- 85% तेल आयात करने वाले भारत ने अमेरिका के 100% टैरिफ की धमकी को किया दरकिनार, सस्ते रूसी तेल से बचाया अरबों डॉलर, महंगाई पर लगाया अंकुश और दुनिया को दिखाया ‘राष्ट्र प्रथम’ का दम
ईंधन की राजनीति और भारत का स्वाभिमान – यह विषय केवल घरेलू अर्थव्यवस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सीधे वैश्विक भू-राजनीति और राष्ट्रीय संप्रभुता से जुड़ा है। ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर होना केवल आर्थिक जरूरत नहीं, बल्कि भारत के राष्ट्रीय स्वाभिमान और वैश्विक स्तर पर मजबूत छवि की नींव है।
ईंधन का अर्थशास्त्र केवल व्यापार तक सीमित नहीं, बल्कि यह किसी भी देश की राष्ट्रीय सुरक्षा और संप्रभुता से सीधा जुड़ा होता है। भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता देश है और अपनी जरूरत का 85 प्रतिशत से ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है। इसीलिए वैश्विक भू-राजनीति में होने वाली हर हलचल और दबाव का असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।
लेकिन हाल के वर्षों में भारत ने वैश्विक दबाव के आगे झुके बिना ‘राष्ट्र प्रथम’ की नीति अपनाकर दुनिया को करारा जवाब दिया है।
विश्व पटल पर ऐतिहासिक मोड़
वैश्विक राजनीति के मंच पर एक अभूतपूर्व और ऐतिहासिक घटना आकार ले रही है। अंतरराष्ट्रीय संबंधों के जटिल जाल में, ऊर्जा सुरक्षा और राष्ट्रीय हित को साधना किसी भी विकासशील देश के सामने सबसे बड़ी चुनौती होती है। एक तरफ अमेरिका जैसी महाशक्तियों का आर्थिक दबाव और दूसरी तरफ घरेलू अर्थव्यवस्था और आम जनता की जरूरत – इस दोहरी कसौटी में फंसे भारत ने पिछले कुछ वर्षों में अपनी विदेश नीति को अत्यंत कुशलता और स्वाभिमान के साथ चलाया है। विशेष रूप से रूस-यूक्रेन संघर्ष के बाद पैदा हुई वैश्विक अस्थिरता में भारत की परिपक्व राजनीतिक इच्छाशक्ति सराहनीय है।
अमेरिका के प्रतिबंधों और 100 प्रतिशत आयात शुल्क की धमकियों को दरकिनार कर भारत ने जो दृढ़ रुख अपनाया, वह केवल तात्कालिक आर्थिक लाभ का समझौता नहीं, बल्कि एक उभरती महाशक्ति की आत्मनिर्भर और स्वतंत्र वैचारिक मजबूती को दर्शाता है।
अमेरिका ने रूस के ऊर्जा क्षेत्र पर कड़े प्रतिबंध लगाने और रूस को आर्थिक रूप से घेरने के लिए रूसी तेल खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत तक आयात शुल्क लगाने का आक्रामक विधेयक लाया है। अमेरिकी संसद ने लगभग 4 दशकों के बाद अपनी कार्यपालिका को इतने बड़े और असीमित विशेषाधिकार दिए हैं। इस नए कानून में भारत और चीन जैसे देशों का सीधे नाम लिया गया है, ताकि उनके द्विपक्षीय व्यापार पर सीधा असर डालकर उन्हें रूस-विरोधी खेमे में खींचा जा सके।
परंतु, भारत के विदेश मंत्रालय ने अत्यंत स्पष्ट, दो-टूक और खरी-खरी भाषा में इस अमेरिकी रुख को खारिज कर दिया। 140 करोड़ भारतीयों की ऊर्जा सुरक्षा को अक्षुण्ण रखना और उन्हें सस्ती दरों पर ईंधन उपलब्ध कराना ही भारत सरकार का सर्वोच्च राष्ट्रीय कर्तव्य है, यह भारत ने दुनिया को ठोक कर कहा। इस फैसले के पीछे केवल राजनीतिक साहस नहीं, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले दूरगामी प्रभावों का गहरा और तार्किक चिंतन छिपा है।
इस साहसी फैसले का आर्थिक गणित
युद्ध शुरू होने के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम 100 से 120 डॉलर प्रति बैरल के पार चले गए थे। ऐसी विस्फोटक और अस्थिर स्थिति में रूस ने भारत को प्रति बैरल लगभग 20 से 30 डॉलर की छूट पर तेल देने का प्रस्ताव रखा। भारत ने अंतरराष्ट्रीय दबाव की परवाह किए बिना इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। इस एक ऐतिहासिक व्यापारिक समझौते से भारत ने अरबों रुपये की मूल्यवान विदेशी मुद्रा बचाई है।
