व्यास के बीच लंबी चर्चा हुई। बाहर सोले के समर्थक बेचैनी से निर्णय की प्रतीक्षा कर रहे थे। बाहर आने के बाद मुख्यमंत्री ने मीडिया को बताया कि सोले ने पार्टी के अधिकृत उम्मीदवार सुधाकर कोहले को अपना समर्थन घोषित किया है।

फडणवीस के लिए गोड शेवट

मुख्यमंत्री फडणवीस ने कहा, “जब मैंने पार्टी का काम शुरू किया तब जो कुछ नेता थे उनमें अनिल सोले एक थे। उनके साथ कई वर्षों तक काम करने का अवसर मिला। विशेष रूप से पार्टी के कुछ कार्यकर्ताओं को संभालने का काम सोले करते हैं। इसलिए जब उन्होंने पदवीधर चुनाव का फॉर्म भरा तब उनकी बात सुनने और वे भाजपा के साथ रहें इसके लिए हमारी उनसे चर्चा शुरू हुई। उन्होंने स्पष्ट कहा कि पार्टी के संदर्भ में मेरी कोई नाराजगी नहीं है, कार्यपद्धति के संदर्भ में नाराजगी है।”

फडणवीस ने कहा कि निर्णय कौन सा होता है यह महत्वपूर्ण नहीं, निर्णय किस पद्धति से होता है यह महत्वपूर्ण है, यही सोले की नाराजगी थी। सोले ने कुछ महत्वपूर्ण बातें ध्यान में लाकर दीं। अधिक से अधिक लोगों को विश्वास में लेकर पार्टी स्तर पर निर्णय होने चाहिए, यह बात हमने मानी, उसकी नोट की और कार्यपद्धति में निश्चित बदलाव करेंगे, ऐसा आश्वासन हमने सोले को दिया है।

इसके अलावा पार्टी के कई ऐसे पुराने कार्यकर्ता हैं जिन्होंने पार्टी के लिए बहुत काम किया लेकिन अब पार्टी स्तर के किसी निर्णय में उन्हें शामिल नहीं किया जाता या पार्टी की मुख्यधारा से वे दूर हैं, उन पर ध्यान नहीं दिया जाता ऐसी शिकायत भी सोले ने की। इस संदर्भ में चर्चा करके उन कार्यकर्ताओं को फिर से मुख्यधारा में लाने के लिए हम निश्चित रूप से एक योजना बनाकर उन पर पार्टी या सरकार में विभिन्न जिम्मेदारियां कैसे दी जा सकती हैं, इस संदर्भ में प्रयास करेंगे।

सोले के साथ सकारात्मक चर्चा हुई। हमें विश्वास था कि इतने वर्षों से सोले ने पार्टी के खिलाफ भूमिका नहीं ली, बल्कि वर्षों से जब कोई व्यक्ति पार्टी से नाराज हुआ तब उसे समझाने की जिम्मेदारी अनिल सोले की ही होती थी। इसलिए हमें विश्वास था कि जब हम उनसे चर्चा करेंगे तो उन्हें कितना भी गुस्सा हो या सात्विक संताप हो, वह दूर होगा और वे पार्टी के साथ रहने का निर्णय करेंगे और मुझे आनंद है कि उन्होंने वही निर्णय लिया और इस चुनाव की बागडोर हाथ में लेकर भाजपा उम्मीदवार को जिताने के लिए फिर से अपनी मानसिकता बनाई है।

गिरीश व्यास ने भी लिया इस्तीफा वापस

फडणवीस ने कहा कि हमारे दूसरे प्रमुख नेता पूर्व विधायक गिरीश व्यास ने भी कई वर्षों तक पार्टी की सेवा की। वे पार्टी के अध्यक्ष रहे, विभिन्न पदों पर काम किया, उन्होंने भी इसी बात को लेकर नाराज होकर पार्टी सदस्यता का इस्तीफा दिया था, आज उनसे भी चर्चा हुई और उनकी बात भी हमने सुनी और उनके आरोप हमने माने। उन्होंने भी अपना इस्तीफा वापस लिया है। वे भी पार्टी के साथ हैं। पार्टी के लिए हमारे साथ काम करेंगे।

