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ALUMNUS RETURNS AS ENTERPRISE GURU: INSIDE THE HIGH-STAKES DIALOGUE ON AI STRATEGY AND LEADERSHIP AT IIM CALCUTTA

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KOLKATA — The lush, historic campus of IIM Calcutta witnessed a remarkable convergence of cutting-edge technology and timeless corporate wisdom during the milestone weekend of July 4th, 2026. Marking a poetic moment in time—coinciding exactly with the historic 250th American Independence Day—the institution hosted a powerhouse session that was nothing short of a dream run for both its executive cohort and an accomplished alumnus returning to their roots. Invited as a guest speaker – Abhishek Damani, Founder and CEO of VarnueAI Business Solutions Private Limited by Professor Chetan Joshi, a prominent alumnus made a triumphant return to Joka, transitioning from the memory of a student seat to the prestige of the lecture podium. Addressing a packed theater of hyper-intelligent, high-achieving executives, the session on “AI – Live Business Cases” broke away from the traditional webinar format to deliver a masterclass on the raw realities of enterprise digital transformation.

The Pragmatic Pivot: Demystifying the Corporate AI Journey While the global discourse around Artificial Intelligence remains loud, the dialogue inside IIM Calcutta’s classrooms focused heavily on pragmatic truth. In close discussions with participants regarding their individual corporate AI journeys, the speaker highlighted a surprising reality: enterprise AI adoption remains unexpectedly low.

“The honeymoon phase with AI is over,” Abhishek noted during the session.

“The time has come for boards to stop treating AI as a tech experiment and start treating it as a core fiduciary strategy. Enterprises must sit down and map their AI initiatives directly to two levers: aggressively driving new revenue or systematically reducing costs. For leaders to authorize the next wave of adoption, the return on investment (ROI) must be flawlessly visible.

” The presentation successfully navigated the strategic shift shaking modern boardrooms—moving away from the prohibitive token and embedding costs of massive, unmanaged frontier cloud models like Claude, and steering instead toward localized, fine-tuned Small Language Models (SLMs) that preserve corporate data sovereignty and fiscal discipline.

Echoes from a Corporate Titan: The “CEO Mindset” The intellectual energy of the weekend reached its peak when the session intersected with the presence of industry stalwart Mr. Shiv Shivkumar, acclaimed author of The CEO Mindset. Boasting decades of unmatched leadership across global domains, Mr. Shivkumar delivered a profound roadmap on the Inspiration, Dilemmas, and Actions that govern elite executive decision-making. With thousands of MBA graduates entering the corporate workforce annually, the session codified how responsibilities fundamentally mutate at every tier of an organization: [x] Junior Managers must master the art of flawless Execution. [x] Middle Managers carry the burden of strategic Coordination and Coaching. [x] Senior Managers are tasked with navigating the sheer Complexity of the macro business. [x] C-Suite Leaders must transcend functional skills entirely to embody a transformative Mindset. “Stability is a liability in a world of agility.” — Mr. Shiv Shivkumar The Anatomy of High-Performance Leadership The joint insights from the weekend culminated in a deeply motivational playbook for the next generation of Indian business leaders. For the executives in attendance, the presentation outlined several non-negotiable principles for building what the speakers defined as “Superteams“: [x] Unfiltered Inspiration: True leaders do not filter who inspires them. Inspiration is democratic—it can stem from parents, teachers, athletes, or business icons alike. [x] The Discipline of Objectivity: Emotional biases must be ruthlessly stripped away from corporate decision-making. [x] The Superteam Matrix: Elite teams do not just work together; they actively protect and manage their collective time, energy, and attention. They operate on a simple rule: each member must make the other better through a commitment to constant improvement. [x] The Leadership Multiplier: Leadership is never neutral. It acts either as a multiplier that elevates the team’s capability or a subtractor that diminishes it. True champions understand that feedback is their breakfast, alignment with the institution is their anchor, and leadership itself is a conscious choice.

