किशोर तिवारी का आरोप – 35 साल में 46,000 करोड़ खर्च के बाद भी आदिवासी बच्चों को न खाट, न दवा; 15 दिन में फैसला नहीं हुआ तो ‘खाट मोर्चा’ की चेतावनी
नागपुर,12 अगस्त 2026 :
महाराष्ट्र में आदिवासी, दलित और भटके-विमुक्त समुदायों के लिए चल रही अनुदानित आश्रमशालाओं की दयनीय स्थिति को लेकर वरिष्ठ आदिवासी कार्यकर्ता किशोर तिवारी ने राज्य सरकार से सभी 2350 अनुदानित आश्रमशालाओं को तुरंत अपने नियंत्रण में लेने की मांग की है।
तिवारी ने मंगलवार को नागपुर में जारी बयान में कहा कि महाराष्ट्र को “पुरोगामी” कहा जाता है, लेकिन आज भी इन स्कूलों में बच्चों की मौतें सर्पदंश, ठंडे पानी से स्नान और कुपोषण के कारण हो रही हैं। उन्होंने इसे “संस्थागत हत्या” करार दिया।
गडचिरोली की ताजा घटना उन्होंने गडचिरोली जिले के धानोरा तालुके का उदाहरण देते हुए बताया कि हाल ही में तीन आदिवासी बालिकाओं की सर्पदंश से मौत हो गई। आरोप है कि छात्रावास में खाट नहीं थीं, इसलिए बच्चे जमीन पर सोते थे। इमारत की दीवारों में दरारें, खिड़कियों पर जाली नहीं और रात में लाइट भी नहीं थी। समय पर अस्पताल ले जाने के लिए वाहन और दवाएं उपलब्ध नहीं थीं। अमगांव महाल में भी 5 साल की बच्ची की इसी तरह मौत हुई थी।
46,000 करोड़ रुपये का सवाल तिवारी ने सरकारी आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि राज्य में कुल 2350 अनुदानित आश्रमशालाएं हैं। इनमें आदिवासी विकास विभाग की 556, अन्य पिछड़ा बहुजन कल्याण विभाग की 977 और सामाजिक न्याय विभाग की 322 शालाएं शामिल हैं। सरकार इन पर सालाना 1300 से 1500 करोड़ रुपये खर्च करती है। पिछले 35 वर्षों में कुल खर्च लगभग 46,000 करोड़ रुपये बैठता है।
उन्होंने आरोप लगाया कि इन शालाओं का संचालन अधिकांशत: विधायकों, सांसदों और राजनीतिक दलों से जुड़े ट्रस्टों के हाथ में है। प्रति शाला सालाना 2 से 3 करोड़ रुपये का अनुदान आता है, लेकिन बच्चों को बुनियादी सुविधाएं तक नहीं मिलतीं।
हाईकोर्ट ने 2017 में ही जताई थी चिंता बयान में 2017 में मुंबई उच्च न्यायालय की टिप्पणी का भी उल्लेख किया गया। न्यायमूर्ति आर. एम. सावंत और साधना जाधव की पीठ ने रवींद्र तळपे की जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान कहा था कि एक दशक में 793 बच्चों की मौत सर्पदंश, बुखार और फूड पॉइजनिंग से हुई। उस समय कहा गया था कि “बर्फ जैसे ठंडे पानी से नहलाकर बच्चों को मारा जा रहा है, यह बर्दाश्त नहीं होगा।” तिवारी के अनुसार 2026 तक यह आंकड़ा 1200 के पार पहुंच गया है। टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान TISS की रिपोर्ट में भी शालाओं की बदहाली का जिक्र है।
“अनुदान-स्थलांतर” का आरोप तिवारी ने कहा कि इन शालाओं में शिक्षक भर्ती योग्यता के आधार पर नहीं, बल्कि राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में की जाती है। उन्होंने यवतमाळ, बीड, नंदुरबार और नाशिक जिलों का नाम लेते हुए कहा कि जहां आदिवासी आबादी अधिक है, वहां नेताओं के नाम पर सबसे ज्यादा शालाएं हैं। उनका आरोप है कि अनुदान की फाइल अटकने पर नेता दल बदल लेते हैं। इसे उन्होंने “पक्षांतर नहीं, अनुदान-स्थलांतर” कहा।
4 प्रमुख मांगें तिवारी ने मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से 4 मांगें रखी हैं:
तत्काल राष्ट्रीयकरण:सभी 2350 अनुदानित आश्रमशालाओं को सरकार अपने अधीन ले और राजनीतिक ट्रस्टों को बाहर करे।
