विदर्भ की साहित्यिक अस्मिता के प्रतीक विदर्भ साहित्य संघ में आजकल क्या चल रहा है? पहला जवाब है मनमानी। दूसरा जवाब है हम करें सो कानून। तीसरा जवाब है संघ के संविधान और नियमावली का खुला उल्लंघन। चौथा जवाब है केंद्रीय मंत्री नितीन गडकरी के नाम पर रसीदें फाड़ना। पाँचवाँ जवाब है कि संघ के सदस्यों को छोड़िए, कार्यकारिणी के सदस्यों का ही एक-दूसरे पर अविश्वास। संघ के पदाधिकारियों द्वारा सोशल मीडिया पर शुरू हुआ जातिवाद। और कितना गिनाएं?
इन सब पर संघ के सभी लोगों की चुप्पी है। राजा भोज से लेकर गंगू तेली तक… किसी ने मुँह में दही जमा लिया है। किसी को सुनाई ही नहीं देता, कुछ को कुछ दिखता ही नहीं, कई लोगों की तो आवाज़ ही नहीं है। सब गांधी के तीन बंदर बने हुए हैं। कुछ एकदम बेलगाम हैं। टांगा पलटी, घोड़े फरार वाली स्थिति को समझना हो तो विदर्भ साहित्य संघ का अध्ययन कीजिए।
विदर्भ के साहित्य क्षेत्र में पिछले तीन-साढ़े तीन दशकों से सबसे बड़ा मुद्दा है विदर्भ साहित्य संघ का अधूरा साहित्य संकुल। यह इमारत अधूरी है। इमारत को फायर NOC नहीं मिली है। साहित्य संकुल की तीसरी मंजिल पर पार्किंग में दोपहिया-चारपहिया ले जाने के लिए न गाड़ियों के पंख हैं, न इमारत में रैम्प है। निर्माण के समय अतिरिक्त निर्माण हुआ। वास्तु विकासक ने जो सपने दिखाए थे, वैसा यहाँ कुछ भी नहीं हुआ, ऐसी लगातार शिकायत है। और भी बहुत कुछ है।
असल में इस विषय पर साहित्य संघ के आधिकारिक प्रवक्ताओं को बोलना चाहिए। या विकासक को सच बताना चाहिए। पर इनमें से कुछ भी नहीं हो रहा। फिर क्या हो रहा है? एक अंग्रेजी कहावत है, All roads lead to Rome, यानी सारे रास्ते रोम की ओर जाते हैं। मतलब, कोई भी मार्ग चुनो, अंतिम नतीजा एक ही होता है। विदर्भ साहित्य संघ में भी वही है। कुछ भी हो, उंगली मंत्री महोदय की तरफ उठा दी जाती है। जैसे All roads lead to Rome, वैसे ही वि.सा. संघ का नाम लो तो All roads lead to Gadkari ji। क्यों फाड़ते हो नितीन गडकरी के नाम की रसीद?
नितीन गडकरी यानी डंके की चोट पर हर काम को पूरे साज-सामान के साथ सफल करने वाला व्यक्तित्व। उनके व्यक्तित्व का पहला पहलू है सर्वसमावेशकता। वे बुला-बुलाकर विचार-विमर्श करते हैं, चर्चा करते हैं और निर्णय लेते हैं। उनका व्यवहार हजारों एकड़ और लाखों-करोड़ों रुपयों का है। विदर्भ साहित्य संघ की इस रत्ती भर जगह और दो-पाँच पैसे के आर्थिक व्यवहार में गडकरी की रुचि क्या होगी? होगी भी क्या? आपको क्या लगता है? पर नहीं, साहित्य संघ में यही चल रहा है। पावती सरेआम नामदार नितीन गडकरी के नाम पर फाड़ी जा रही है। और यही अंतिम सत्य है।
दरअसल, विदर्भ साहित्य संघ के चुनाव से ही नितीन गडकरी का नाम इस्तेमाल होना शुरू हुआ। यह किसने किया? क्यों किया? इसके पीछे के मकसद क्या थे? इसमें स्वार्थ किसका था? इन कई सवालों के जवाब हर कोई खुद खोजे। पर एक बात पक्की है कि नामदार गडकरी ने इस चुनाव से अपना संबंध नकार दिया था। उन्होंने सार्वजनिक बयान जारी किया था। उस बयान के बाद भी बहुत राजनीति खेली गई। पुल के नीचे से बहुत पानी बह गया।
आजकल वि.सा. संघ के दैनिक में छपने वाली खबरों में गडकरी का प्रत्यक्ष उल्लेख नहीं होता, बल्कि उंगली से इशारा होता है। पत्रकार लिखते हैं और छापते हैं कि ‘एक बड़े मंत्री के घर बैठक हुई… वगैरह वगैरह…’ अरे खोजी पत्रकारिता करते हो तो नाम लिखो ना?