A Call to Corporate Character As the session drew to a close, the atmosphere in the room turned deeply reflective. The ultimate takeaway for the IIM Calcutta cohort was a return to foundational values. In an increasingly automated world, the ultimate competitive advantage remains deeply human. When hiring and building the enterprises of tomorrow, leaders must aggressively scout for three foundational pillars: Character, Collaboration, and the proven ability to Work in Teams. The final mandate delivered to the high-achievers at Joka was an uncompromised call to action, reminding every executive that despite shifting technologies, changing market dynamics, and organizational structures, one ultimate truth remains absolute in corporate life: Results matter. Be damn good at your job.

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राज ठाकरे और संजय राउत के दिवास्वप्न – ‘कुछ महीनों में देश में प्रधानमंत्री ही नहीं होगा’ जैसा दावा कितना हास्यास्पद?

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  • स्पष्ट और बेबाक – संविधान में PM पद कभी खाली नहीं रह सकता, मोदी-विरोध में बेबुनियाद बयानबाजी और विदेशी शक्तियों की साजिश का विश्लेषण

महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना प्रमुख राज ठाकरे और शिवसेना (उबाठा) के स्वघोषित विश्व प्रवक्ता संजय राउत के दो बयान इन दिनों चर्चा में हैं। अलग-अलग लगने वाले इन बयानों का ध्वनित अर्थ एक ही है – मोदी-द्वेष से उपजी गैर-जिम्मेदार भविष्यवाणी।

राज ठाकरे का दावा –
एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में राज ठाकरे ने कहा कि अगले दो-तीन महीनों में देश में ऐसी स्थिति आएगी कि प्रधानमंत्री ही नहीं होगा। राज ठाकरे की राजनीति हमेशा ‘तळ्यात-मळ्यात’ वाली रही है। कभी वे खुद को शरद पवार के कुनबे में छोड़ देते हैं, कभी मोदी से नजदीकी दिखती है। वर्षों झगड़ने के बाद अब सगे चचेरे भाई से हाथ मिला रहे हैं, कभी कांग्रेस के साथ समझौता तो कभी अभिजीत दीपके को सिर पर बिठाकर नाचना। कुल मिलाकर स्थिर भूमिका के अभाव वाले नेता।

उन्होंने यह भविष्यवाणी किस आधार पर की? क्या संविधान पढ़ा? प्रथा-परंपरा देखी?

हमारे देश में संविधान के अनुसार प्रधानमंत्री का पद कभी रिक्त नहीं रखा जा सकता। यदि मुख्यमंत्री इस्तीफा दे दे या निधन हो जाए और नया मुख्यमंत्री न बन सके तो राष्ट्रपति शासन लग सकता है। महापौर, नगराध्यक्ष, जिला परिषद अध्यक्ष या सरपंच न हो तो प्रशासक नियुक्त हो सकता है। लेकिन प्रधानमंत्री न हो तो राष्ट्रपति शासन लगाकर राष्ट्रपति शासन चलाएंगे, ऐसी व्यवस्था ही नहीं है।

इसीलिए किसी कारण प्रधानमंत्री इस्तीफा भी दे दे तो नया प्रधानमंत्री आने तक उसे कार्यवाहक प्रधानमंत्री के रूप में काम करना ही पड़ता है। राष्ट्रपति वैसी सूचना देते हैं। यदि पद पर रहते प्रधानमंत्री का निधन हो जाए तो नए कार्यवाहक प्रधानमंत्री की शपथ होने तक आधिकारिक तौर पर निधन की घोषणा भी नहीं की जाती।

मेरी याद के अनुसार 1964 में पंडित नेहरू के निधन पर गुलजारीलाल नंदा को कार्यवाहक PM की शपथ दिलाने के बाद ही निधन की घोषणा हुई थी। यही लालबहादुर शास्त्री के निधन पर भी हुआ। इंदिरा गांधी की गोली मारकर हत्या सुबह करीब 10 बजे हुई थी, एम्स ले जाते-ले जाते उनका निधन हो गया था, लेकिन पश्चिम बंगाल से राजीव गांधी के दिल्ली लौटकर कार्यवाहक PM की शपथ लेने तक सिर्फ “गोली लगी, एम्स में भर्ती” यही खबर रेडियो-टीवी पर चलती रही।

