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राजनेताओं के सुपुत्र विदेश में, आम लोगों के बच्चे देश में ही संघर्ष में

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केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान की पुत्री नैमिषा प्रधान ने अमेरिका के मैसाचुसेट्स स्थित टफ्ट्स विश्वविद्यालय के ‘फ्लेचर स्कूल ऑफ लॉ एंड डिप्लोमेसी’ से मास्टर ऑफ लॉज (एलएल.एम.) की उपाधि प्राप्त की है।

इस घटना के पश्चात देश की शिक्षा व्यवस्था और सामान्य विद्यार्थियों की समस्याओं पर पुनः जोरदार चर्चा आरंभ हो गई है। एक ओर नेताओं के बच्चे विदेशों के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं, वहीं भारत के सामान्य विद्यार्थी विषम परिस्थितियों से जूझ रहे हैं और अनेक संकटों का सामना कर रहे हैं।

अनेक बड़े राजनीतिक नेताओं के पुत्र-पुत्रियाँ एवं पौत्र-पौत्रियाँ उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका, ब्रिटेन, यूरोप और ऑस्ट्रेलिया जैसे विकसित देशों के नामी विश्वविद्यालयों में जा रहे हैं। इन नेताओं के पास विदेश में शिक्षा का व्यय वहन करने की अपार आर्थिक क्षमता है। नेताओं के पास उपलब्ध अथाह संपत्ति और सत्ता के दुरुपयोग के कारण वे अपने बच्चों को विदेश के अत्यंत महँगे शिक्षण संस्थानों में पढ़ा पाते हैं। दूसरी ओर, सामान्य नागरिकों को महँगाई और सीमित आय के कारण स्थानीय स्तर पर ही संघर्ष करना पड़ता है।

यह आज की व्यवस्था की एक कटु किन्तु वास्तविक पीड़ा है। सत्ता में बैठे जनप्रतिनिधियों के बच्चे उच्च शिक्षा और विलासितापूर्ण जीवनशैली के लिए विदेश में बस रहे हैं। इसके विपरीत, साधारण नागरिकों के बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और रोजगार के लिए देश में ही प्रतिदिन संघर्ष करना पड़ता है, जिससे बढ़ती सामाजिक खाई का प्रतिबिंब स्पष्ट दिखाई देता है।

नेताओं की बढ़ती संपत्ति और सामान्य जनों की सीमित आय के बीच की खाई अत्यंत विशाल है। विदेश में उच्च शिक्षा अत्यंत महँगी हो गई है। सामान्य नागरिकों को बढ़ती महँगाई, जैसे घरेलू खर्च, स्वास्थ्य, के कारण बच्चों की शिक्षा के लिए भारतीय रिज़र्व बैंक के आर्थिक निर्देशों के अनुसार ऋण लेना पड़ता है अथवा जीवन भर की बचत व्यय करनी पड़ती है। राजनीतिक पदों का उपयोग कर अपने हित साधना और भ्रष्टाचार के माध्यम से अथाह संपत्ति एकत्र करने के कारण नेताओं की क्रय शक्ति सामान्य नागरिकों की तुलना में कई गुना अधिक होती है।

स्थानीय स्तर पर गुणवत्तापूर्ण एवं सस्ते सरकारी विद्यालयों-महाविद्यालयों का अभाव होने के कारण सामान्य नागरिकों को महँगे निजी शिक्षण संस्थानों पर निर्भर रहना पड़ता है। इस विषमता के कारण प्रतिभाशाली होने पर भी अनेक सामान्य विद्यार्थी अच्छी शिक्षा से वंचित रह जाते हैं, जबकि दूसरी ओर राजनीतिक नेताओं के बच्चे विश्वस्तरीय शिक्षा सरलता से प्राप्त कर लेते हैं।

देश की सरकारी शिक्षा व्यवस्था और स्वास्थ्य सेवाओं का स्तर गिर चुका है। नेताओं का अपना परिवार विदेश में अथवा उच्च स्तरीय निजी सुविधाओं में होता है, जबकि सामान्य जन को कमजोर व्यवस्था का दंश सहना पड़ता है।