आपराधिक कार्रवाई: धानोरा में तीन बच्चियों की मौत के लिए जिम्मेदार संस्था संचालकों पर सदोष मनुष्यवध का मामला दर्ज हो।
बुनियादी सुविधाएं: हर बच्चे को खाट, गद्दा, स्वच्छ शौचालय, गर्म पानी, CCTV, महिला वार्डन और पूर्णकालिक डॉक्टर उपलब्ध कराए जाएं।
सीधा अनुदान: जब तक राष्ट्रीयकरण नहीं होता, अनुदान सीधे उस स्कूल प्रबंधन समिति को दिया जाए जिसमें 75% सदस्य अभिभावक हों।
15 दिन की चेतावनी उन्होंने चेतावनी दी कि यदि 15 दिनों के भीतर निर्णय नहीं लिया गया तो गडचिरोली से नागपुर तक “खाट मोर्चा” निकाला जाएगा। इस मोर्चे में मनोज जरांगे, अभिजीत दीपके, बच्चू कडू, आदिवासी युवा नेता अंकित नैताम और डॉ. कल्पना उपाध्याय सहित कई संगठनों को आमंत्रित किया गया है।
तिवारी ने कहा, “46,000 करोड़ रुपये खाने के बाद भी आप एक खाट नहीं दे सके। अब यह हत्या बंद होनी चाहिए।”
BCG फ्रेमवर्क पर आधारित रिपोर्ट में बताया – कम या ज्यादा डिफरेंशिएशन और उपलब्धता के आधार पर तय करें ADOPT, PARTNER, BUILD या BUY का रास्ता, छह सिग्नलों से परखें फैसला
नागपुर / नई दिल्ली, 26 अक्टूबर :
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की क्षमता को कंपनियां कैसे सुरक्षित करें, इसे लेकर एक नया स्ट्रैटेजिक मैप सामने आया है। रिपोर्ट का शीर्षक है – Differentiation and Availability Decide How to Secure AI Capabilities।
इसमें कहा गया है कि हर AI जरूरत को एक ही मैप पर प्लॉट करें और फिर छह सिग्नलों से उसके रास्ते को परखें।
फ्रेमवर्क में चार मॉडल बताए गए हैं –
01 ADOPT (लो डिफरेंशिएशन, वाइडली अवेलेबल) : तैयार टूल को सीधे अपनाएं, जैसे एम्प्लॉई को-पायलट या डॉक्यूमेंट हैंडलिंग। इसमें स्टैंडर्ड इंटीग्रेशन, कम संवेदनशीलता और सस्ती सर्विस होती है। मैसेज है – कमोडिटी को ओन करने से लागत बढ़ती है, फायदा नहीं।
02 PARTNER (लो डिफरेंशिएशन, लिमिटेड अवेलेबल) : एक्सेस लेकर साथ मिलकर टेलर करें, जैसे वेंडर को-डेवलपमेंट। पार्टनर की विशेषज्ञता मजबूत होती है और गवर्नेंस की जरूरत पूरी होती है। मैसेज – टेलर्ड एक्सेस ओन करने से बेहतर हो सकता है।
03 BUILD (हाई डिफरेंशिएशन, वाइडली अवेलेबल) : अपनी टीम और संसाधन से खुद बनाएं, जैसे प्रोपराइटरी डेटा पर फोरकास्टिंग या कंपनी-IP को-पायलट। इसमें टाइट इंटीग्रेशन से वैल्यू बनती है। मैसेज – कस्टम काम को अपनी कीमत वसूलनी चाहिए।
04 BUY (हाई डिफरेंशिएशन, लिमिटेड अवेलेबल) : दुर्लभ एसेट को ही खरीद लें, जैसे प्रोपराइटरी एक्सटर्नल डेटा या स्पेशलिस्ट टीम। जब एक ही टारगेट यूनिक परफॉर्म करे तो कंट्रोल IP और सिस्टम से जुड़ा होता है। मैसेज – ओन करने का फायदा किराए पर लेने से ज्यादा होना चाहिए।
रिपोर्ट में हर रास्ते को परखने के लिए छह सिग्नल – Differentiation, Integration, Urgency, Economics, Market और ऑप्शनालिटी बताए गए हैं।
अंत में लीडर रूल दिया गया है – सबसे हल्का कमिटमेंट चुनें जो फिर भी क्षमता को सुरक्षित करे। यहां BUY का मतलब एक्विजिशन है, सब्सक्रिप्शन नहीं।
मौदा तहसील में शांतिपूर्ण मतदान संपन्न, अरोली में 70.54%, खात में 76.70% वोटिंग
कोदामंडी – 26 October
विधान परिषद के पदवीधर मतदारसंघ के लिए हुए चुनाव की मतगणना कल मंगलवार 27 अक्टूबर को होंगी।