मुझे इस बात का आनंद है कि सोले और व्यास जैसे हमारे ज्येष्ठ कार्यकर्ता कभी कार्यपद्धति से हम पर नाराज होते हैं परंतु आज फिर पार्टी के पीछे खड़े हैं और पार्टी मजबूत कर रहे हैं। हम सब फिर एक बार पार्टी को बल देकर अपना उम्मीदवार चुनकर लाएंगे ही, साथ ही भविष्य में सभी कार्यकर्ताओं को लेकर मजबूत संगठन खड़ा करेंगे, ऐसा संकल्प हमने किया है। बावनकुले इस चर्चा में थे, उन्होंने आगे की सभी जिम्मेदारियां स्वीकार कीं। एक गोड शेवट हुआ है, ऐसा मुख्यमंत्री ने जोड़ा।

भावुक हुए सोले

संक्षेप में, स्वयंसेवक कभी भी अनुशासन के विरुद्ध काम नहीं करता, यह सोले की वापसी के बाद फिर एक बार सिद्ध हुआ। सोले ने कहा, “मैं नागपुर पदवीधर चुनाव से पीछे हटता हूं। मुख्यमंत्री स्वयं विनती करने मेरे घर आए, यह किसी को कुछ लगे लेकिन मुझे अच्छा नहीं लगा, भाजपा को बढ़ाने का काम मैंने किया है और पार्टी को कभी धोखा नहीं होगा।” यह कहते हुए सोले के आंसू छलक आए।

“मैं अपनी उम्मीदवारी वापस लेता हूं। बैलेट पेपर पर मेरी उम्मीदवारी कायम रही तो भी छह जिलों से एक भी वोट मुझे नहीं मिलेगा, ऐसा मेरा प्रयास रहेगा,” सोले ने कहा।

इस चुनाव की बागडोर सोले ही संभालेंगे। वे स्वयं पदवीधर के विधायक रहे हैं इसलिए उनके साथ पुराने लोग जुड़े हैं, सोले के इस निर्णय के बाद अन्य पुराने कार्यकर्ताओं को भी आनंद होगा। सोले का भाजपा के अधिकृत उम्मीदवार को समर्थन यह खबर हमारी बढ़त को मजबूत करती है, ऐसा फडणवीस ने कहा।

राजनीतिक विश्लेषकों का कयास

वास्तव में सोले की वापसी कांग्रेस के उम्मीदवार एड. अभिजीत वंजारी के पाले को फिर से 2020 की तरह इस चुनाव में भारी करती है, ऐसा राजनीतिक विश्लेषकों का कयास है। जिन पदवीधर मतदाताओं का झुकाव भाजपा के सुधाकर कोहले और कांग्रेस के अभिजीत वंजारी दोनों की ओर नहीं था, वे सोले को मतदान करने के विचार में थे। लेकिन सोले की वापसी के बाद सोले को मिलने वाले वोट वंजारी की ओर जाएंगे, ऐसा वे कहते हैं।

इतना ही नहीं, कोहले के बजाय सोले को फिर से उम्मीदवारी दी जाती तो शायद भाजपा को 2020 में 52 साल बाद नागपुर पदवीधर चुनाव में जो हार का झटका लगा था, उसका बदला लिया जा सकता था। मतदाताओं का झुकाव उच्च शिक्षित और स्वच्छ छवि वाले सोले की ओर था और चमत्कार होता, ऐसा दावा भी वे करते हैं। अब यह चुनाव 2020 की तरह ‘एकतरफा’ हो गया है और वंजारी का पलड़ा भारी है, ऐसा विश्लेषक कहते हैं।

मूल रूप से सोले स्वयं के साथ पार्टी की प्रतिष्ठा बचाने वाले व्यक्तित्व हैं। स्वयं राज्य के मुख्यमंत्री उनके घर पहुंचे तो उनके पास वापसी के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा। उनकी बगावत शाब्दिक निकली, कृती भाजपा संस्कार की ही रही।