स्थानीय शिक्षा पद्धति और वर्तमान उद्योग जगत की माँग के बीच बड़ा अंतर है। इस कारण उपाधि प्राप्त होने पर भी लाखों युवा रोजगार की प्रतीक्षा में हैं। व्यावसायिक कौशल प्रदान करने वाले संस्थानों का अभाव और बढ़ती प्रतिस्पर्धा के कारण सामान्य बच्चों को बेरोजगारी का सामना करना पड़ रहा है।

नेताओं और उच्च वर्ग के लिए विदेश में अथवा देश के अति-उच्च स्तरीय निजी सुविधाएँ उपलब्ध हैं। किन्तु सामान्य जनता को कर चुकाने पर भी मूलभूत सुविधाओं से वंचित रहना पड़ता है, यह एक बड़ी विडंबना है।

जनप्रतिनिधियों और सरकारी अधिकारियों के परिवारों के लिए सरकारी विद्यालयों और चिकित्सालयों का उपयोग अनिवार्य करने पर स्वतः ही इन व्यवस्थाओं का स्तर सुधरेगा, ऐसी माँग अनेक सामाजिक संस्थाओं द्वारा बार-बार की जाती है।

सामान्य बच्चों को यहाँ की प्रतियोगी परीक्षाओं में व्याप्त गड़बड़ियों, सीटों की सीमित संख्या और बेरोजगारी का सामना करना पड़ता है, जबकि नेताओं के बच्चे इन सभी परिस्थितियों से दूर सुरक्षित वातावरण में शिक्षा पूर्ण करते हैं। इस अंतर को दूर करने के लिए स्थानीय रोजगार सृजन, शिक्षा के बाजारीकरण को रोकना और सरकारी विद्यालयों का स्तर सुधारना अत्यंत आवश्यक है।

प्रतियोगी परीक्षाओं में अनियमितता, सीटों की कमी और बेरोजगारी के कारण सामान्य परिवारों के युवा बड़े पैमाने पर संघर्ष कर रहे हैं। यह प्रश्न सीधे लाखों विद्यार्थियों के भविष्य और उनकी मानसिक, सामाजिक स्थिति से जुड़ा हुआ है।

आर्थिक रूप से सक्षम अथवा राजनीतिक पृष्ठभूमि वाले परिवारों के बच्चों को अंतरराष्ट्रीय स्तर की शिक्षा, उत्तम संसाधन और सुरक्षित भविष्य सरलता से उपलब्ध हो जाते हैं। सामान्य विद्यार्थियों को रोजगार के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं अथवा बाजार की नौकरियों पर निर्भर रहना पड़ता है, जबकि संपन्न या राजनीतिक परिवारों के बच्चों के पास व्यवसाय या अन्य सुरक्षित विकल्प उपलब्ध होते हैं।

नीति-निर्माता और राजनीतिक नेता विदेश में शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं, इसलिए स्थानीय शिक्षा व्यवस्था की त्रुटियों को सुधारने की ओर जितनी गंभीरता से ध्यान देना आवश्यक है, उतना नहीं दिया जाता, ऐसी एक सामान्य भावना नागरिकों में उत्पन्न हो रही है। इस समस्या के समाधान के लिए स्थानीय शिक्षा व्यवस्था का स्तर सुधारना और सभी को समान रोजगार के अवसर उपलब्ध कराना अत्यंत आवश्यक है।

अनेक राजनीतिक नेताओं के बच्चे विदेश में उच्च शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं, जबकि सामान्य जनों के बच्चों को स्थानीय शिक्षा व्यवस्था और रोजगार के अपर्याप्त अवसरों की परिस्थिति का सामना करना पड़ रहा है।

राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव और प्रशासनिक उदासीनता के कारण देश का स्कूली एवं उच्च शिक्षा बजट अपर्याप्त रहता है। नेताओं के बच्चे विदेश में पढ़ रहे हैं, इसलिए स्थानीय सरकारी शिक्षा व्यवस्था में सुधार के प्रति वे अधिक आग्रही नहीं होते। इस खाई को कम करने के लिए स्थानीय शिक्षा व्यवस्था को विश्वस्तरीय बनाना, व्यावसायिक पाठ्यक्रमों पर बल देना और सभी के लिए समान रोजगार के अवसर उत्पन्न करना आवश्यक है।

सामान्य वर्ग के युवाओं को समान अवसर और न्यायपूर्ण वातावरण मिलना एक सुदृढ़ लोकतंत्र और समाज के विकास के लिए अत्यंत आवश्यक माना जाता है।

  • प्रो. डॉ. सुधीर अग्रवाल, वर्धा

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राज ठाकरे और संजय राउत के दिवास्वप्न – ‘कुछ महीनों में देश में प्रधानमंत्री ही नहीं होगा’ जैसा दावा कितना हास्यास्पद?