संघ के चुनाव में गडकरी का नाम इस्तेमाल कर डॉक्टरों ने कमर कसी। शिष्य के नाम पर मास्टर ने बाजी मारी। विचार विश्वस्तों ने घर-घर जाकर कोरे मतपत्र इकट्ठे किए। एकमुश्त मतदान हुआ। अपने विचार के 8 लोगों को चुनवाने के लिए प्रगतिशील विचार के 14 लोगों का बोझ विचार परिवार ने उठाया। असल में यहीं खत्म हो जाना चाहिए था। पर नहीं… अभी तो पार्टी शुरू हुई है।
पार्टी का औचित्य बताना चाहिए, पर वह बताए बिना ही ‘मैं सही समय पर बताऊंगा’ कहकर संघ की इस पार्टी में पदाधिकारियों ने जातिवादी बयान शुरू कर दिए। संघ के संविधान को ताक पर रखकर 9 निमंत्रित सदस्यों की नियुक्ति कर दी गई। अध्ययन कक्ष की जरूरत वाले छात्रों की जरूरत छीनकर अध्ययन कक्ष हथियाने का निर्णय हुआ। कारण क्या, तो फायर NOC नहीं है। यह फायर NOC पहले कब थी? जरा बताइएगा? या अब एजेंडा ही अलग है, इसलिए यह बहाना मिल गया?
विदर्भ साहित्य संघ के नवनिर्वाचित सभी मुखिया समाज को विश्वास में लिए बिना, कोई बयान दिए बिना ऐसा तुगलकी निर्णय कैसे ले सकते हैं? ये निर्णय अखबारों से पता चलते हैं। संघ के अध्यक्ष कहते हैं कि समय आने पर मैं बोलूंगा। इसका मतलब क्या है? समाज में संदेश जा रहा है कि ये तुगलकी निर्णय नितीनजी गडकरी से पूछकर हो रहे हैं। सच क्या है? गडकरी चोरी-छिपे कुछ नहीं करते, उनका ऐसा अनुभव भी नहीं है। वे करते हैं डंके की चोट पर।
विदर्भ साहित्य संघ का भला-बुरा जो भी करना होगा तो नितीनजी होटल सेंटर पॉइंट में प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाएंगे, और घोषित करेंगे कि यह इमारत हम गिरा रहे हैं और 100 मंजिला इमारत बना रहे हैं… वगैरह वगैरह… चार दीवारों के अंदर मिमियाकर बोलने वाले गडकरी नहीं हैं, समझे?
अब इस पर विदर्भ साहित्य संघ की कार्यकारिणी को एकमत से बोलना चाहिए। आधिकारिक बयान देना चाहिए। जनता को विश्वास में लेना चाहिए। विदर्भ साहित्य संघ की इमारत गिरानी है तो गिराओ ना। बेचनी है तो बेचो ना। इमारत गिराकर उसी जगह शताब्दी महोत्सव इमारत बनानी है तो बनाओ ना। अगर ऐसा निर्णय होता है तो नागपुर-विदर्भ के साहित्यिक जगत के लिए यह गर्व की बात होगी, पर यह चोरी-छिपे क्यों? कुछ गोलमाल है क्या? या विदर्भ साहित्य संघ की पिछले 30-35 साल की प्राइवेट लिमिटेड कंपनी ने जो घोटाला किया है, उस पर पर्दा डालने के लिए यह सब चल रहा है, यह स्पष्ट होना चाहिए।
लोकनेता नितीन गडकरी का नाम लेकर, उनका नाम इस्तेमाल कर अगर कोई काले कारनामों को हमेशा के लिए जमीन में दफनाकर सफेद कपड़े पहनकर घूमने की कोशिश कर रहा है, तो यह लोकनेता को इस्तेमाल करने का, लोकनेता की छवि खराब करने का प्रयास है, ऐसी समाज की धारणा है। इस पर स्पष्टता आनी चाहिए। विदर्भ साहित्य संघ का साहित्य संकुल और यह इमारत आखिर सरस्वती मंदिर है या गैरकानूनी मकबरा, यह भी स्पष्ट होना चाहिए।
मौजूदा हालात में नितीन गडकरी का नाम इस्तेमाल कर भ्रम पैदा किया जा रहा है, गलत जानकारी दी जा रही है और सच दबाने की कोशिश हो रही है, ऐसी मेरे सहित समाज, साहित्यकारों, साहित्य प्रेमियों की धारणा है। इसकी सच्चाई सामने आनी चाहिए। विदर्भ साहित्य संघ के वर्तमान मुखियाओं को एक स्वर में साहित्य संघ, साहित्य संकुल, संघ की इमारत और पिछले 30-35 साल के व्यवहार के बारे में सच्चाई बतानी चाहिए। साथ ही साहित्य संघ के विकासक के नाते मित्रवर श्री आशुतोष शेवाळकर को भी इन सभी व्यवहारों पर स्पष्टता रखनी चाहिए।