1979 में चौधरी चरण सिंह ने संसद भंग की थी, फिर भी राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी ने उन्हें नई सरकार तक कार्यवाहक रहने को कहा। यही चंद्रशेखर (1991), इंद्रकुमार गुजराल (1997) और अटल बिहारी वाजपेयी (1999) के मामले में हुआ। इसलिए “देश में प्रधानमंत्री ही नहीं होगा” यह दावा हास्यास्पद है। मान लो अगले चार महीने में गड़बड़ी हुई और मोदी को इस्तीफा देना भी पड़ा, तब भी नए PM तक उन्हें ही कार्यवाहक रहना पड़ेगा। यह संवैधानिक प्रावधान है। राज ठाकरे मन में आए वैसा बोल देते हैं, अक्सर बिना आधार के।

संजय राउत का भाकित –
शिवसेना के दशहरा मेले में संजय राउत ने कहा कि अगले 3-4 महीने में देश में भारी गड़बड़ी होगी, नरेंद्र मोदी PM नहीं रहेंगे, सत्ता परिवर्तन होगा। अभिजीत दीपके के पहले आंदोलन के बाद से ही विपक्ष को सत्ता परिवर्तन के दिवास्वप्न दिखने लगे हैं।

वास्तव में मोदी और सहयोगी पिछले 12 साल से शासन चला रहे हैं, कई अच्छे काम किए हैं, इसलिए आम आदमी कहीं न कहीं उनके साथ दिखता है। 2024 में भाजपा को झटका लगा, 303 से 240 पर आ गई। तब विपक्ष सरकार बनाएगा क्या, भाजपा ने कुछ समय इंतजार किया, लेकिन विपक्ष की आपसी खींचतान देखकर कई छोटे दलों ने मोदी के नेतृत्व वाली सरकार के साथ ही रहने का फैसला किया। आज धीरे-धीरे भाजपा का समर्थन फिर बढ़ रहा है। कुछ दलों में टूट से सांसद भाजपा में आए हैं। अप्रैल 2026 में दो-तिहाई बहुमत के अभाव में खारिज हुआ महिला आरक्षण विधेयक अब फिर पारित कराने के लिए विशेष सत्र बुलाने की हलचल है।

विपक्ष किसी तरह मौजूदा सरकार को गिराना चाहता है। यह सिर्फ इच्छा नहीं, इसके पीछे विदेशी शक्तियों का साथ होने के पुख्ता सबूत मिलने की जानकारी है। पिछले 12 साल में मोदी नेतृत्व में देश की जो प्रगति हुई, वह बाहर के विकसित देशों को पच नहीं रही। इसलिए देश में अशांति फैलाकर सरकार गिराने के प्रयास हैं। अशांति फैलाने के लिए ही ऐसे आंदोलनों को स्पॉन्सर किया जाता है। नहीं तो विदेश में पढ़ाई छोड़कर अभिजीत दीपके को विशेष विमान से भारत लाना और आंदोलन का ढांचा खड़ा करने में मदद करना, इसका क्या अर्थ निकाला जाए? अभी मतदाता सूची पुनरीक्षण के मुद्दे पर भी आंदोलन भड़काया जा रहा है, पर उसमें आम आदमी कितना है, यह जांचना जरूरी है। आम आदमी को पहले रोजी-रोटी की चिंता है, वह ऐसे आंदोलन में कभी नहीं आएगा।

आज संजय राउत की बात को कोई गंभीरता से लेता है, ऐसा किसी को नहीं लगता। वे रोज सुबह मीडिया को बुलाकर अलग-अलग फोकनाड (शेखी) हांकते हैं। कुछ मराठी चैनलों को छोड़कर कोई गंभीरता से नहीं लेता। मराठी न्यूज चैनल पर उनका बोलना दिखता है तो आम आदमी टाइमपास के तौर पर देखता है। उनकी ज्यादातर कहानियां कपोल-कल्पित और सिर्फ मनोरंजक होती हैं, तथ्य कम।

आज विपक्ष ने कुछ आंदोलन खड़े करने की कोशिश जरूर की, हिंसा भड़काने के इरादे के संकेत भी मिले, लेकिन हिंसा अभी तक नहीं हुई और मोदी सरकार होने भी नहीं देगी, ऐसा आज का चित्र है। ऐसी स्थिति में अगले चार महीने में सरकार गिरने के क्या कारण होंगे, यह राउत को तथ्यों के साथ स्पष्ट करना चाहिए, हवाई बातों से नहीं। नहीं तो आम आदमी इसे “सुबह का भोंगा” समझकर अनदेखा कर देगा, जैसे मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस उन्हें “सुबह 9 बजे का भोंगा” कहते हैं।