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  • स्पष्ट और बेबाक – संविधान में PM पद कभी खाली नहीं रह सकता, मोदी-विरोध में बेबुनियाद बयानबाजी और विदेशी शक्तियों की साजिश का विश्लेषण

महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना प्रमुख राज ठाकरे और शिवसेना (उबाठा) के स्वघोषित विश्व प्रवक्ता संजय राउत के दो बयान इन दिनों चर्चा में हैं। अलग-अलग लगने वाले इन बयानों का ध्वनित अर्थ एक ही है – मोदी-द्वेष से उपजी गैर-जिम्मेदार भविष्यवाणी।

राज ठाकरे का दावा –
एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में राज ठाकरे ने कहा कि अगले दो-तीन महीनों में देश में ऐसी स्थिति आएगी कि प्रधानमंत्री ही नहीं होगा। राज ठाकरे की राजनीति हमेशा ‘तळ्यात-मळ्यात’ वाली रही है। कभी वे खुद को शरद पवार के कुनबे में छोड़ देते हैं, कभी मोदी से नजदीकी दिखती है। वर्षों झगड़ने के बाद अब सगे चचेरे भाई से हाथ मिला रहे हैं, कभी कांग्रेस के साथ समझौता तो कभी अभिजीत दीपके को सिर पर बिठाकर नाचना। कुल मिलाकर स्थिर भूमिका के अभाव वाले नेता।

उन्होंने यह भविष्यवाणी किस आधार पर की? क्या संविधान पढ़ा? प्रथा-परंपरा देखी?

हमारे देश में संविधान के अनुसार प्रधानमंत्री का पद कभी रिक्त नहीं रखा जा सकता। यदि मुख्यमंत्री इस्तीफा दे दे या निधन हो जाए और नया मुख्यमंत्री न बन सके तो राष्ट्रपति शासन लग सकता है। महापौर, नगराध्यक्ष, जिला परिषद अध्यक्ष या सरपंच न हो तो प्रशासक नियुक्त हो सकता है। लेकिन प्रधानमंत्री न हो तो राष्ट्रपति शासन लगाकर राष्ट्रपति शासन चलाएंगे, ऐसी व्यवस्था ही नहीं है।

इसीलिए किसी कारण प्रधानमंत्री इस्तीफा भी दे दे तो नया प्रधानमंत्री आने तक उसे कार्यवाहक प्रधानमंत्री के रूप में काम करना ही पड़ता है। राष्ट्रपति वैसी सूचना देते हैं। यदि पद पर रहते प्रधानमंत्री का निधन हो जाए तो नए कार्यवाहक प्रधानमंत्री की शपथ होने तक आधिकारिक तौर पर निधन की घोषणा भी नहीं की जाती।

मेरी याद के अनुसार 1964 में पंडित नेहरू के निधन पर गुलजारीलाल नंदा को कार्यवाहक PM की शपथ दिलाने के बाद ही निधन की घोषणा हुई थी। यही लालबहादुर शास्त्री के निधन पर भी हुआ। इंदिरा गांधी की गोली मारकर हत्या सुबह करीब 10 बजे हुई थी, एम्स ले जाते-ले जाते उनका निधन हो गया था, लेकिन पश्चिम बंगाल से राजीव गांधी के दिल्ली लौटकर कार्यवाहक PM की शपथ लेने तक सिर्फ “गोली लगी, एम्स में भर्ती” यही खबर रेडियो-टीवी पर चलती रही।