फडणवीस ने यह प्रयास शुक्रवार दिनांक 8 अक्टूबर से पहले किया होता तो अधिक प्रभावी रहता, शुक्रवार उम्मीदवारी अर्ज वापस लेने का अंतिम दिन था। लेकिन फडणवीस ने आज की कृती से पार्टी के बागियों को विशेष रूप से गडकरी गुट के पदाधिकारियों को ‘मैं कहूंगा वही पूर्व दिशा’ यह योग्य संदेश पहुंचाया। इसके अलावा स्वयं मुख्यमंत्री के दक्षिण-पश्चिम मतदारसंघ में सोले का विजय होता तो सत्ता के समीकरण भी बदल जाते, जगत के किसी भी कदावर नेता को उसका प्रतिस्पर्धी अपने ही मतदारसंघ में निर्माण हुआ चालत नहीं, यह राजनीतिक इतिहास पुराना नहीं है।

2020 में भाजपा के पदवीधर उम्मीदवार संदीप जोशी पक्षादेश के बाद पश्चिम में हिरिरीने कोहले के प्रचार कार्य को लगे थे, कोहले विजयी होकर विधान परिषद में जाने के बाद पश्चिम से 2029 की विधानसभा चुनाव में संदीप जोशी की दावेदारी मजबूत होती, ऐसा होने पर भाजपा शहर अध्यक्ष दयाशंकर तिवारी क्या केवल गरबा खेलेंगे? ऐसा उपहासात्मक प्रश्न भी किया जाता है। दयाशंकर तिवारी ने पश्चिम में बड़ा तामझाम करके गरबा का आयोजन किया है, लेकिन जो प्रतिसाद उन्हें मध्य नागपुर में चिटणीस पार्क में मिलता था वह पश्चिम में बिल्कुल नगण्य है। 2029 की विधानसभा चुनाव में ही उन्होंने मध्य नागपुर से अपनी दावेदारी पक्षश्रेष्ठों के सामने की थी। इसके लिए हिंदी भाषिक कार्ड भी खेला गया, लेकिन पार्टी ने टिकट नकारा और उनकी भी समझ निकाली।

नागपुर महानगरपालिका में संदीप जोशी बनाम दयाशंकर तिवारी में 2020 में महापौर पद के लिए भी अच्छी टक्कर हुई थी, इसके बाद एक-एक वर्ष का महापौर पद दोनों के हिस्से आया। जोशी के दुर्भाग्य से तुकराम मुंढे नाम का वादळ उद्धव ठाकरे सरकार ने नागपुर मनपा में आयुक्त पद पर भेजा और 24 मार्च 2020 से कोरोना ने नागपुर सहित जगभर में धमाका किया। 2029 में पश्चिम से फिर एक बार संदीप जोशी बनाम दयाशंकर तिवारी ऐसी टक्कर भाजपा में देखने को मिली तो नागपुरकरों को आश्चर्य नहीं होगा।

संक्षेप में, सोले आज मीडिया के सामने केवल कोसने के बाकी थे। उनकी निराशा, हताशा, देहबोली, शब्द और भाव बिल्कुल वैसे ही थे जैसे 2019 में बावनकुले के कामठी से विधानसभा का टिकट कटने के बाद थे। परिणामस्वरूप, सोले के मानसिक, भावनिक और आंतरिक द्वंद्व बावनकुले के अलावा कोई और समझ नहीं सकता। हालांकि, बावनकुले ने टिकट कटने के बाद भी प्रदेशाध्यक्ष पद स्वीकार करके संपूर्ण महाराष्ट्र घूमकर निकाला। दिन-रात पार्टी के लिए झटले और उसका फल उन्हें स्थानीय स्वराज्य संस्था के चुनाव से विधान परिषद का द्वार खुलने में मिला।

सोले के त्याग की दखल, भविष्य में मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस लेंगे या दिल्ली में लालकृष्ण आडवाणी की तरह उनका भी मार्गदर्शक मंडल में प्रस्थान होगा, इस पर अब भाजपा कार्यकर्ताओं की नजर है।

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