Connect with us

Article

“भोजन ही औषधि है, और रसोई ही दवाखाना”

Published

on

  • आज के युग का सबसे कड़वा और सबसे सच्चा सच।

पहले दादी-नानी की रसोई में ही हर बीमारी का इलाज मिल जाता था। सर्दी में हल्दी वाला दूध, पेट खराब हो तो हींग-अजवाइन, कमजोरी में च्यवनप्राश और घी। डॉक्टर के पास जाने की नौबत ही नहीं आती थी। आज वही रसोई गैस पर रखे पैकेट, फ्रिज में रखे रेडीमेड और डिलीवरी ऐप के ऑर्डर से भर गई है। और हमारा शरीर? वो सीधे मेडिकल स्टोर और हॉस्पिटल का चक्कर काट रहा है।

  1. कब बदला समीकरण?
    पहले हम खाना खाते थे ताकि जी सकें। आज जीते हैं ताकि खा सकें।
  • पहले: भोजन = ऊर्जा + इम्यूनिटी + इलाज
  • आज: भोजन = स्वाद + सुविधा + 10 मिनट डिलीवरी

चीनी, मैदा, प्रोसेस्ड तेल और प्रिजर्वेटिव ने हमारी थाली से ताकत छीन ली और उसकी जगह बीमारियाँ दे दीं। डायबिटीज, BP, मोटापा, थायराइड… ये सब “लाइफस्टाइल डिसीज” नहीं हैं। ये “लाइफस्टाइल फूड” की देन हैं।

  1. रसोई = सबसे बड़ी फार्मेसी
    आपकी रसोई में जो रखा है वो किसी भी मेडिकल स्टोर से ज्यादा ताकतवर है:
  • हल्दी: एंटीबायोटिक + एंटी-इंफ्लेमेटरी
  • अदरक-लहसुन: इम्यूनिटी बूस्टर
  • मेथी दाना: शुगर कंट्रोल
  • दालचीनी: कोलेस्ट्रॉल कम करे
  • घी: दिमाग और जोड़ों के लिए दवा
  • दही: प्रोबायोटिक, पेट की सबसे बड़ी दवा

समस्या ये नहीं कि हमारे पास दवा नहीं है। समस्या ये है कि हमने रसोई को फास्ट फूड कॉर्नर बना दिया और फार्मेसी को अपनी पहली पसंद।

  1. कड़वा सच ये है
    आज हम 500 रुपये का पिज्जा-बर्गर शान से ऑर्डर कर देते हैं, लेकिन 50 रुपये की हरी सब्जी “महंगी” लगती है।
    हम 2000 रुपये की दवाई हर महीने लेते हैं, पर 200 रुपये के बाजरा, ज्वार, दाल पर खर्च करने से बचते हैं।

हम बीमार पड़कर इलाज पर लाखों खर्च कर देते हैं, पर बीमार न पड़ें इसके लिए थाली ठीक नहीं करते।

  1. तो वापसी कैसे हो?
    क्रांति बड़े भाषणों से नहीं, छोटी थाली से शुरू होगी।
  • रंगीन थाली: जितने रंग प्लेट में, उतनी इम्यूनिटी शरीर में
  • घर का बना: हफ्ते में 5 दिन घर का खाना = आधी बीमारियां आउट
  • सीजनल खाओ: गर्मी में खरबूजा, सर्दी में तिल-गुड़। प्रकृति ने हर मौसम की दवा उसी मौसम में भेजी है
  • रसोई को वापस अपनाओ: 15 मिनट में बनने वाली खिचड़ी, दाल-चावल, सूप… यही असली “सुपरफूड” हैं

आखिरी बात
दवाइयां बीमारी को दबाती हैं। भोजन बीमारी की जड़ काटता है।

अगर आज से हम ये मान लें कि “जो प्लेट में जाएगा वही शरीर बनेगा” तो आधी हॉस्पिटल की लाइनें अपने आप खत्म हो जाएंगी।

किचन को वापस उसका सम्मान दो। वही आपकी सबसे बड़ी पॉलिसी है, सबसे सस्ता इंश्योरेंस है, और सबसे असरदार दवाखाना है।