आज जो चल रहा है वह ‘मैं मारने का नाटक करता हूँ, तू रोने का नाटक कर’ वाला खेल है। पत्रकार के नाते मैं जिम्मेदारी से लिख रहा हूँ, यह खेल इतना बचकाना नहीं है। साहित्य संघ की इमारत के बहाने जो कुछ हो चुका है, हो रहा है और आगे होगा, वह गंभीर है।
पत्रकार के नाते मेरी वर्तमान अध्यक्ष और कार्यकारिणी से विनती है कि इस प्रकरण पर श्वेत पत्र जारी किया जाना चाहिए। इस श्वेत पत्र के लिए नागरिकों को भी आग्रह करना चाहिए। इस विषय पर खुली चर्चा होनी चाहिए। सरस्वती के मंदिर में भ्रष्टाचार, अनियमितता, गैरकानूनी काम, मनमानी आदि राक्षसों को जगह नहीं है, यह स्पष्ट रूप से कहने और रुख अपनाने का समय है। स्वच्छ और स्पष्ट रुख रखने वाले वर्तमान अध्यक्ष से बड़ी उम्मीदें हैं। वे इन उम्मीदों को पूरा करें, ऐसी विनती है।
पत्रकार के नाते मैं आश्वस्त करना चाहता हूँ कि मैं तार्किक सवाल पूछूंगा, सबूत के बिना कुछ नहीं लिखूंगा। साथ ही मेरा नागरिकों से आह्वान है कि इस संबंध में कोई भी गोपनीय जानकारी आपके पास हो तो वह सबूत के साथ, अपने नाम-पते सहित मुझे भेजें। इस जानकारी की उचित जांच करके, आवश्यकता होने पर आपका नाम उजागर किए बिना, उसे सामने लाया जाएगा।
मैं फिर से स्पष्ट करना चाहता हूँ कि, सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं, मेरी कोशिश है कि यह सूरत बदलनी चाहिए… फिलहाल इतना ही…
32 साल से अधूरा ढांचा, आरोप-प्रत्यारोप के बीच नई कार्यकारिणी से पारदर्शिता की मांग
चार दशक बाद विदर्भ साहित्य संघ में लोकतांत्रिक व्यवस्था लौटी है। चार महीने पहले हुए चुनावों में नई कार्यकारिणी चुनकर आई और 2003 के बाद पहली बार खुली आमसभा भी हुई। इसके लिए अध्यक्ष गिरीश गांधी और नई टीम की सराहना की जानी चाहिए।
आमसभा में सबसे बड़ा फैसला यह हुआ कि विवादित सांस्कृतिक संकुल की जमीन सरकार को वापस की जाए और सरकार से नई जगह लेकर वहां नया संकुल बनाया जाए। मौजूदा हालात में यह व्यावहारिक विकल्प माना जा रहा है।
इसी बीच संघ के कुछ आजीवन सदस्यों – कर्नल अभय पटवर्धन, उल्हास केलकर, विकास लिमये, उदय पाटणकर, डॉ. उदय गुप्ते, प्रदीप मुंशी सहित अन्य – ने मुंबई हाईकोर्ट की नागपुर पीठ में जनहित याचिका दायर की है। इसकी अगली सुनवाई 21 अगस्त को है। इससे मामला फिर चर्चा में आ गया है।
नई कार्यकारिणी ने भी माना है कि संकुल निर्माण में भारी गड़बड़ी हुई। इसी मुद्दे को उठाने पर 2002 में छह आजीवन सदस्यों को निष्कासित किया गया था। अध्यक्ष गिरीश गांधी ने अब उन सभी का सदस्यत्व बहाल कर दिया है। इससे यह संकेत मिलता है कि गड़बड़ी हुई थी, इसे नेतृत्व भी स्वीकार करता है।
अगर गड़बड़ी मानी गई है तो यह भी सामने आना चाहिए कि इसके लिए जिम्मेदार कौन है। पत्रकारों द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार साहित्य संघ और विकासक के बीच हुए समझौतों पर तत्कालीन अध्यक्ष सुरेश द्वादशीवार, सचिव मनोहर म्हैसालकर, केशव जोशी, वामन तेलंग, श्रीपाद भालचंद्र जोशी, विलास मानेरकर आदि के हस्ताक्षर हैं। मूल नक्शे में भी कई अनावश्यक बदलाव किए गए। विकासक अब इन्हीं बदलावों के लिए अतिरिक्त 10 करोड़ रुपये मांग रहा है।