1979 में चौधरी चरण सिंह ने संसद भंग की थी, फिर भी राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी ने उन्हें नई सरकार तक कार्यवाहक रहने को कहा। यही चंद्रशेखर (1991), इंद्रकुमार गुजराल (1997) और अटल बिहारी वाजपेयी (1999) के मामले में हुआ। इसलिए “देश में प्रधानमंत्री ही नहीं होगा” यह दावा हास्यास्पद है। मान लो अगले चार महीने में गड़बड़ी हुई और मोदी को इस्तीफा देना भी पड़ा, तब भी नए PM तक उन्हें ही कार्यवाहक रहना पड़ेगा। यह संवैधानिक प्रावधान है। राज ठाकरे मन में आए वैसा बोल देते हैं, अक्सर बिना आधार के।

संजय राउत का भाकित –
शिवसेना के दशहरा मेले में संजय राउत ने कहा कि अगले 3-4 महीने में देश में भारी गड़बड़ी होगी, नरेंद्र मोदी PM नहीं रहेंगे, सत्ता परिवर्तन होगा। अभिजीत दीपके के पहले आंदोलन के बाद से ही विपक्ष को सत्ता परिवर्तन के दिवास्वप्न दिखने लगे हैं।

वास्तव में मोदी और सहयोगी पिछले 12 साल से शासन चला रहे हैं, कई अच्छे काम किए हैं, इसलिए आम आदमी कहीं न कहीं उनके साथ दिखता है। 2024 में भाजपा को झटका लगा, 303 से 240 पर आ गई। तब विपक्ष सरकार बनाएगा क्या, भाजपा ने कुछ समय इंतजार किया, लेकिन विपक्ष की आपसी खींचतान देखकर कई छोटे दलों ने मोदी के नेतृत्व वाली सरकार के साथ ही रहने का फैसला किया। आज धीरे-धीरे भाजपा का समर्थन फिर बढ़ रहा है। कुछ दलों में टूट से सांसद भाजपा में आए हैं। अप्रैल 2026 में दो-तिहाई बहुमत के अभाव में खारिज हुआ महिला आरक्षण विधेयक अब फिर पारित कराने के लिए विशेष सत्र बुलाने की हलचल है।

विपक्ष किसी तरह मौजूदा सरकार को गिराना चाहता है। यह सिर्फ इच्छा नहीं, इसके पीछे विदेशी शक्तियों का साथ होने के पुख्ता सबूत मिलने की जानकारी है। पिछले 12 साल में मोदी नेतृत्व में देश की जो प्रगति हुई, वह बाहर के विकसित देशों को पच नहीं रही। इसलिए देश में अशांति फैलाकर सरकार गिराने के प्रयास हैं। अशांति फैलाने के लिए ही ऐसे आंदोलनों को स्पॉन्सर किया जाता है। नहीं तो विदेश में पढ़ाई छोड़कर अभिजीत दीपके को विशेष विमान से भारत लाना और आंदोलन का ढांचा खड़ा करने में मदद करना, इसका क्या अर्थ निकाला जाए? अभी मतदाता सूची पुनरीक्षण के मुद्दे पर भी आंदोलन भड़काया जा रहा है, पर उसमें आम आदमी कितना है, यह जांचना जरूरी है। आम आदमी को पहले रोजी-रोटी की चिंता है, वह ऐसे आंदोलन में कभी नहीं आएगा।

आज संजय राउत की बात को कोई गंभीरता से लेता है, ऐसा किसी को नहीं लगता। वे रोज सुबह मीडिया को बुलाकर अलग-अलग फोकनाड (शेखी) हांकते हैं। कुछ मराठी चैनलों को छोड़कर कोई गंभीरता से नहीं लेता। मराठी न्यूज चैनल पर उनका बोलना दिखता है तो आम आदमी टाइमपास के तौर पर देखता है। उनकी ज्यादातर कहानियां कपोल-कल्पित और सिर्फ मनोरंजक होती हैं, तथ्य कम।

आज विपक्ष ने कुछ आंदोलन खड़े करने की कोशिश जरूर की, हिंसा भड़काने के इरादे के संकेत भी मिले, लेकिन हिंसा अभी तक नहीं हुई और मोदी सरकार होने भी नहीं देगी, ऐसा आज का चित्र है। ऐसी स्थिति में अगले चार महीने में सरकार गिरने के क्या कारण होंगे, यह राउत को तथ्यों के साथ स्पष्ट करना चाहिए, हवाई बातों से नहीं। नहीं तो आम आदमी इसे “सुबह का भोंगा” समझकर अनदेखा कर देगा, जैसे मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस उन्हें “सुबह 9 बजे का भोंगा” कहते हैं।