क्योंकि सच में… Food is medicine 💊 and kitchen is pharmacy 🏥

5. विज्ञान भी यही कहता है – अब दुनिया मान रही है
पश्चिम में इसे “Nutritional Medicine” और “Food as Medicine” बोलते हैं। बड़े-बड़े हॉस्पिटल में अब डॉक्टर दवा के साथ “Diet Prescription” भी लिखते हैं।

  • कैंसर पेशेंट को कीमो के साथ हल्दी, अदरक, ग्रीन टी दी जाती है
  • डायबिटीज में मेटफॉर्मिन के साथ करेला-जामुन का रस
  • डिप्रेशन में एंटीडिप्रेसेंट के साथ अखरोट, डार्क चॉकलेट, केला

मतलब दुनिया 5000 साल बाद फिर उसी जगह आ गई जहाँ आयुर्वेद पहले से था।

6. वो 3 “छुपे हुए जहर” जो रसोई से निकालने हैं
ये 3 चीजें आपकी रसोई की फार्मेसी को बेकार कर देती हैं:

  1. रिफाइंड तेल: दिल की बीमारी का फैक्ट्री। इसकी जगह सरसों, मूंगफली, तिल, घी
  2. सफेद चीनी: इसे “सफेद जहर” यूं ही नहीं कहते। इम्यूनिटी का सबसे बड़ा दुश्मन
  3. मैदा: पेट में जाकर गोंद बन जाता है। पाचन खराब, वजन बढ़ा

इन 3 को हटाते ही आधी दवाइयों की जरूरत खत्म।

7. एक घर, दो कहानी
घर A: सुबह कॉर्नफ्लेक्स + पैकेट वाला जूस। दोपहर Zomato। रात पिज्जा।
रिजल्ट: 28 साल में शुगर, थकान, हर महीने डॉक्टर

घर B: सुबह भीगे बादाम + चना। दोपहर दाल-रोटी-सब्जी-दही। रात हल्का सूप/खिचड़ी।
रिजल्ट: 60 साल में भी बिना चश्मे, बिना दवा के फिट

फर्क सिर्फ थाली का है, जीन का नहीं।

8. सबसे खास बात – “भोजन का भाव”
पहले महिलाएं खाना बनाते समय मंत्र जपती थीं। गुस्से में खाना नहीं बनाती थीं।
आज हम गुस्से में, फोन देखते हुए, डिलीवरी बॉय को गाली देते हुए खाना ऑर्डर करते हैं।

आयुर्वेद कहता है: “जैसा अन्न, वैसा मन”
जिस भाव से खाना बनेगा, वही असर करेगा। रसोई में टीवी बंद, मोबाइल दूर, और प्यार के साथ बना खाना… यही सबसे बड़ी दवा है।

निचोड़ – धाँसू लाइनें याद रखो

  • डॉक्टर आपको बीमारी के बाद बचाता है। रसोई आपको बीमार होने से पहले बचाती है।
  • हॉस्पिटल का बिल कम करना है तो किराने का बिल बढ़ाना पड़ेगा।
  • सबसे महंगी दवा वो है जो आप रोज थाली में खाते हैं।

तो आज से प्रण:
“मेरी रसोई मेरी जिम्मेदारी। मेरा भोजन मेरी दवा।”

क्योंकि जब तक रसोई जिंदा है, तब तक घर में डॉक्टर की जरूरत नहीं।

Continue Reading
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Article

राज ठाकरे और संजय राउत के दिवास्वप्न – ‘कुछ महीनों में देश में प्रधानमंत्री ही नहीं होगा’ जैसा दावा कितना हास्यास्पद?