32 साल से संकुल अधूरा पड़ा है। हर कोई जिम्मेदारी दूसरे पर डाल रहा है। इसलिए लेखक ने मांग की है कि 1992 से 2026 तक क्या हुआ, इस पर श्वेतपत्र जारी किया जाए।
जनहित याचिका के जरिए अब मांग है कि राज्य सरकार इस पूरे प्रकरण की सेवानिवृत्त न्यायाधीश से उच्चस्तरीय जांच कराए। गलत समझौता करने और नक्शे के अनुसार काम न करने वालों की जिम्मेदारी तय कर कार्रवाई हो। तभी विदर्भ के साहित्यप्रेमियों के सामने सच्चाई आएगी।
1994 से पहले धनवटे रंगमंदिर विदर्भ की सांस्कृतिक पहचान था। वरिष्ठ साहित्यकार नारायण कुलकर्णी कवठेकर ने कहा भी है कि अब संघ का मॉल बन गया है। दोषियों को जनता के सामने लाना आज की जरूरत है।
नोट : यह लेखक का मत है। आप इससे सहमत हैं या नहीं, यह आप तय करें।
आरोग्यम धनसंपदा, असे सुभाषित असले, तरी प्रत्यक्षात आरोग्याकडे दुर्लक्ष हा बहुतांश जणांचा स्थायीभाव असतो. अनेकजण ‘काय होते’, म्हणून आपल्या आरोग्याकडे लक्ष देत नाहीत, तर पैशांअभावी योग्य उपचार मिळू न शकणाऱ्यांची संख्याही मोठी आहे. या पार्श्वभूमीवर मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस यांच्या वाढदिवसानिमित्त मुख्यमंत्री वैद्यकीय सहायता निधी व धर्मादाय रुग्णालय मदत कक्षातर्फे नागपूर येथे आयोजित करण्यात आलेले ‘महाआरोग्य शिबिर’ हे रुग्णांसाठी एक वरदान ठरले आहे.
श्री. देवेंद्र फडणवीस यांनी महाराष्ट्राचे मुख्यमंत्री म्हणून सूत्रे स्वीकारल्यानंतर ज्या क्षेत्रांमध्ये त्यांनी विशेष लक्ष देण्याचा संकल्प केला, त्यात आरोग्य क्षेत्र एक प्रमुख आहे. गरिबातल्या गरीब माणसाला आरोग्य सुविधा कशा सहज मिळू शकतील, यादृष्टीने त्यांनी केलेल्या प्रयत्नांना यश येऊ लागले आहे. त्यासाठी त्यांनी रुग्णालयांची संख्या वाढविली आणि अस्तित्वात असलेली रुग्णालये अत्याधुनिक केली. दुर्गम भागातील गरीब आदिवासी बांधव उपचारांसाठी मोठ्या शहरांपर्यंत पोहचू शकत नाहीत, म्हणून मग रुग्णालयेच त्यांच्या परिसरात उभारली. गडचिरोली जिल्ह्यातील अहेरीत अलीकडेच झालेले स्वतंत्र महिला रुग्णालय हे त्याचेच उत्तम उदाहरण आहे.
नागपूर शहरातील शासकीय वैद्यकीय महाविद्यालय व रुग्णालय (मेडिकल) आणि इंदिरा गांधी शासकीय वैद्यकीय महाविद्यालय व रुग्णालय (मेयो) यांचा कायापालट करून विदर्भच नव्हे तर शेजारील छत्तीसगड, मध्यप्रदेश, तेलंगणा, आंध्रप्रदेश येथील रुग्णांनाही अत्याधुनिक आरोग्य सुविधा मिळण्याची सोय मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस यांनी केली. या साऱ्या उपाययोजनांसोबतच आरोग्याच्या क्षेत्रात आणखी काय- काय करता येईल यादृष्टीने शासनाचे प्रयत्न सुरू आहेत.रविवार दिनांक २६ जुलै २०२६ रोजी नागपुरात झालेले महाआरोग्य शिबिर, हा त्या प्रयत्नांचाच एक भाग होता.
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस यांच्या वाढदिवसानिमित्त आयोजित या महाआरोग्य शिबिरामुळे आरोग्याच्या सर्व सुविधा एकाच छताखाली रुग्णांना मिळाल्या. त्याआधी मुख्यमंत्री श्री. फडणवीस यांच्या वाढदिवसानिमित्त ५ ते १५ जुलै या काळात मुख्यमंत्री सहायता निधी कक्षातर्फे नागपूर शहरात विविध ठिकाणी ६९ आरोग्य शिबिरे घेण्यात आली. यात ३१,७४० नागरिकांची आरोग्य तपासणी, ४४६३ नागिरकांची रक्त तपासणी व २६४१ नागरिकांचे ‘आभा- आयुष्यमान कार्ड’ तयार करण्यात आले.