कुल मिलाकर अगले कुछ महीनों में देश में अराजकता और सत्ता परिवर्तन होगा और कुछ महीने PM ही नहीं रहेगा, ऐसा चित्र आज तो नहीं दिखता। राज ठाकरे और संजय राउत को दिवास्वप्न आते हैं, यह मानसिक बीमारी भी हो सकती है। हो तो इलाज कराएं।

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दीवारों के बीच खो गया ‘अतिथि देवो भव’ – अब फ्लैट हैं, दिल नहीं

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  • जहां ‘थिण्णई’ पर थके मुसाफिर को पानी मिलता था, वहां आज ‘स्टील का जार’ उड़ता है – प्रो. राजन की कलम से आधुनिक भारत के बदलते संस्कारों की मार्मिक दास्तान

भारत को समझना है तो एक शब्द को समझना होगा। वह शब्द है – आतिथ्य।

यह कभी सौदा नहीं था, यह धर्म था। यह अनुबंध था। एक अनजान राहगीर को देवता मान लेना, बिना बुलाए उसके लिए दो रोटी ज्यादा बना लेना, यही हमारा संस्कार था। इसी संस्कार ने हमें सिखाया था – अतिथि देवो भव।

मैं उस पीढ़ी का साक्षी हूं जिसने इस धर्म को जीते-जागते देखा है।

वो ‘थिण्णई’ क्या थी?

दक्षिण भारत के गांवों में घर सटे हुए होते थे। हर घर के आगे एक ऊंचा चबूतरा होता था, तमिल में उसे ‘थिण्णई’ कहते थे। वो ईंट-पत्थर नहीं था, वो एक विचार था, एक घोषणा थी।

कि आओ, थके हो तो बैठो। प्यासे हो तो पानी पियो। भूखे हो तो अन्न है। बिना किसी डर के सुस्ता लो और फिर अपनी राह पर निकल जाओ।

और इस विचार के पहरेदार कौन थे? हमारी मां, हमारी दादी। वे रोज थोड़ा सा भात ज्यादा पकाती थीं। इसलिए नहीं कि घर में कोई भूखा है, बल्कि इसलिए कि दोपहर में कोई अनजान भूखा आ गया तो? कोई न्योता नहीं, कोई अपेक्षा नहीं। पर चूल्हे पर आंच और मन में जगह, दोनों हमेशा तैयार। यही भारत था।

अब सब बदल गया है

आज वो ‘थिण्णई’ उजड़ गई है। उन घरों को तोड़कर कांच और कंक्रीट के फ्लैट खड़े हो गए हैं। ‘थिण्णई’ के साथ ही वो दिल भी ढह गया जो उसमें बसता था।

आज की बहुमंजिला इमारतों में सब कुछ है – सिक्योरिटी गेट है, सीसीटीवी है, इंटरकॉम है, पर पड़ोसी का नाम तक नहीं पता। हमारे पास मकान हैं, पर घर नहीं रहे।

मेरे जीवन की वो शाम – जब चाय नहीं, स्टील का जार आया

इस बदलाव को मैंने अपनी आंखों से देखा, अपने कानों से सुना।

एक दिन मैं स्कूटर से एक कॉलोनी से गुजर रहा था। मेरे पुराने छात्र वैभव ने मुझे देख लिया। दौड़कर गेट खोला, चरण स्पर्श किया और बोला – सर, चाय पीकर जाइए।

दिल भर आया। लगा, चलो गुरु-शिष्य परंपरा आज भी जिंदा है। ‘अतिथि देवो भव’ आज भी कहीं तो है।

मैं सम्मान के साथ ड्राइंग रूम में बैठ गया। वह अंदर पत्नी को मेरे आने की खबर देने गया। मैं अखबार पलट रहा था। तभी रसोई से बर्तन पटकने की जोरदार आवाज आई। मैंने सोचा, गलती से गिर गया होगा।