यदि भारत ने अंतरराष्ट्रीय बाजार के बढ़े हुए दाम पर तेल खरीदा होता, तो देश में पेट्रोल और डीजल के दाम आसमान छूते। ईंधन के दाम बढ़ने से परिवहन लागत में भारी वृद्धि होती और आम आदमी के लिए अनाज से लेकर रोजमर्रा की हर जरूरी चीज असहनीय रूप से महंगी हो जाती। संक्षेप में कहें तो, रूसी तेल की इस छूट के कारण देश में महंगाई नियंत्रण में रही, रुपये का अवमूल्यन टला और भारतीय अर्थव्यवस्था को एक मजबूत सहारा मिला।
रिफाइनरी सेक्टर को हुआ बड़ा लाभ
भारत की इस नीति का एक बहुत बड़ा और रणनीतिक फायदा देश के रिफाइनरी क्षेत्र को हुआ। भारतीय सरकारी कंपनियों के साथ-साथ कई बड़ी निजी कंपनियों ने यह सस्ता रूसी कच्चा तेल बड़े पैमाने पर आयात किया। उस पर घरेलू रिफाइनरियों में प्रसंस्करण कर पेट्रोल, डीजल और विमान ईंधन तैयार किया गया। खास बात यह है कि यही प्रसंस्कृत ईंधन भारत ने यूरोप और अमेरिका समेत कई पश्चिमी देशों को अंतरराष्ट्रीय बाजार भाव पर निर्यात किया। जिन पश्चिमी देशों ने रूस पर प्रतिबंध लगाए थे, वही देश आज भारत से रूसी तेल से बने ईंधन को खरीद रहे हैं, यह इस वैश्विक राजनीति का सबसे बड़ा विरोधाभास है। इससे भारत के पेट्रोलियम उत्पादों का निर्यात कई गुना बढ़ा और विदेशी मुद्रा का प्रवाह बढ़ने से अर्थव्यवस्था को अभूतपूर्व मजबूती मिली।
ऊर्जा आपूर्ति के इस विविधीकरण से भारत की खाड़ी देशों पर ऐतिहासिक निर्भरता काफी कम हो गई है। पहले भारत को इराक, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों पर अधिकांश ईंधन के लिए निर्भर रहना पड़ता था। रूसी तेल के आने से भारत को एक नया, बड़ा और बेहद भरोसेमंद आपूर्तिकर्ता मिला है। इससे वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में अचानक पैदा होने वाले संकटों या खाड़ी देशों में राजनीतिक अस्थिरता से देश का बड़े पैमाने पर बचाव हुआ है।
सबसे महत्वपूर्ण और वैश्विक स्तर पर अहम मुद्दा यह है कि यदि भारत पश्चिमी देशों के दबाव में आकर रूसी तेल को ठुकरा देता और अपनी पूरी मांग फिर से खाड़ी देशों की ओर मोड़ देता, तो वैश्विक बाजार में तेल का भारी अभाव पैदा हो जाता। मांग बढ़ने और आपूर्ति सीमित रहने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम 150 डॉलर के भी पार चले जाते। इस तरह, भारत ने रूस से तेल खरीदकर केवल अपनी ही नहीं, बल्कि अप्रत्यक्ष रूप से पूरी वैश्विक बाजार की महंगाई को भी रोका है। भारत के इस एक फैसले ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को एक बड़ी मंदी से बचाया है, इसे नकारा नहीं जा सकता।
अमेरिका के आयात शुल्क की धमकियों से न डरकर भारत ने जो रुख अपनाया, वह स्वतंत्र और संप्रभु भारत की परिपक्व कूटनीति का सर्वोत्तम उदाहरण है। राष्ट्रीय हित से कोई समझौता किए बिना, ऊर्जा सुरक्षा और घरेलू आर्थिक स्थिरता बनाए रखने के लिए वैश्विक महाशक्तियों के सामने सीधे खड़े होने का यह भारत का कदम, नई वैश्विक व्यवस्था में भारत के बढ़ते और निर्णायक प्रभाव का प्रमाण है।
दीर्घकालीन समाधान की ओर भारत
ईंधन की वैश्विक राजनीति से स्थायी रूप से मुक्ति पाने और देश के स्वाभिमान को सही मायनों में ऊंचा करने के लिए भारत दीर्घकालीन उपायों पर काम कर रहा है।
पेट्रोल में इथेनॉल मिलाकर भारत अरबों रुपये की विदेशी मुद्रा बचा रहा है। इससे देश के किसानों को भी बड़ा लाभ हो रहा है। भविष्य की ऊर्जा के लिए भारत इलेक्ट्रिक वाहनों और ग्रीन हाइड्रोजन मिशन पर तेजी से काम कर रहा है, ताकि खनिज तेल पर निर्भरता को पूरी तरह खत्म किया जा सके।
ईंधन की राजनीति में भारत ने जो दृढ़ रुख दिखाया है, वह बताता है कि आज का भारत वैश्विक महाशक्तियों के दबाव में आए बिना अपने फैसले खुद लेने में सक्षम है। यही बदलाव भारत के बढ़ते वैश्विक प्रभाव और स्वाभिमान का प्रतीक है।