या शिबिरांमध्ये जनरल मेडिसीन, बालरोग, स्त्री रोग, कान- नाक- घसा, नेत्ररोग, दंतरोग, शल्यचिकित्सा, अस्थिरोग, हृदयरोग तपासणी, ईसीजी, आभा कार्ड व आयुष्यमान भारत नोंदणी आदी सुविधा उपलब्ध करून देण्यात आल्या होत्या. या शिबिरांमध्ये ज्या रुग्णांना एक्सरे, सीटी स्कॅन, एमआरआय, अँजिओग्राफी, नेत्र, रक्त, मुत्र तपासणी इत्यादी चाचण्या व त्यानंतर आवश्यक उपचार, शस्त्रक्रिया शासकीय योजने अंतर्गत निःशुल्क करण्याची कार्यवाही करण्यात आली. त्यानंतर झालेल्या महाआरोग्य शिबिराचा लाभही २० ते २५ हजार रुग्णांनी घेतला. मात्र हे शिबिर केवळ एक दिवसाचे नाही. या शिबिरात ज्यांना गंभीर आजार आढळले, त्यांच्या तपासण्या आणि पुढील उपचारही निःशुल्क केले जाणार आहेत तसेच त्यांच्या औषधांचीही निःशुल्क व्यवस्था करण्यात आली आहे.
गंभीर आजारामुळे अनेकदा कर्जबाजारी होण्याची, कधी घरदार विकण्याची पाळी कित्येकांवर येते, मात्र ही वेळ कुणावरही येऊ नये यासाठी संवेदनशील मुख्यमंत्र्यांनी संकल्प केला आहे. त्यामुळेच नागपुरात झालेले हे महाआरोग्य शिबिर रुग्णांसाठी एक वरदान ठरले आहे.
ब्राह्मण जाति का माज’ और ‘ब्राह्मण जाति का माजोरड़ापन’ जैसे उल्लेख करके स्वनामधन्य साहित्यकार, ‘सूर्य गिळणारी मी’ इस आत्मकथा की लेखिका और कम से कम 3 दशकों से जिन्हें मैंने ‘ताई’ इस आदरार्थी संबोधन से स्नेहपूर्वक स्वीकारा, उन अरुणाताई सबाने द्वारा किए गए जातिसूचक लेखन को 7 दिन पूरे हो गए। इसी संदर्भ में मेरी यह (शायद) समारोपीय दीवार है।
मेरी मान्यता है कि डॉक्टर चूका तो एक मृत्यु होगी। शिक्षक चूका तो 4-2 विद्यार्थी अनुत्तीर्ण होंगे, परंतु समाज का प्रबोधन करने वाला साहित्यकार, लेखक, विचारक, पत्रकार, नेता आदि चूका तो समाज की, पर्याय से राष्ट्र की मृत्यु अवश्यंभावी है। साहित्यकार, लेखक, विचारक, पत्रकार की कलम और नेताओं का आचरण दोधारी तलवार जैसा है… इन लोगों के लेखन और नेतृत्व में समाज व राष्ट्र को गढ़ने वाली सकारात्मक क्षमता जितनी है, उतनी ही नकारात्मक-विध्वंसक मानसिकता को जन्म देने की हैवानियत भी है।
इसीलिए साहित्यकार, लेखक, विचारक, पत्रकार, नेता इस श्रेणी के लोगों को बहुत जिम्मेदारी से व्यवहार करना-लिखना-बोलना चाहिए… जातियों के बीच झगड़े लगाना, किसी विशेष जाति-समूह को टारगेट करना, यह बर्दाश्त नहीं किया जाएगा, यह समझदार नागरिकों को पहले अपने जाति-बांधवों को समझाना चाहिए, और मान लो फिर भी मुँह उचका या लिखा ही गया तो सुनने की भी तैयारी रखनी चाहिए… मैं जिम्मेदारी से रेखांकित करना चाहता हूँ कि किसी के लिए भी पुराने दिन बीत गए… अब समाज सजग है, सबको सब कुछ समझता है… प्रगतिशील-प्रतिगामी और सनातनी विचार रखने वाले सभी को यह बात ठीक से समझ लेनी चाहिए…
अब आज की इस दीवार का मूल मुद्दा…
‘ब्राह्मण जाति का माज’ और ‘ब्राह्मण जाति का माजोरड़ापन’ जैसे उल्लेख करके लेखन करने वाली इन अरुणाताई की कथित FB दीवार फिलहाल तो ‘अदृश्य’ है… कारण क्या? यह दीवार अदृश्य की गई? या हो गई? या यह दीवार अदृश्य करने के लिए किसी ने कोई उद्योग किए, या जुक्या भाऊ ने सस्पेंड की? कारण कुछ भी हो, मामला गंभीर है, इसका यही अर्थ है… जुक्या ने अकाउंट सस्पेंड किया होगा तो और भी गंभीर है, और ताई ने ही मार्गदर्शक की सलाह पर अदृश्य किया होगा, तो अपनी गलती कितनी गंभीर है, यह ताई को समझ आ गया होगा, इसका यही अर्थ है… सही है न अरुणाताई… ताई, खुलासा करेंगी क्या?