कुछ देर बाद वह लौटा। चेहरे की हंसी गायब थी। माथे पर पसीना था। आवाज कांप रही थी। वह कॉलेज के पुराने किस्से याद करने की कोशिश कर रहा था, पर शब्द लड़खड़ा रहे थे। फिर वह फिर से अंदर गया।

और इस बार धमाका हुआ। रसोई से एक स्टील का जार लुढ़कता-घिसटता सीधा मेरे पैरों के पास आकर गिरा।

उस एक पल में तीन लोग एक साथ जाग गए – मेरे अंदर का प्रोफेसर, मेरे अंदर का दार्शनिक और मेरे अंदर का आम आदमी। मैं समझ गया। अगर मैं एक मिनट और रुका, तो अगला बर्तन मुझ पर या मेरे उस मासूम छात्र पर निशाना साध कर फेंका जाएगा।

आतिथ्य का ‘थिण्णई’ से ‘आर्मगेडन’ तक का सफर वहीं पूरा हो गया।

मैंने हाथ जोड़े, गेट से बाहर निकला, स्कूटर को किक मारी और वहां से निकल गया। मैंने अपनी गरिमा और उसके वैवाहिक जीवन, दोनों को बचा लिया।

सवाल हम सबसे

मित्रों, यह किस्सा हंसी के लिए नहीं है। यह आत्ममंथन के लिए है।

हम होंठों से कहते हैं – आइए, आइए। पर हमारी रसोई कहती है – क्यों आए? हम जुबान से चाय पूछते हैं, पर हमारे बर्तन सच बोल देते हैं।

हमने दीवारें ऊंची कर लीं, दिल छोटे कर लिए। गेट लगा लिए, पर दिल के दरवाजे बंद कर लिए।

दुनिया की सबसे ऊंची इमारतें बना लेंगे, पर अगर दिल में ‘थिण्णई’ नहीं बनाई, तो हम दुनिया के सबसे गरीब, सबसे असंवेदनशील लोग कहलाएंगे।

आइए, एक ‘थिण्णई’ फिर से बनाते हैं – ईंट और सीमेंट से नहीं, अपने हृदय में। जहां आज भी एक अजनबी के लिए थोड़ा पानी, थोड़ा प्यार और थोड़ी जगह बची रहे।

  • प्रो. डॉ. एस. एम. राजन, शिक्षाविद एवं आतिथ्य-दर्शन के अध्येता

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सुप्रीम कोर्ट पहले अपनी जवाबदेही तय करे, फिर संजय राउत से जवाब मांगे!

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  • न्यायपालिका की गरिमा नोटिस से नहीं, निष्पक्ष, पारदर्शी और समयबद्ध न्याय से बचती है

नागपुर,18 अक्टूबर 2026 :

भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने राज्यसभा सांसद संजय राउत से उनके आचरण पर स्पष्टीकरण मांगा है। सवाल यह नहीं कि न्यायपालिका की आलोचना की कोई सीमा होनी चाहिए या नहीं। सवाल यह है कि क्या न्यायपालिका स्वयं अपने पिछले दस वर्षों के विवादास्पद घटनाक्रमों पर जनता के सवालों का संतोषजनक जवाब देने को तैयार है?

1. शिवसेना की फूट पर चार वर्षों से न्याय की प्रतीक्षा क्यों?

जून 2022 में महाराष्ट्र की निर्वाचित सरकार गिर गई। शिवसेना टूटी, पार्टी का नाम और चुनाव चिह्न विवाद में चले गए। मई 2023 में संविधान पीठ का महत्वपूर्ण फैसला आया, लेकिन दल-बदल, विधायकों की अयोग्यता और पार्टी की पहचान से जुड़े विवाद आज भी न्यायिक प्रक्रिया में हैं। जब चुनाव निकल जाते हैं, सरकारें अपना कार्यकाल पूरा करने लगती हैं और संवैधानिक विवाद लंबित रहते हैं, तब विलंब से मिलने वाले न्याय का लोकतंत्र के लिए क्या अर्थ रह जाता है?

2. वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल की निराशा क्या सामान्य घटना है?