Published

on

  • स्पष्ट और बेबाक – संविधान में PM पद कभी खाली नहीं रह सकता, मोदी-विरोध में बेबुनियाद बयानबाजी और विदेशी शक्तियों की साजिश का विश्लेषण

महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना प्रमुख राज ठाकरे और शिवसेना (उबाठा) के स्वघोषित विश्व प्रवक्ता संजय राउत के दो बयान इन दिनों चर्चा में हैं। अलग-अलग लगने वाले इन बयानों का ध्वनित अर्थ एक ही है – मोदी-द्वेष से उपजी गैर-जिम्मेदार भविष्यवाणी।

राज ठाकरे का दावा –
एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में राज ठाकरे ने कहा कि अगले दो-तीन महीनों में देश में ऐसी स्थिति आएगी कि प्रधानमंत्री ही नहीं होगा। राज ठाकरे की राजनीति हमेशा ‘तळ्यात-मळ्यात’ वाली रही है। कभी वे खुद को शरद पवार के कुनबे में छोड़ देते हैं, कभी मोदी से नजदीकी दिखती है। वर्षों झगड़ने के बाद अब सगे चचेरे भाई से हाथ मिला रहे हैं, कभी कांग्रेस के साथ समझौता तो कभी अभिजीत दीपके को सिर पर बिठाकर नाचना। कुल मिलाकर स्थिर भूमिका के अभाव वाले नेता।

उन्होंने यह भविष्यवाणी किस आधार पर की? क्या संविधान पढ़ा? प्रथा-परंपरा देखी?

हमारे देश में संविधान के अनुसार प्रधानमंत्री का पद कभी रिक्त नहीं रखा जा सकता। यदि मुख्यमंत्री इस्तीफा दे दे या निधन हो जाए और नया मुख्यमंत्री न बन सके तो राष्ट्रपति शासन लग सकता है। महापौर, नगराध्यक्ष, जिला परिषद अध्यक्ष या सरपंच न हो तो प्रशासक नियुक्त हो सकता है। लेकिन प्रधानमंत्री न हो तो राष्ट्रपति शासन लगाकर राष्ट्रपति शासन चलाएंगे, ऐसी व्यवस्था ही नहीं है।

इसीलिए किसी कारण प्रधानमंत्री इस्तीफा भी दे दे तो नया प्रधानमंत्री आने तक उसे कार्यवाहक प्रधानमंत्री के रूप में काम करना ही पड़ता है। राष्ट्रपति वैसी सूचना देते हैं। यदि पद पर रहते प्रधानमंत्री का निधन हो जाए तो नए कार्यवाहक प्रधानमंत्री की शपथ होने तक आधिकारिक तौर पर निधन की घोषणा भी नहीं की जाती।

मेरी याद के अनुसार 1964 में पंडित नेहरू के निधन पर गुलजारीलाल नंदा को कार्यवाहक PM की शपथ दिलाने के बाद ही निधन की घोषणा हुई थी। यही लालबहादुर शास्त्री के निधन पर भी हुआ। इंदिरा गांधी की गोली मारकर हत्या सुबह करीब 10 बजे हुई थी, एम्स ले जाते-ले जाते उनका निधन हो गया था, लेकिन पश्चिम बंगाल से राजीव गांधी के दिल्ली लौटकर कार्यवाहक PM की शपथ लेने तक सिर्फ “गोली लगी, एम्स में भर्ती” यही खबर रेडियो-टीवी पर चलती रही।

1979 में चौधरी चरण सिंह ने संसद भंग की थी, फिर भी राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी ने उन्हें नई सरकार तक कार्यवाहक रहने को कहा। यही चंद्रशेखर (1991), इंद्रकुमार गुजराल (1997) और अटल बिहारी वाजपेयी (1999) के मामले में हुआ। इसलिए “देश में प्रधानमंत्री ही नहीं होगा” यह दावा हास्यास्पद है। मान लो अगले चार महीने में गड़बड़ी हुई और मोदी को इस्तीफा देना भी पड़ा, तब भी नए PM तक उन्हें ही कार्यवाहक रहना पड़ेगा। यह संवैधानिक प्रावधान है। राज ठाकरे मन में आए वैसा बोल देते हैं, अक्सर बिना आधार के।