इस प्रकरण के कथित ब्राह्मण सुकुमार पहाड़ी, जो पूजा करने के लिए श्री दत्ता साहब के पास, ताई अध्यक्ष हैं उस सहनिवास में पहुँचा था, इन दोनों के भी सेल नंबर ताई ने मुझे व्हाट्सएप किए। इस सहयोग के लिए मैं आभारी हूँ। इन दोनों से भी मेरा इस क्षण तक, प्रयास करने के बावजूद, संपर्क नहीं हो सका है… परंतु, सुकुमार पहाड़ी के बारे में जो जानकारी मैं जुटा सका, उसके अनुसार, सुकुमार पहाड़ी का नाम, पहाड़ी ऐसा नहीं बल्कि ‘पाढी’ है। नागपुर के बंगाली परिवार में वे पूजा करने-बताने का काम करते हैं… उनके बारे में बंगाली परिवार कहता है कि वे किसी से भी ऊँची आवाज में नहीं बोलते, – चढे आवाज में बात नहीं करते… उनकी और दत्ता साहब की भेंट होने के बाद अधिक बोलना/लिखना उचित होगा। वह मैं करूँगा।
पार्किंग कोई भी हो, नियमों का पालन होना ही चाहिए, नियमबाह्य व्यवहार करने वाले पर कार्रवाई होनी ही चाहिए… यह जो कोई पहाड़ी, या पाढी है, वह अपवाद होने का कारण नहीं… पर इसलिए उसकी जाति का उल्लेख करके उसके जाति-बांधवों का अपमान कोई कैसे कर सकता है? यह अनुमति किसने दी?
अब महत्वपूर्ण… अरुणाताई सबाने, आप विदर्भ की 100 से अधिक वर्षों की समृद्ध परंपरा वाले विदर्भ साहित्य संघ की निर्वाचित कार्यकारिणी सदस्य हैं… आगे संघ के निर्वाचित अध्यक्ष के अधिकार से आप उपाध्यक्ष पद पर आरूढ़ हुईं… यह संघ धर्मदाय आयुक्त के पास पंजीकृत है… संघ को सरकारी अनुदान है, और कानून के दायरे में रहकर संघ को दान माँगने और स्वीकारने की छूट है… दान स्वीकृति शुरू है… यानी सब लोकाश्रय पर संघ का संसार चल रहा है… ऐसे संघ के निर्वाचित पदाधिकारियों के लिए सार्वजनिक जीवन में लिखते समय, बोलते समय, व्यक्त होते समय के कुछ Don’ts & Dos हैं क्या? होंगे, तो उनका पालन होता है क्या? और नहीं होंगे, तो कम से कम समाज में-समाज में, जाति-जाति में, विभिन्न धर्म-पंथ समुदायों के बीच सौहार्द भावना को ठेस न पहुँचे, फूट न पड़े, इसकी देखभाल करने की कम से कम नीतिमत्ता इन सुशिक्षित-उच्चशिक्षित ‘साहित्यिक-लेखक-कवि-पत्रकार’ आदि श्रेणी के स्वनामधन्यों को पालनी नहीं चाहिए क्या? वि. सा. संघ और उसके स्वनामधन्य इस प्रश्न का उत्तर देंगे क्या? वि. सा. संघ इसके लिए अब तो कुछ नीतिमत्ता के सर्वसाधारण संकेत अपने पदाधिकारियों के लिए प्रसूत करेगा क्या? या, ऐसा तर्क करेगा कि बोलते समय उपाध्यक्षा अरुणा सबाने ने संघ का मंच इस्तेमाल नहीं किया… वे विदर्भ साहित्य संघ के संकुल से नहीं बोलीं… इसलिए हम मूँग निगलकर चुप बैठेंगे…? ऐसा है, तो वैसा तो संघ ने जाहिर करना चाहिए…
मेरी FB दीवार पर सैकड़ों संवेदनशील नागरिकों ने अपना क्षोभ दर्ज किया… कुछ मान्यवरों ने ताई के कथानक के पक्ष में भी कौल दिया… इन सब मत-मतांतर का आदर है… यह मत-मतांतर व्यक्त करने का अधिकार वास्तव में विदर्भ साहित्य संघ के अध्यक्ष समेत 22 निर्वाचित सदस्यों को भी है… कोई व्यक्त हुआ हो, कम से कम मेरे पढ़ने या देखने में नहीं… जातिसूचक टिप्पणी अरुणाताई ने की… उसका विरोध ही करना चाहिए, ऐसा आग्रह नहीं, फिर कम से कम समर्थन तो करो… मूँग निगलकर चुप बैठना, इसका अर्थ क्या?