राज्यसभा सांसद और वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने भी बार-बार न्यायालय जाने के बावजूद अपेक्षित राहत न मिलने पर सार्वजनिक निराशा व्यक्त की। बाद में उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के सकारात्मक हस्तक्षेप की सराहना भी की। लेकिन देश के अनुभवी संवैधानिक अधिवक्ता को न्यायिक प्रक्रिया की प्रभावशीलता पर चिंता व्यक्त करनी पड़े, तो उस चिंता को गंभीरता से लेना आवश्यक है।

3. न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के आवास पर नकदी मिलने का मामला!

मार्च 2025 में एक न्यायाधीश के सरकारी आवास पर आग लगने के बाद नकदी मिलने का मामला सामने आया। लेकिन प्रश्न आज भी महत्वपूर्ण है – न्यायाधीशों के विरुद्ध गंभीर आरोपों की जांच और सामान्य नागरिक के विरुद्ध आपराधिक जांच के मानदंडों में अंतर क्यों दिखाई देता है?

4. पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई और राज्यसभा की सदस्यता!

पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई के विरुद्ध 2019 में यौन उत्पीड़न के आरोप लगे थे। इसके बाद 2020 में सरकार द्वारा उन्हें राज्यसभा के लिए मनोनीत किया जाना एक बड़े सार्वजनिक विवाद का विषय बना। क्या संवैधानिक पदों से सेवानिवृत्ति के तुरंत बाद राजनीतिक नियुक्तियां न्यायपालिका की स्वतंत्रता के प्रति जनता के विश्वास को प्रभावित नहीं करतीं?

5. प्रधानमंत्री न्यायाधीश के घर जाएं तो मर्यादा, विपक्ष सवाल पूछे तो आचरण पर स्पष्टीकरण?

11 सितंबर 2024 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश डी. वाई. चंद्रचूड़ के निवास पर गणेश पूजा में शामिल हुए। इसकी तस्वीरें सार्वजनिक हुईं।

धार्मिक पूजा करना अपराध नहीं है। लेकिन न्यायपालिका और कार्यपालिका के शीर्ष पदाधिकारियों की सार्वजनिक निकटता पर निष्पक्षता और संस्थागत मर्यादा के प्रश्न उठना स्वाभाविक है। यदि प्रधानमंत्री के साथ सार्वजनिक मुलाकात को सामान्य माना जाता है, तो विपक्षी जनप्रतिनिधियों द्वारा मुख्य न्यायाधीश से मिलने की इच्छा पर भी समान संवैधानिक संवेदनशीलता दिखाई जानी चाहिए।

6. चुनाव आयोग पर गंभीर सवालों का जवाब कौन देगा?

मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण, मतदाताओं के नाम हटाए जाने के आरोपों और चुनाव आयोग की पारदर्शिता पर विपक्ष ने न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है। इन आरोपों की सत्यता का निर्णय न्यायालय को करना है। लेकिन लोकतंत्र की बुनियाद से जुड़े मामलों में शीघ्र और प्रभावी न्यायिक परीक्षण आवश्यक है।

मेरा सीधा सवाल मुख्य न्यायाधीश से!

माननीय मुख्य न्यायाधीश महोदय, न्यायपालिका की जवाबदेही, लंबित संवैधानिक विवादों और जनता के घटते विश्वास पर भी उतनी ही गंभीरता से विचार कीजिए। तथ्यपूर्ण, निर्भीक और लोकतांत्रिक आलोचना को दबाया भी नहीं जाना चाहिए।

न्यायपालिका संविधान की संरक्षक है, आलोचना से ऊपर कोई संस्था नहीं। न्यायालय का सम्मान आदेशों के भय से नहीं, न्याय की निष्पक्षता से पैदा होना चाहिए। मेरा आग्रह है कि न्यायपालिका अपनी संस्थागत जवाबदेही, पारदर्शिता और समयबद्ध न्याय की जिम्मेदारी को सर्वोच्च प्राथमिकता दे। लोकतंत्र में जनता अंतिम संप्रभु है। संविधान सर्वोपरि है। और न्यायपालिका की सबसे बड़ी शक्ति जनता का विश्वास है!

  • किशोर तिवारी, राजनीतिक विश्लेषक एवं किसान नेता

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