संजय राउत का भाकित –
शिवसेना के दशहरा मेले में संजय राउत ने कहा कि अगले 3-4 महीने में देश में भारी गड़बड़ी होगी, नरेंद्र मोदी PM नहीं रहेंगे, सत्ता परिवर्तन होगा। अभिजीत दीपके के पहले आंदोलन के बाद से ही विपक्ष को सत्ता परिवर्तन के दिवास्वप्न दिखने लगे हैं।

वास्तव में मोदी और सहयोगी पिछले 12 साल से शासन चला रहे हैं, कई अच्छे काम किए हैं, इसलिए आम आदमी कहीं न कहीं उनके साथ दिखता है। 2024 में भाजपा को झटका लगा, 303 से 240 पर आ गई। तब विपक्ष सरकार बनाएगा क्या, भाजपा ने कुछ समय इंतजार किया, लेकिन विपक्ष की आपसी खींचतान देखकर कई छोटे दलों ने मोदी के नेतृत्व वाली सरकार के साथ ही रहने का फैसला किया। आज धीरे-धीरे भाजपा का समर्थन फिर बढ़ रहा है। कुछ दलों में टूट से सांसद भाजपा में आए हैं। अप्रैल 2026 में दो-तिहाई बहुमत के अभाव में खारिज हुआ महिला आरक्षण विधेयक अब फिर पारित कराने के लिए विशेष सत्र बुलाने की हलचल है।

विपक्ष किसी तरह मौजूदा सरकार को गिराना चाहता है। यह सिर्फ इच्छा नहीं, इसके पीछे विदेशी शक्तियों का साथ होने के पुख्ता सबूत मिलने की जानकारी है। पिछले 12 साल में मोदी नेतृत्व में देश की जो प्रगति हुई, वह बाहर के विकसित देशों को पच नहीं रही। इसलिए देश में अशांति फैलाकर सरकार गिराने के प्रयास हैं। अशांति फैलाने के लिए ही ऐसे आंदोलनों को स्पॉन्सर किया जाता है। नहीं तो विदेश में पढ़ाई छोड़कर अभिजीत दीपके को विशेष विमान से भारत लाना और आंदोलन का ढांचा खड़ा करने में मदद करना, इसका क्या अर्थ निकाला जाए? अभी मतदाता सूची पुनरीक्षण के मुद्दे पर भी आंदोलन भड़काया जा रहा है, पर उसमें आम आदमी कितना है, यह जांचना जरूरी है। आम आदमी को पहले रोजी-रोटी की चिंता है, वह ऐसे आंदोलन में कभी नहीं आएगा।

आज संजय राउत की बात को कोई गंभीरता से लेता है, ऐसा किसी को नहीं लगता। वे रोज सुबह मीडिया को बुलाकर अलग-अलग फोकनाड (शेखी) हांकते हैं। कुछ मराठी चैनलों को छोड़कर कोई गंभीरता से नहीं लेता। मराठी न्यूज चैनल पर उनका बोलना दिखता है तो आम आदमी टाइमपास के तौर पर देखता है। उनकी ज्यादातर कहानियां कपोल-कल्पित और सिर्फ मनोरंजक होती हैं, तथ्य कम।

आज विपक्ष ने कुछ आंदोलन खड़े करने की कोशिश जरूर की, हिंसा भड़काने के इरादे के संकेत भी मिले, लेकिन हिंसा अभी तक नहीं हुई और मोदी सरकार होने भी नहीं देगी, ऐसा आज का चित्र है। ऐसी स्थिति में अगले चार महीने में सरकार गिरने के क्या कारण होंगे, यह राउत को तथ्यों के साथ स्पष्ट करना चाहिए, हवाई बातों से नहीं। नहीं तो आम आदमी इसे “सुबह का भोंगा” समझकर अनदेखा कर देगा, जैसे मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस उन्हें “सुबह 9 बजे का भोंगा” कहते हैं।

कुल मिलाकर अगले कुछ महीनों में देश में अराजकता और सत्ता परिवर्तन होगा और कुछ महीने PM ही नहीं रहेगा, ऐसा चित्र आज तो नहीं दिखता। राज ठाकरे और संजय राउत को दिवास्वप्न आते हैं, यह मानसिक बीमारी भी हो सकती है। हो तो इलाज कराएं।

