- जहां ‘थिण्णई’ पर थके मुसाफिर को पानी मिलता था, वहां आज ‘स्टील का जार’ उड़ता है – प्रो. राजन की कलम से आधुनिक भारत के बदलते संस्कारों की मार्मिक दास्तान
भारत को समझना है तो एक शब्द को समझना होगा। वह शब्द है – आतिथ्य।
यह कभी सौदा नहीं था, यह धर्म था। यह अनुबंध था। एक अनजान राहगीर को देवता मान लेना, बिना बुलाए उसके लिए दो रोटी ज्यादा बना लेना, यही हमारा संस्कार था। इसी संस्कार ने हमें सिखाया था – अतिथि देवो भव।
मैं उस पीढ़ी का साक्षी हूं जिसने इस धर्म को जीते-जागते देखा है।
वो ‘थिण्णई’ क्या थी?
दक्षिण भारत के गांवों में घर सटे हुए होते थे। हर घर के आगे एक ऊंचा चबूतरा होता था, तमिल में उसे ‘थिण्णई’ कहते थे। वो ईंट-पत्थर नहीं था, वो एक विचार था, एक घोषणा थी।
कि आओ, थके हो तो बैठो। प्यासे हो तो पानी पियो। भूखे हो तो अन्न है। बिना किसी डर के सुस्ता लो और फिर अपनी राह पर निकल जाओ।
और इस विचार के पहरेदार कौन थे? हमारी मां, हमारी दादी। वे रोज थोड़ा सा भात ज्यादा पकाती थीं। इसलिए नहीं कि घर में कोई भूखा है, बल्कि इसलिए कि दोपहर में कोई अनजान भूखा आ गया तो? कोई न्योता नहीं, कोई अपेक्षा नहीं। पर चूल्हे पर आंच और मन में जगह, दोनों हमेशा तैयार। यही भारत था।
अब सब बदल गया है
आज वो ‘थिण्णई’ उजड़ गई है। उन घरों को तोड़कर कांच और कंक्रीट के फ्लैट खड़े हो गए हैं। ‘थिण्णई’ के साथ ही वो दिल भी ढह गया जो उसमें बसता था।
आज की बहुमंजिला इमारतों में सब कुछ है – सिक्योरिटी गेट है, सीसीटीवी है, इंटरकॉम है, पर पड़ोसी का नाम तक नहीं पता। हमारे पास मकान हैं, पर घर नहीं रहे।
मेरे जीवन की वो शाम – जब चाय नहीं, स्टील का जार आया
इस बदलाव को मैंने अपनी आंखों से देखा, अपने कानों से सुना।
एक दिन मैं स्कूटर से एक कॉलोनी से गुजर रहा था। मेरे पुराने छात्र वैभव ने मुझे देख लिया। दौड़कर गेट खोला, चरण स्पर्श किया और बोला – सर, चाय पीकर जाइए।
दिल भर आया। लगा, चलो गुरु-शिष्य परंपरा आज भी जिंदा है। ‘अतिथि देवो भव’ आज भी कहीं तो है।
मैं सम्मान के साथ ड्राइंग रूम में बैठ गया। वह अंदर पत्नी को मेरे आने की खबर देने गया। मैं अखबार पलट रहा था। तभी रसोई से बर्तन पटकने की जोरदार आवाज आई। मैंने सोचा, गलती से गिर गया होगा।
कुछ देर बाद वह लौटा। चेहरे की हंसी गायब थी। माथे पर पसीना था। आवाज कांप रही थी। वह कॉलेज के पुराने किस्से याद करने की कोशिश कर रहा था, पर शब्द लड़खड़ा रहे थे। फिर वह फिर से अंदर गया।
और इस बार धमाका हुआ। रसोई से एक स्टील का जार लुढ़कता-घिसटता सीधा मेरे पैरों के पास आकर गिरा।
उस एक पल में तीन लोग एक साथ जाग गए – मेरे अंदर का प्रोफेसर, मेरे अंदर का दार्शनिक और मेरे अंदर का आम आदमी। मैं समझ गया। अगर मैं एक मिनट और रुका, तो अगला बर्तन मुझ पर या मेरे उस मासूम छात्र पर निशाना साध कर फेंका जाएगा।
आतिथ्य का ‘थिण्णई’ से ‘आर्मगेडन’ तक का सफर वहीं पूरा हो गया।
मैंने हाथ जोड़े, गेट से बाहर निकला, स्कूटर को किक मारी और वहां से निकल गया। मैंने अपनी गरिमा और उसके वैवाहिक जीवन, दोनों को बचा लिया।
सवाल हम सबसे
मित्रों, यह किस्सा हंसी के लिए नहीं है। यह आत्ममंथन के लिए है।
हम होंठों से कहते हैं – आइए, आइए। पर हमारी रसोई कहती है – क्यों आए? हम जुबान से चाय पूछते हैं, पर हमारे बर्तन सच बोल देते हैं।
हमने दीवारें ऊंची कर लीं, दिल छोटे कर लिए। गेट लगा लिए, पर दिल के दरवाजे बंद कर लिए।
दुनिया की सबसे ऊंची इमारतें बना लेंगे, पर अगर दिल में ‘थिण्णई’ नहीं बनाई, तो हम दुनिया के सबसे गरीब, सबसे असंवेदनशील लोग कहलाएंगे।
आइए, एक ‘थिण्णई’ फिर से बनाते हैं – ईंट और सीमेंट से नहीं, अपने हृदय में। जहां आज भी एक अजनबी के लिए थोड़ा पानी, थोड़ा प्यार और थोड़ी जगह बची रहे।
- प्रो. डॉ. एस. एम. राजन, शिक्षाविद एवं आतिथ्य-दर्शन के अध्येता