मुद्दा यह है कि ताई के इस जातिसूचक लेखन पर इन अध्यक्ष समेत निर्वाचितों की भूमिका क्या है? 100 वर्ष की सौहार्द परंपरा सँभालने वाले संघ के पदाधिकारियों को इस प्रकार की एक विशिष्ट जाति को अपमानित करने वाली वक्तव्य मान्य हैं क्या? या अमान्य हैं? इसके बारे में संघ अपनी भूमिका स्पष्ट करेगा क्या? अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर समाज में-जाति में-धर्म में कलह-विवाद आदि जन्म लेने की अनुमति दी जा सकती है क्या?
संघ की उपाध्यक्षा अरुणा ताई की दीवार पर की पोस्ट ने यही काम किया है… संघ में विविध अनियमितताएँ हैं, कानून की पायमाली तो सरेआम हुई है… इतनी कि एक-दूसरे को बचाने के प्रयास में संघ का पूरा मखौल बन गया… अर्थकारण तो इतना पराकाष्ठा का ढेपाळा, कि अध्यक्ष बनने का आनंद भी सम्यकवादी नव अध्यक्ष डॉ. गिरीश गांधी को उपभोग नहीं कर पाए, और झोली हाथ में लेकर दर-दर मदद के लिए पत्र भेजने पड़े हैं… यह इतना कम क्या कि संघ के 100 वर्षों में संघ के किसी भी पदाधिकारी ने कभी भी जातिसूचक अभिव्यक्ति व्यक्त करने का इतिहास नहीं, परंतु इस साल वह भी घटित हुआ… ब्राह्मण जाति-बांधवों को माजोरड़े वगैरह बोला गया… कहाँ और किस दिशा में हो रही है यह यात्रा? उपाध्यक्षा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का लाभ लेकर, जो चाहे वह लिखती हैं और बाकी सब हाथ की घड़ी मुँह पर उँगली रखते हैं, क्या यह संघ का ठराव है?
जाति-जाति में विवाद हो – संघर्ष भड़के, मन दुभंग हों ऐसा प्रयास हो रहा है, तब संघ में उसके विषय में कोई कैसे नहीं बोलता? इसका अर्थ ऐसा लेना क्या कि अध्यक्ष समेत संघ की कार्यकारिणी के 22 लोगो का भी समर्थन है? होगा तो, वैसा संघ ने स्पष्ट करना चाहिए कि जाति द्वेष से समाज भड़के तो भी हमें मान्य है, पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हमें अधिक महत्वपूर्ण है… इसके बारे में संघ की कार्यकारिणी के लोग अपनी भूमिका स्पष्ट करेंगे क्या?
वास्तव में संघ की इस कार्यकारिणी के सभी मेरे सहृदय हैं… संघ के अध्यक्ष डॉ. गिरीश भाऊ तो केंद्रीय मंत्री नितीन गडकरी के भी गुरु हैं… भाऊ का अधिकार इतना बड़ा कि सार्वजनिक रूप से वे गडकरी साहब का उल्लेख एकवचन में नितीन ऐसा करते हैं… भाऊ लोग जोड़ते हैं… पुरस्कार वितरण में वे अग्रसर हैं… उनके पुरस्कारों के कारण अनेक उनके ऋणी हैं… भाऊ की इसी गुणवत्ता के कारण संघ के चुनाव में भाऊ ने अध्यक्ष पद के लिए पहले नामांकन भरा, बाद में पैनल की मोट बाँधी, इतना ही नहीं, बल्कि विचार परिवार की व्यवस्था उन्होंने दावणी से बाँधी और डॉक्टरों को काम पर लगाया…
मुझे क्षमा करें… स्पष्ट लिख रहा हूँ… सच लिख रहा हूँ… विचार परिवार के सभी ने झाड़कर काम किए… सभी ने ही मतदाताओं से कोरे मतपत्रिका लिफाफे प्राप्त किए… एक गठ्ठा मतदान हुआ… भाऊ और भाऊ का पैनल निर्वाचित हुआ… इस विजय का आनंद इसलिए भी मनाया गया कि प्राइवेट लिमिटेड वाला संघ पब्लिक लिमिटेड हुआ… बहुत सी बातें भाऊ के ध्यान में आईं…
अब मेरा पूछना संघ के तमाम मतदाताओं से… तुम्हारी कोरी मतपत्रिकाओं के आधार पर इन लोगों ने चुनाव जीता… अब यह जो जातिवादी खेल उपाध्यक्षा कर रही हैं और सब मूँग निगलकर चुप बैठे हैं, इस प्रकार को आपकी मान्यता है क्या? यह जातिवादी खेल करने के लिए आपने निर्वाचित किया था क्या?