Continue Reading

Article

दीवारों के बीच खो गया ‘अतिथि देवो भव’ – अब फ्लैट हैं, दिल नहीं

Published

on

  • जहां ‘थिण्णई’ पर थके मुसाफिर को पानी मिलता था, वहां आज ‘स्टील का जार’ उड़ता है – प्रो. राजन की कलम से आधुनिक भारत के बदलते संस्कारों की मार्मिक दास्तान

भारत को समझना है तो एक शब्द को समझना होगा। वह शब्द है – आतिथ्य।

यह कभी सौदा नहीं था, यह धर्म था। यह अनुबंध था। एक अनजान राहगीर को देवता मान लेना, बिना बुलाए उसके लिए दो रोटी ज्यादा बना लेना, यही हमारा संस्कार था। इसी संस्कार ने हमें सिखाया था – अतिथि देवो भव।

मैं उस पीढ़ी का साक्षी हूं जिसने इस धर्म को जीते-जागते देखा है।

वो ‘थिण्णई’ क्या थी?

दक्षिण भारत के गांवों में घर सटे हुए होते थे। हर घर के आगे एक ऊंचा चबूतरा होता था, तमिल में उसे ‘थिण्णई’ कहते थे। वो ईंट-पत्थर नहीं था, वो एक विचार था, एक घोषणा थी।

कि आओ, थके हो तो बैठो। प्यासे हो तो पानी पियो। भूखे हो तो अन्न है। बिना किसी डर के सुस्ता लो और फिर अपनी राह पर निकल जाओ।

और इस विचार के पहरेदार कौन थे? हमारी मां, हमारी दादी। वे रोज थोड़ा सा भात ज्यादा पकाती थीं। इसलिए नहीं कि घर में कोई भूखा है, बल्कि इसलिए कि दोपहर में कोई अनजान भूखा आ गया तो? कोई न्योता नहीं, कोई अपेक्षा नहीं। पर चूल्हे पर आंच और मन में जगह, दोनों हमेशा तैयार। यही भारत था।

अब सब बदल गया है

आज वो ‘थिण्णई’ उजड़ गई है। उन घरों को तोड़कर कांच और कंक्रीट के फ्लैट खड़े हो गए हैं। ‘थिण्णई’ के साथ ही वो दिल भी ढह गया जो उसमें बसता था।

आज की बहुमंजिला इमारतों में सब कुछ है – सिक्योरिटी गेट है, सीसीटीवी है, इंटरकॉम है, पर पड़ोसी का नाम तक नहीं पता। हमारे पास मकान हैं, पर घर नहीं रहे।

मेरे जीवन की वो शाम – जब चाय नहीं, स्टील का जार आया

इस बदलाव को मैंने अपनी आंखों से देखा, अपने कानों से सुना।

एक दिन मैं स्कूटर से एक कॉलोनी से गुजर रहा था। मेरे पुराने छात्र वैभव ने मुझे देख लिया। दौड़कर गेट खोला, चरण स्पर्श किया और बोला – सर, चाय पीकर जाइए।

दिल भर आया। लगा, चलो गुरु-शिष्य परंपरा आज भी जिंदा है। ‘अतिथि देवो भव’ आज भी कहीं तो है।

मैं सम्मान के साथ ड्राइंग रूम में बैठ गया। वह अंदर पत्नी को मेरे आने की खबर देने गया। मैं अखबार पलट रहा था। तभी रसोई से बर्तन पटकने की जोरदार आवाज आई। मैंने सोचा, गलती से गिर गया होगा।

कुछ देर बाद वह लौटा। चेहरे की हंसी गायब थी। माथे पर पसीना था। आवाज कांप रही थी। वह कॉलेज के पुराने किस्से याद करने की कोशिश कर रहा था, पर शब्द लड़खड़ा रहे थे। फिर वह फिर से अंदर गया।

और इस बार धमाका हुआ। रसोई से एक स्टील का जार लुढ़कता-घिसटता सीधा मेरे पैरों के पास आकर गिरा।

