- 2 साल 6 महीने से जेल में बंद आरोपी अशोक यादव को नागपुर बेंच से राहत, जस्टिस नेरलिकर बोले – अनुच्छेद 21 के तहत तेज सुनवाई मौलिक अधिकार, सुप्रीम कोर्ट के 3 फैसलों का हवाला
नागपुर, 9 अक्टूबर 2026 :
संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत तेज सुनवाई के मौलिक अधिकार को दोहराते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट, नागपुर बेंच ने POCSO के एक मामले में ढाई साल से अधिक समय से हिरासत में बंद आरोपी को नियमित जमानत दे दी है।
जस्टिस एम. एम. नेरलिकर ने 8 अक्टूबर 2026 के आदेश में क्रिमिनल बेल एप्लिकेशन नंबर 1074/2026 को मंजूर किया। आरोपी अशोक रामकेश यादव को 16 मार्च 2024 को कामठी पुलिस स्टेशन, जिला नागपुर के अपराध क्रमांक 188/2024 में IPC की धारा 376(j)(l)(n), 506, 34 और POCSO एक्ट 2012 की धारा 4, 6, 8 व 12 के तहत गिरफ्तार किया गया था।
आरोपी की ओर से एडवोकेट एम. एन. अली ने पैरवी की, उनके साथ एडवोकेट उत्कर्ष एम. शेंडे थे। राज्य की ओर से APP पी.सी. बावनकुले और पीड़िता की ओर से नियुक्त वकील रोहिणी खापेकर ने जमानत का विरोध किया।
क्या थी FIR और क्या था तर्क?
FIR के अनुसार, शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि उसकी लगभग 15 साल की नाबालिग बेटी जब घर में अकेली होती थी, तो तीन व्यक्ति – राजू, मोईन और वर्तमान आवेदक, उसके घर आकर उसका यौन उत्पीड़न करते थे और किसी को न बताने की धमकी देते थे।
आरोपी के वकील ने ‘ट्रायल में देरी’ के आधार पर जमानत मांगी। दलील दी गई कि आरोपी 16/03/2024 से जेल में है। आरोप कितने भी गंभीर क्यों न हों, केवल इस आधार पर तेज सुनवाई के आधार पर जमानत से इनकार नहीं किया जा सकता। तेज सुनवाई आरोपी का मौलिक अधिकार है और अगर उसका उल्लंघन होता है तो वह जमानत का हकदार है। उन्होंने यह भी कहा कि पिछले ढाई साल में मुश्किल से तीन आवेदन ही दायर हुए हैं, इसलिए ट्रायल कोर्ट की यह टिप्पणी कि आरोपी बार-बार अर्जियां लगाकर ट्रायल लंबा कर रहा है, सिर्फ दिखावा है।
दूसरी ओर, सरकारी वकील और पीड़िता के वकील ने कहा कि पीड़िता मानसिक रूप से कमजोर 15 वर्षीय नाबालिग है। आरोप बेहद गंभीर हैं, चार्जशीट में 25 गवाह हैं और सरकार तेजी से ट्रायल चलाने को तैयार है।
कोर्ट ने क्या कहा?
कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट से स्टेटस रिपोर्ट मंगवाई, जिसमें सिर्फ इतना बताया गया था कि 24/08/2026 को आरोप तय (चार्ज फ्रेम) हुए हैं। चार्जशीट में 25 गवाह हैं, इसलिए ट्रायल कब खत्म होगा, इसका पता नहीं। आरोपी पहले ही लगभग 2 साल 6 महीने जेल में बिता चुका है।
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के तीन अहम फैसलों का हवाला दिया –
- जावेद गुलाम नबी शेख Vs महाराष्ट्र राज्य (2024) 9 SCC 813 – पैरा 17 में कहा गया है, “यदि राज्य या अभियोजन एजेंसी आरोपी के अनुच्छेद 21 के तहत तेज सुनवाई के मौलिक अधिकार को सुनिश्चित करने में असमर्थ है, तो उसे इस आधार पर जमानत का विरोध नहीं करना चाहिए कि अपराध गंभीर है। अनुच्छेद 21 अपराध की प्रकृति से परे लागू होता है।”
- शेख जावेद इकबाल Vs उत्तर प्रदेश राज्य (2024) 8 SCC 293
- अनूप सिंह Vs यूटी ऑफ जे एंड के (SLP Crl No.1398/2026) 03/02/2026 का आदेश – जिसमें 7 साल में केवल 7 गवाहों की गवाही और 82 सुनवाई में एक भी गवाही न होने पर कोर्ट ने चिंता जताई थी।
इन टिप्पणियों के आधार पर जस्टिस नेरलिकर ने कहा कि जब आरोपी ने जमानत का केस बना दिया है तो वह किस अपराध का आरोपी है, यह अप्रासंगिक हो जाता है। अनुच्छेद 21 के तहत अधिकार का महत्व बहुत बड़ा है।
जमानत की शर्तें –
(i) अर्जी मंजूर की जाती है।
(ii) आरोपी को 50,000 रुपये के PR बॉन्ड और दो जमानतीदारों पर रिहा किया जाए।
(iii) आरोपी कामठी / न्यू कामठी पुलिस स्टेशन की सीमा में नहीं रहेगा।
(iv) गवाहों को डराएगा-धमकाएगा नहीं और सबूतों से छेड़छाड़ नहीं करेगा।
(v) अपना आवासीय पता और मोबाइल नंबर पुलिस को देगा और बिना सूचना के निवास स्थान नहीं बदलेगा।
(vi) ट्रायल शुरू होने पर हर तारीख पर हाजिर रहेगा। एक भी तारीख पर गैरहाजिर रहा तो राज्य जमानत रद्द करने की मांग कर सकता है।
(vii-viii) कोर्ट की टिप्पणियां प्रथम दृष्टया हैं, ट्रायल कोर्ट इससे प्रभावित नहीं होगा।