कुल मिलाकर अगले कुछ महीनों में देश में अराजकता और सत्ता परिवर्तन होगा और कुछ महीने PM ही नहीं रहेगा, ऐसा चित्र आज तो नहीं दिखता। राज ठाकरे और संजय राउत को दिवास्वप्न आते हैं, यह मानसिक बीमारी भी हो सकती है। हो तो इलाज कराएं।

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दीवारों के बीच खो गया ‘अतिथि देवो भव’ – अब फ्लैट हैं, दिल नहीं

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  • जहां ‘थिण्णई’ पर थके मुसाफिर को पानी मिलता था, वहां आज ‘स्टील का जार’ उड़ता है – प्रो. राजन की कलम से आधुनिक भारत के बदलते संस्कारों की मार्मिक दास्तान

भारत को समझना है तो एक शब्द को समझना होगा। वह शब्द है – आतिथ्य।

यह कभी सौदा नहीं था, यह धर्म था। यह अनुबंध था। एक अनजान राहगीर को देवता मान लेना, बिना बुलाए उसके लिए दो रोटी ज्यादा बना लेना, यही हमारा संस्कार था। इसी संस्कार ने हमें सिखाया था – अतिथि देवो भव।

मैं उस पीढ़ी का साक्षी हूं जिसने इस धर्म को जीते-जागते देखा है।

वो ‘थिण्णई’ क्या थी?

दक्षिण भारत के गांवों में घर सटे हुए होते थे। हर घर के आगे एक ऊंचा चबूतरा होता था, तमिल में उसे ‘थिण्णई’ कहते थे। वो ईंट-पत्थर नहीं था, वो एक विचार था, एक घोषणा थी।

कि आओ, थके हो तो बैठो। प्यासे हो तो पानी पियो। भूखे हो तो अन्न है। बिना किसी डर के सुस्ता लो और फिर अपनी राह पर निकल जाओ।

और इस विचार के पहरेदार कौन थे? हमारी मां, हमारी दादी। वे रोज थोड़ा सा भात ज्यादा पकाती थीं। इसलिए नहीं कि घर में कोई भूखा है, बल्कि इसलिए कि दोपहर में कोई अनजान भूखा आ गया तो? कोई न्योता नहीं, कोई अपेक्षा नहीं। पर चूल्हे पर आंच और मन में जगह, दोनों हमेशा तैयार। यही भारत था।

अब सब बदल गया है

आज वो ‘थिण्णई’ उजड़ गई है। उन घरों को तोड़कर कांच और कंक्रीट के फ्लैट खड़े हो गए हैं। ‘थिण्णई’ के साथ ही वो दिल भी ढह गया जो उसमें बसता था।

आज की बहुमंजिला इमारतों में सब कुछ है – सिक्योरिटी गेट है, सीसीटीवी है, इंटरकॉम है, पर पड़ोसी का नाम तक नहीं पता। हमारे पास मकान हैं, पर घर नहीं रहे।

मेरे जीवन की वो शाम – जब चाय नहीं, स्टील का जार आया

इस बदलाव को मैंने अपनी आंखों से देखा, अपने कानों से सुना।

एक दिन मैं स्कूटर से एक कॉलोनी से गुजर रहा था। मेरे पुराने छात्र वैभव ने मुझे देख लिया। दौड़कर गेट खोला, चरण स्पर्श किया और बोला – सर, चाय पीकर जाइए।

दिल भर आया। लगा, चलो गुरु-शिष्य परंपरा आज भी जिंदा है। ‘अतिथि देवो भव’ आज भी कहीं तो है।

मैं सम्मान के साथ ड्राइंग रूम में बैठ गया। वह अंदर पत्नी को मेरे आने की खबर देने गया। मैं अखबार पलट रहा था। तभी रसोई से बर्तन पटकने की जोरदार आवाज आई। मैंने सोचा, गलती से गिर गया होगा।