इससे पहले 23 अक्टूबर को हुए मतदान में मौदा तहसील में शांतिपूर्ण और सुचारू रूप से वोटिंग हुई। अरोली स्थित बूथ क्रमांक 43 पर 370 में से 261 मतदाताओं ने मतदान किया। अरोली में 70.54%, खात में 76.70%, मौदा के दो मतदान केंद्रों पर क्रमशः 78.98% और 72.37% मतदान दर्ज किया गया। मौदा तहसील में कुल 1910 पदवीधर मतदाता हैं।
तहसील में पदवीधर मतदाताओं के बढ़-चढ़कर मतदान करने से उम्मीदवारों के समर्थकों में उत्साह चरम पर है।
अरोली में महायुति के उम्मीदवार सुधाकर कोहळे के समर्थन में लगाए गए बूथ पर महायुति के कई नेताओं ने भेंट दी। इनमें राज्यमंत्री आशीष जयसवाल, पूर्व विधायक टेकचंद सावरकर, भाजपा तहसील मौदा मंडल अध्यक्ष भगवान बावनकुळे, चाचेर मंडल अध्यक्ष रवी चव्हाण, शिवसेना तालुकाध्यक्ष प्रशांत भुरे, मौदा नगरपंचायत नगराध्यक्ष प्रसन्ना (राजा) तिडके,भाजयुमो जिल्हा उपाध्यक्ष संजू वाघमारे, पंचायत समिति के पूर्व उपसभापति खेमराज चाफले,पंढरी कडू, अरोली सर्कल के भाजपा नेता सदानंद निमकर, विष्णू देशमुख, रोशन उमप, कैलास समरीत, कोदामेंढी उपसरपंच गोपाल गिरमेकर सहित महायुति के अनेक पदाधिकारियों का समावेश था।
डॉ. भांडे समिति की सिफारिश के बावजूद आरक्षण से वंचित होने का आरोप, 27 अक्टूबर से उपोषण और श्रृंखला उपोषण शुरू करने की घोषणा, विशेष जीआर निकालने की मांग
नागपुर, 26 अक्टूबर :
महाराष्ट्र के धोबी (परीट) समाज को आरक्षण संबंधी सुविधाएं देने की मांग को लेकर 27 अक्टूबर से नागपुर के संविधान चौक में उपोषण और साखळी उपोषण शुरू करने का ऐलान किया गया है। समाज की प्रमुख मांग है कि जब तक अनुसूचित जाति की सूची में समावेश नहीं होता, तब तक राज्य सरकार विशेष बाब के तौर पर SC को मिलने वाली सभी आरक्षण सुविधाएं धोबी समाज को भी दे।
मांग : राज्य शासन द्वारा गठित डॉ. भांडे समिति की सिफारिश क्रमांक 3 के अनुसार महाराष्ट्र में धोबी, परीट जाति का अनुसूचित जाति में समावेश नहीं होता, तब तक अनु. जाति को मिलने वाली सभी आरक्षण की सुविधाएं खास बाब के तौर पर राज्य शासन तुरंत जीआर निकालकर दे।
आंदोलनकारियों ने बताया कि महाराष्ट्र शासन ने 5 सितंबर 2001 को पूर्व मंत्री डॉ. डी.एम. भांडे की अध्यक्षता में अभ्यास समिति बनाई थी। समिति ने धोबी समाज की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक स्थिति का अध्ययन कर धोबी के साथ ही परीट, वरठी, रजक, वढ्ढी, मडवळ, मडलेवार और धोबा जैसी तत्सम जातियों को अनुसूचित जाति में शामिल करने की सिफारिश की थी। साथ ही समावेश होने तक विशेष तरतूद के तहत समान सुविधा देने की भी सिफारिश की थी।
समाज का दावा है कि महाराष्ट्र राज्य निर्माण से पहले भंडारा और बुलढाणा जिलों में धोबी समाज को SC की सुविधाएं मिलती थीं, जो 1 मई 1960 को राज्य बनने के बाद बंद कर दी गईं। समाज की सामाजिक स्थिति और पारंपरिक व्यवसाय में कोई मूलभूत बदलाव नहीं होने के बावजूद सुविधाएं बंद हुईं। 1976 में SC-ST के लिए क्षेत्रीय बंधन हटने के बाद भी धोबी समाज का मुद्दा लंबित रहा।
समाज ने मांग की है कि मराठा और धनगर समाज के लिए लागू समकक्ष सुविधाओं की तर्ज पर धोबी-परीट समाज के लिए भी स्वतंत्र शासन निर्णय (जीआर) निकाला जाए।
ऐतिहासिक दस्तावेजों और भांडे समिति की रिपोर्ट के आधार पर शासन तुरंत निर्णय ले, ताकि शिक्षा, रोजगार और सरकारी योजनाओं में समान अवसर मिल सके।
नेतृत्व : समिति प्रमुख आशिषभाऊ कदम, समिति अध्यक्ष डी.डी. सोनटक्के, कार्याध्यक्ष राजेंद्र खैरनार, सुधीर खैरनार, मुरलीधर शिंदे, संतोष सवतीरकर, राहुल वरणकर।