उस एक पल में तीन लोग एक साथ जाग गए – मेरे अंदर का प्रोफेसर, मेरे अंदर का दार्शनिक और मेरे अंदर का आम आदमी। मैं समझ गया। अगर मैं एक मिनट और रुका, तो अगला बर्तन मुझ पर या मेरे उस मासूम छात्र पर निशाना साध कर फेंका जाएगा।

आतिथ्य का ‘थिण्णई’ से ‘आर्मगेडन’ तक का सफर वहीं पूरा हो गया।

मैंने हाथ जोड़े, गेट से बाहर निकला, स्कूटर को किक मारी और वहां से निकल गया। मैंने अपनी गरिमा और उसके वैवाहिक जीवन, दोनों को बचा लिया।

सवाल हम सबसे

मित्रों, यह किस्सा हंसी के लिए नहीं है। यह आत्ममंथन के लिए है।

हम होंठों से कहते हैं – आइए, आइए। पर हमारी रसोई कहती है – क्यों आए? हम जुबान से चाय पूछते हैं, पर हमारे बर्तन सच बोल देते हैं।

हमने दीवारें ऊंची कर लीं, दिल छोटे कर लिए। गेट लगा लिए, पर दिल के दरवाजे बंद कर लिए।

दुनिया की सबसे ऊंची इमारतें बना लेंगे, पर अगर दिल में ‘थिण्णई’ नहीं बनाई, तो हम दुनिया के सबसे गरीब, सबसे असंवेदनशील लोग कहलाएंगे।

आइए, एक ‘थिण्णई’ फिर से बनाते हैं – ईंट और सीमेंट से नहीं, अपने हृदय में। जहां आज भी एक अजनबी के लिए थोड़ा पानी, थोड़ा प्यार और थोड़ी जगह बची रहे।

  • प्रो. डॉ. एस. एम. राजन, शिक्षाविद एवं आतिथ्य-दर्शन के अध्येता

Continue Reading

Article

सुप्रीम कोर्ट पहले अपनी जवाबदेही तय करे, फिर संजय राउत से जवाब मांगे!

Published

on

  • न्यायपालिका की गरिमा नोटिस से नहीं, निष्पक्ष, पारदर्शी और समयबद्ध न्याय से बचती है

नागपुर,18 अक्टूबर 2026 :

भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने राज्यसभा सांसद संजय राउत से उनके आचरण पर स्पष्टीकरण मांगा है। सवाल यह नहीं कि न्यायपालिका की आलोचना की कोई सीमा होनी चाहिए या नहीं। सवाल यह है कि क्या न्यायपालिका स्वयं अपने पिछले दस वर्षों के विवादास्पद घटनाक्रमों पर जनता के सवालों का संतोषजनक जवाब देने को तैयार है?

1. शिवसेना की फूट पर चार वर्षों से न्याय की प्रतीक्षा क्यों?

जून 2022 में महाराष्ट्र की निर्वाचित सरकार गिर गई। शिवसेना टूटी, पार्टी का नाम और चुनाव चिह्न विवाद में चले गए। मई 2023 में संविधान पीठ का महत्वपूर्ण फैसला आया, लेकिन दल-बदल, विधायकों की अयोग्यता और पार्टी की पहचान से जुड़े विवाद आज भी न्यायिक प्रक्रिया में हैं। जब चुनाव निकल जाते हैं, सरकारें अपना कार्यकाल पूरा करने लगती हैं और संवैधानिक विवाद लंबित रहते हैं, तब विलंब से मिलने वाले न्याय का लोकतंत्र के लिए क्या अर्थ रह जाता है?

2. वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल की निराशा क्या सामान्य घटना है?

राज्यसभा सांसद और वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने भी बार-बार न्यायालय जाने के बावजूद अपेक्षित राहत न मिलने पर सार्वजनिक निराशा व्यक्त की। बाद में उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के सकारात्मक हस्तक्षेप की सराहना भी की। लेकिन देश के अनुभवी संवैधानिक अधिवक्ता को न्यायिक प्रक्रिया की प्रभावशीलता पर चिंता व्यक्त करनी पड़े, तो उस चिंता को गंभीरता से लेना आवश्यक है।

3. न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के आवास पर नकदी मिलने का मामला!