कुछ देर बाद वह लौटा। चेहरे की हंसी गायब थी। माथे पर पसीना था। आवाज कांप रही थी। वह कॉलेज के पुराने किस्से याद करने की कोशिश कर रहा था, पर शब्द लड़खड़ा रहे थे। फिर वह फिर से अंदर गया।

और इस बार धमाका हुआ। रसोई से एक स्टील का जार लुढ़कता-घिसटता सीधा मेरे पैरों के पास आकर गिरा।

उस एक पल में तीन लोग एक साथ जाग गए – मेरे अंदर का प्रोफेसर, मेरे अंदर का दार्शनिक और मेरे अंदर का आम आदमी। मैं समझ गया। अगर मैं एक मिनट और रुका, तो अगला बर्तन मुझ पर या मेरे उस मासूम छात्र पर निशाना साध कर फेंका जाएगा।

आतिथ्य का ‘थिण्णई’ से ‘आर्मगेडन’ तक का सफर वहीं पूरा हो गया।

मैंने हाथ जोड़े, गेट से बाहर निकला, स्कूटर को किक मारी और वहां से निकल गया। मैंने अपनी गरिमा और उसके वैवाहिक जीवन, दोनों को बचा लिया।

सवाल हम सबसे

मित्रों, यह किस्सा हंसी के लिए नहीं है। यह आत्ममंथन के लिए है।

हम होंठों से कहते हैं – आइए, आइए। पर हमारी रसोई कहती है – क्यों आए? हम जुबान से चाय पूछते हैं, पर हमारे बर्तन सच बोल देते हैं।

हमने दीवारें ऊंची कर लीं, दिल छोटे कर लिए। गेट लगा लिए, पर दिल के दरवाजे बंद कर लिए।

दुनिया की सबसे ऊंची इमारतें बना लेंगे, पर अगर दिल में ‘थिण्णई’ नहीं बनाई, तो हम दुनिया के सबसे गरीब, सबसे असंवेदनशील लोग कहलाएंगे।

आइए, एक ‘थिण्णई’ फिर से बनाते हैं – ईंट और सीमेंट से नहीं, अपने हृदय में। जहां आज भी एक अजनबी के लिए थोड़ा पानी, थोड़ा प्यार और थोड़ी जगह बची रहे।

  • प्रो. डॉ. एस. एम. राजन, शिक्षाविद एवं आतिथ्य-दर्शन के अध्येता

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सुप्रीम कोर्ट पहले अपनी जवाबदेही तय करे, फिर संजय राउत से जवाब मांगे!

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  • न्यायपालिका की गरिमा नोटिस से नहीं, निष्पक्ष, पारदर्शी और समयबद्ध न्याय से बचती है

नागपुर,18 अक्टूबर 2026 :

भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने राज्यसभा सांसद संजय राउत से उनके आचरण पर स्पष्टीकरण मांगा है। सवाल यह नहीं कि न्यायपालिका की आलोचना की कोई सीमा होनी चाहिए या नहीं। सवाल यह है कि क्या न्यायपालिका स्वयं अपने पिछले दस वर्षों के विवादास्पद घटनाक्रमों पर जनता के सवालों का संतोषजनक जवाब देने को तैयार है?

1. शिवसेना की फूट पर चार वर्षों से न्याय की प्रतीक्षा क्यों?

जून 2022 में महाराष्ट्र की निर्वाचित सरकार गिर गई। शिवसेना टूटी, पार्टी का नाम और चुनाव चिह्न विवाद में चले गए। मई 2023 में संविधान पीठ का महत्वपूर्ण फैसला आया, लेकिन दल-बदल, विधायकों की अयोग्यता और पार्टी की पहचान से जुड़े विवाद आज भी न्यायिक प्रक्रिया में हैं। जब चुनाव निकल जाते हैं, सरकारें अपना कार्यकाल पूरा करने लगती हैं और संवैधानिक विवाद लंबित रहते हैं, तब विलंब से मिलने वाले न्याय का लोकतंत्र के लिए क्या अर्थ रह जाता है?

2. वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल की निराशा क्या सामान्य घटना है?

