- माया भ्रम नहीं, बल्कि सत्य को ढकने वाला परदा है; अविद्या से मुक्ति ही कैवल्य का मार्ग
भारतीय दर्शन में ‘माया’ एक अत्यंत महत्वपूर्ण अवधारणा है। इसे प्रकृति की रहस्यमय शक्ति माना जाता है जो सत्य को छुपाती है और भ्रम पैदा करती है। यह हमें वास्तविकता को समझने से रोकती है। इसे सृष्टि की अभिव्यक्ति की शक्ति भी कहा जाता है, जहाँ एक ही वास्तविकता अनेक रूपों में व्यक्त होती है।
श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय 7 में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि माया तीन गुणों से बनी है – सत्व या पवित्रता, रजस या कर्मशीलता और तमस या जड़ता। ये तीनों गुण प्रकृति के बदलते स्वरूप हैं।
महर्षि पतंजलि ने अपने योगसूत्र में पाँच क्लेशों या दुखों का वर्णन किया है – अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश। ये पाँच प्रकार के कष्ट हैं – अज्ञान, अहंकार, आसक्ति, घृणा और मृत्यु का भय। ये क्लेश मानव अनुभव को इस प्रकार प्रभावित करते हैं कि मनुष्य की आँखें विकृत रूपों को ही वास्तविकता समझ बैठती हैं।
माया कोई भ्रम नहीं है, बल्कि वह परदा है जो वास्तविकता को विभिन्न बदलते प्रारूपों में ढक लेता है। पतंजलि ने अविद्या शब्द का प्रयोग किया है। अविद्या का अर्थ है दुख का मूल कारण। इस अविद्या के कारण व्यक्ति वास्तविकता को उसकी भ्रमित अवस्था में देखता है। दूसरे शब्दों में, हम कह सकते हैं कि अविद्या ही मिथ्या पहचान है।
मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से यदि हम अपनी सामाजिक स्थिति को गहराई से समझें, तो हम पाते हैं कि बहुत ही रोचक समानताएँ हैं। हमारे विश्वास, अपेक्षाएँ और भावनात्मक अनुकूलन (कंडीशनिंग) हमारी देखने की क्षमता निर्धारित करते हैं। इस मानसिक अनुकूलन के कारण हम चीजों को जैसे वे हैं, वैसे नहीं देख पाते। हम उनमें अपना ही रंग भर देते हैं और उन्हें विकृत रूप में देखते हैं। संज्ञानात्मक पूर्वाग्रह और चयनात्मक ध्यान भी हमारी आँखों से वास्तविकता को छिपा देते हैं।
हम अक्सर अपनी पहचान अपने शरीर, विचारों, भावनाओं, उपलब्धियों, संपत्ति और सामाजिक स्थिति से जोड़ लेते हैं। लेकिन हमारे अस्तित्व की उचित समझ यह बताती है कि हमारा मूल अस्तित्व शुद्ध चेतना है।
तंत्रिका विज्ञान के अनुसार, मस्तिष्क संवेदी सूचनाओं, यादों और भविष्यवाणियों को एकीकृत करके दुनिया के बारे में हमारे अनुभवों का निर्माण करता है। यही कारण है कि एक ही बात पर अलग-अलग व्यक्तियों की राय अलग-अलग होती है। भावनात्मक प्रभाव और भय का बादल हमारी धारणाओं और निर्णयों पर छा जाता है। आत्म-संदर्भित सोच इस बात का एक और उदाहरण है कि हम वास्तविकता को कैसे विकृत करते हैं।
भारतीय दर्शन ने आत्म-अन्वेषण, मन को और वास्तविकता को देखने की विधि के रूप में निर्धारित की है।
ध्यान विचारों और भावनाओं को देखने में मदद करता है। गहरे मानसिक अनुकूलन को तोड़ने से वैराग्य या अनासक्ति कम होती है। अत्यधिक बाहरी परिस्थितियों पर निर्भरता कम होती है। स्वाध्याय आत्म-अध्ययन और चिंतन है। यह आत्म-जागरूकता की ओर ले जाता है। अभ्यास के परिणामस्वरूप वैराग्य और विवेक या विवेकशील शक्ति विकसित होती है। यह विवेकपूर्ण ज्ञान नित्य और अनित्य के बीच भेद करने में मदद करता है। विवेक साक्षी भाव या चीजों को जैसी हैं वैसी देखने की भावना का आधार है।
आधुनिक विज्ञान भी इस मत का है कि जो ठोस दिखता है वह वास्तव में ऊर्जा का कंपन है। वे केवल दिखने से कहीं अधिक हैं। माया को समझने का यह परिप्रेक्ष्य हमारी भावनात्मक नियमन, संबंधों और वास्तविकता को देखने की हमारी क्षमता को बेहतर बनाने में बहुत मदद करता है। साथ ही यह विखंडन से एकीकरण की ओर और व्यक्तिवाद से सामूहिकता की ओर भी ले जाएगा।