मार्च 2025 में एक न्यायाधीश के सरकारी आवास पर आग लगने के बाद नकदी मिलने का मामला सामने आया। लेकिन प्रश्न आज भी महत्वपूर्ण है – न्यायाधीशों के विरुद्ध गंभीर आरोपों की जांच और सामान्य नागरिक के विरुद्ध आपराधिक जांच के मानदंडों में अंतर क्यों दिखाई देता है?

4. पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई और राज्यसभा की सदस्यता!

पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई के विरुद्ध 2019 में यौन उत्पीड़न के आरोप लगे थे। इसके बाद 2020 में सरकार द्वारा उन्हें राज्यसभा के लिए मनोनीत किया जाना एक बड़े सार्वजनिक विवाद का विषय बना। क्या संवैधानिक पदों से सेवानिवृत्ति के तुरंत बाद राजनीतिक नियुक्तियां न्यायपालिका की स्वतंत्रता के प्रति जनता के विश्वास को प्रभावित नहीं करतीं?

5. प्रधानमंत्री न्यायाधीश के घर जाएं तो मर्यादा, विपक्ष सवाल पूछे तो आचरण पर स्पष्टीकरण?

11 सितंबर 2024 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश डी. वाई. चंद्रचूड़ के निवास पर गणेश पूजा में शामिल हुए। इसकी तस्वीरें सार्वजनिक हुईं।

धार्मिक पूजा करना अपराध नहीं है। लेकिन न्यायपालिका और कार्यपालिका के शीर्ष पदाधिकारियों की सार्वजनिक निकटता पर निष्पक्षता और संस्थागत मर्यादा के प्रश्न उठना स्वाभाविक है। यदि प्रधानमंत्री के साथ सार्वजनिक मुलाकात को सामान्य माना जाता है, तो विपक्षी जनप्रतिनिधियों द्वारा मुख्य न्यायाधीश से मिलने की इच्छा पर भी समान संवैधानिक संवेदनशीलता दिखाई जानी चाहिए।

6. चुनाव आयोग पर गंभीर सवालों का जवाब कौन देगा?

मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण, मतदाताओं के नाम हटाए जाने के आरोपों और चुनाव आयोग की पारदर्शिता पर विपक्ष ने न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है। इन आरोपों की सत्यता का निर्णय न्यायालय को करना है। लेकिन लोकतंत्र की बुनियाद से जुड़े मामलों में शीघ्र और प्रभावी न्यायिक परीक्षण आवश्यक है।

मेरा सीधा सवाल मुख्य न्यायाधीश से!

माननीय मुख्य न्यायाधीश महोदय, न्यायपालिका की जवाबदेही, लंबित संवैधानिक विवादों और जनता के घटते विश्वास पर भी उतनी ही गंभीरता से विचार कीजिए। तथ्यपूर्ण, निर्भीक और लोकतांत्रिक आलोचना को दबाया भी नहीं जाना चाहिए।

न्यायपालिका संविधान की संरक्षक है, आलोचना से ऊपर कोई संस्था नहीं। न्यायालय का सम्मान आदेशों के भय से नहीं, न्याय की निष्पक्षता से पैदा होना चाहिए। मेरा आग्रह है कि न्यायपालिका अपनी संस्थागत जवाबदेही, पारदर्शिता और समयबद्ध न्याय की जिम्मेदारी को सर्वोच्च प्राथमिकता दे। लोकतंत्र में जनता अंतिम संप्रभु है। संविधान सर्वोपरि है। और न्यायपालिका की सबसे बड़ी शक्ति जनता का विश्वास है!

  • किशोर तिवारी, राजनीतिक विश्लेषक एवं किसान नेता

Continue Reading
Advertisement

Nagpur, IN
08:51 am, 25 Oct 2026
weather icon 26 °C
Clear Sky
Wind Gust 5.6 Km/h

Trending