राज्यसभा सांसद और वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने भी बार-बार न्यायालय जाने के बावजूद अपेक्षित राहत न मिलने पर सार्वजनिक निराशा व्यक्त की। बाद में उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के सकारात्मक हस्तक्षेप की सराहना भी की। लेकिन देश के अनुभवी संवैधानिक अधिवक्ता को न्यायिक प्रक्रिया की प्रभावशीलता पर चिंता व्यक्त करनी पड़े, तो उस चिंता को गंभीरता से लेना आवश्यक है।

3. न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के आवास पर नकदी मिलने का मामला!

मार्च 2025 में एक न्यायाधीश के सरकारी आवास पर आग लगने के बाद नकदी मिलने का मामला सामने आया। लेकिन प्रश्न आज भी महत्वपूर्ण है – न्यायाधीशों के विरुद्ध गंभीर आरोपों की जांच और सामान्य नागरिक के विरुद्ध आपराधिक जांच के मानदंडों में अंतर क्यों दिखाई देता है?

4. पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई और राज्यसभा की सदस्यता!

पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई के विरुद्ध 2019 में यौन उत्पीड़न के आरोप लगे थे। इसके बाद 2020 में सरकार द्वारा उन्हें राज्यसभा के लिए मनोनीत किया जाना एक बड़े सार्वजनिक विवाद का विषय बना। क्या संवैधानिक पदों से सेवानिवृत्ति के तुरंत बाद राजनीतिक नियुक्तियां न्यायपालिका की स्वतंत्रता के प्रति जनता के विश्वास को प्रभावित नहीं करतीं?

5. प्रधानमंत्री न्यायाधीश के घर जाएं तो मर्यादा, विपक्ष सवाल पूछे तो आचरण पर स्पष्टीकरण?

11 सितंबर 2024 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश डी. वाई. चंद्रचूड़ के निवास पर गणेश पूजा में शामिल हुए। इसकी तस्वीरें सार्वजनिक हुईं।

धार्मिक पूजा करना अपराध नहीं है। लेकिन न्यायपालिका और कार्यपालिका के शीर्ष पदाधिकारियों की सार्वजनिक निकटता पर निष्पक्षता और संस्थागत मर्यादा के प्रश्न उठना स्वाभाविक है। यदि प्रधानमंत्री के साथ सार्वजनिक मुलाकात को सामान्य माना जाता है, तो विपक्षी जनप्रतिनिधियों द्वारा मुख्य न्यायाधीश से मिलने की इच्छा पर भी समान संवैधानिक संवेदनशीलता दिखाई जानी चाहिए।

6. चुनाव आयोग पर गंभीर सवालों का जवाब कौन देगा?

मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण, मतदाताओं के नाम हटाए जाने के आरोपों और चुनाव आयोग की पारदर्शिता पर विपक्ष ने न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है। इन आरोपों की सत्यता का निर्णय न्यायालय को करना है। लेकिन लोकतंत्र की बुनियाद से जुड़े मामलों में शीघ्र और प्रभावी न्यायिक परीक्षण आवश्यक है।

मेरा सीधा सवाल मुख्य न्यायाधीश से!

माननीय मुख्य न्यायाधीश महोदय, न्यायपालिका की जवाबदेही, लंबित संवैधानिक विवादों और जनता के घटते विश्वास पर भी उतनी ही गंभीरता से विचार कीजिए। तथ्यपूर्ण, निर्भीक और लोकतांत्रिक आलोचना को दबाया भी नहीं जाना चाहिए।

न्यायपालिका संविधान की संरक्षक है, आलोचना से ऊपर कोई संस्था नहीं। न्यायालय का सम्मान आदेशों के भय से नहीं, न्याय की निष्पक्षता से पैदा होना चाहिए। मेरा आग्रह है कि न्यायपालिका अपनी संस्थागत जवाबदेही, पारदर्शिता और समयबद्ध न्याय की जिम्मेदारी को सर्वोच्च प्राथमिकता दे। लोकतंत्र में जनता अंतिम संप्रभु है। संविधान सर्वोपरि है। और न्यायपालिका की सबसे बड़ी शक्ति जनता का विश्वास है!

  • किशोर तिवारी, राजनीतिक विश्लेषक एवं किसान नेता

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