मुझे इस बात का दुःख अधिक है कि स्वतंत्रता-वीर सावरकर के विचारों का आदर करने वाले मेरे सगे मित्र विष्णु मनोहर, अमर कुलकर्णी और चंद्रकांत लाखे भी चुप हैं… वीर सावरकर ने जाति निर्मूलन के लिए जीवन बिताया… विष्णु भाऊ, आपकी भूमिका क्या? वीर सावरकर के गीत अंदमान में प्रस्तुत करके वाहवाही पाने वाले मित्रवर्य अमर कुलकर्णी आपकी भूमिका क्या? और चंदू भाऊ लाखे, आप तो वीर सावरकर के विचारों के अग्रदूत, आप क्या कहेंगे? प्रतिपक्ष के एकमेवाद्वितीय, ज्येष्ठ संपादक-पत्रकार श्रीपाद अपराजित की जिम्मेदारी इस परिस्थिति में बड़ी है। व्यक्तिगत रूप से जिन्हें मैंने पत्रकारिता में गुरु माना, वे ज्येष्ठ संपादक-पत्रकार बाळ कुळकर्णी उनसे अपराजित योद्धा की कारगुजारी अपेक्षित है… इन सब में गिरीशभाऊ और टीम के विजय के शिल्पकार और परिवार के रचनाकार रहे डॉक्टर की भूमिका क्या, यह भी स्पष्ट होना चाहिए… कि टांगा पलटी घोड़े फरार होने की स्थिति है? डॉक्टर, आप भी बोलेंगे क्या?
बुढ़िया मरने का दुःख नहीं, काल सोकावता है, यही सच है… जातिभेद निर्माण करने वाले और मूँग निगलकर चुप बैठने वाले दोनों की भी श्रेणी एक ही है, ऐसा मैं मानता हूँ… मेरा आह्वान है, वि. सा. संघ के मतदाता सदस्यों से, यह जो चल रहा है, क्या इसे आपकी सहमति है? आपकी मतदान पत्रिका के सामर्थ्य पर कोई जातिवादी भूमिका ले रहा हो, तो चुपचाप सहन करना है? अब भूमिका संघ के मतदाता सदस्यों को लेनी होगी… समाज को लेनी होगी… इन घटकों ने वह लेनी चाहिए…
अब सबसे बड़ी बात… इस प्रकरण में ब्राह्मण समाज को हेतुपूर्वक टारगेट किया गया… यह समाज न्यायोचित मार्ग से क्या करता है, यह उत्सुकता मुझे भी है… देखते हैं…
एक सजग पत्रकार के नाते मैंने सत्य और तथ्य रखा… यह जो घट रहा है वह मान्य हो, तो आपका हम सभी का मन से अभिनंदन ही करना चाहिए, अमान्य हो, तो परंतु जाब पूछा जाना चाहिए… यह जाब कैसे पूछना है, किन-किन से पूछना है यह विवेक जिसका उसका… एक बात नक्की रेखांकित करें, आज इस संस्था में निर्माण में अनियमितता-अपूर्णता है… कानून में घोले हैं… आर्थिक दिवालियापन की परिस्थिति स्वयं गिरीशभाऊ ने ही दान याचना करके मान्य की है, ऐसा बहुत कुछ कुछ होते हुए अब जातिवाद की भर इसमें पड़ेगी, यह निश्चित है…
मेरी इस दवंडी से अनेक को जाने-अनजाने कष्ट हुआ, इसके लिए मैं दिलगिरी व्यक्त करता हूँ… अरुणा ने सूर्य निगला और प्रभाकर का अस्त हुआ, विदर्भ साहित्य संघ का अस्त न हो, इसके लिए सदिच्छा व्यक्त करता हूँ, और (जरूरत के अनुसार फिर से उदयाचल पर रहूँगा, ऐसा लिखकर) रुकता हूँ…