किसान नेता किशोर तिवारी ने कहा – घोषणाओं से नहीं, नीतियों में बदलाव से बचेगी किसानों की जान
यवतमाल,14 जुलाई 2026 :
विदर्भ के किसान नेता और विदर्भ जन आंदोलन समिति के अध्यक्ष किशोर तिवारी ने आज बताया कि पिछले 18 महीनों में यवतमाल जिले में 456 किसानों ने आत्महत्या की है। इसमें से 126 आत्महत्याएं अकेले वर्ष 2026 के पहले छह महीनों में हुई हैं। तिवारी ने कहा कि यह आंकड़ा सिर्फ संख्या नहीं है, बल्कि महाराष्ट्र में कृषि संकट के मानवीय आपदा में बदल जाने का प्रमाण है।
घोषणा के दिन ही 5 किसानों ने तोड़ा दम तिवारी ने बताया कि जिस दिन मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने नई कृषि ऋण माफी योजना की घोषणा की, उसी दिन यवतमाल के 5 किसानों ने आत्महत्या कर ली। मरने वालों में आलोदा के सुधाकर ठाकरे, निगानूर के रामराव गाव्हले, किनी के अरुण गावंडे, भाद उमरी के रमेश अलचेवार और भोजला के सुखदेव ठाकरे शामिल हैं।
तिवारी ने कहा कि सरकारी घोषणाओं और जमीन पर किसानों की वास्तविक स्थिति के बीच की खाई अब जानलेवा हो गई है। एक किसान की आत्महत्या से पूरा परिवार टूट जाता है। विधवा अकेली रह जाती है, बच्चों की पढ़ाई छूट जाती है, बूढ़े माता-पिता बेसहारा हो जाते हैं और परिवार कर्ज में और डूब जाता है।
आत्महत्या नहीं, नीतियों की विफलता तिवारी के अनुसार किसान की आत्महत्या व्यक्तिगत असफलता नहीं है। इसके पीछे बढ़ती खेती की लागत, अस्थिर बाजार, जलवायु परिवर्तन, संस्थागत ऋण की कमी और फसल बीमा की नाकामी जिम्मेदार है।
उन्होंने कृषि संकट के मुख्य कारण गिनाए:
महंगी खेती: बीज, खाद, कीटनाशक, डीजल, बिजली, मजदूरी और मशीनों की कीमत लगातार बढ़ रही है।
सही दाम नहीं: किसानों को लागत के आधार पर लाभकारी न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी नहीं मिल रहा।
ऋण और बीमा में देरी: समय पर सस्ता संस्थागत ऋण और फसल बीमा का मुआवजा नहीं मिलता।
प्राकृतिक आपदा: अनियमित बारिश, सूखा और मौसम की मार से बार-बार फसल खराब हो रही है।
भ्रष्टाचार और देरी: सरकारी योजनाओं में लापरवाही और भ्रष्टाचार के आरोप।
निवेश में असमानता: सरकारें मेट्रो, एक्सप्रेसवे और शहरों पर अरबों खर्च कर रही हैं, लेकिन सिंचाई, ग्रामीण स्वास्थ्य, शिक्षा और कृषि अनुसंधान के लिए पैसा नहीं है।
प्रधानमंत्री से गुहार तिवारी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से यवतमाल का दौरा कर किसानों को इस “नरसंहार” से बचाने की अपील की। उन्होंने कहा कि यह संकट अब सिर्फ महाराष्ट्र या विदर्भ का मुद्दा नहीं रहा। यह खाद्य सुरक्षा, ग्रामीण आजीविका, जलवायु और मानवाधिकार से जुड़ा राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संकट है। संयुक्त राष्ट्र, अंतरराष्ट्रीय मीडिया और मानवाधिकार संस्थाओं को इस पर ध्यान देना चाहिए।
तिवारी की 7 प्रमुख मांगें
हर पात्र किसान को सस्ता संस्थागत फसल ऋण उपलब्ध हो।
लागत पर आधारित लाभकारी एमएसपी को कानूनी गारंटी मिले।
बीज, खाद और कीटनाशकों की कीमतों पर सख्त नियंत्रण हो।
कृषि योजनाओं में भ्रष्टाचार की स्वतंत्र जांच हो।
फसल नुकसान का समय पर मुआवजा और आत्महत्या पीड़ित परिवारों का पुनर्वास हो।
हर जिले में किसानों की भागीदारी वाली ‘कृषि संकट निगरानी समिति’ बने।
ग्रामीण कर्ज और कृषि संकट खत्म करने के लिए दीर्घकालिक राष्ट्रीय कृषि सुधार नीति बने।
इतिहास क्या याद रखेगा किशोर तिवारी ने कहा, “इतिहास सरकारों को एक्सप्रेसवे और मेट्रो की संख्या से नहीं आंकेगा। वह इस बात से आंकेगा कि जिस किसान ने देश का पेट भरा, क्या सरकार ने उसकी जान और सम्मान बचाया। किसान की आत्महत्या सिर्फ एक मौत नहीं है, यह नीतियों पर नैतिक प्रश्नचिन्ह है। एक किसान का जाना मानवता का नुकसान है।”
तिवारी ने कहा कि आत्महत्याओं को अब अलग-अलग घटनाओं की तरह नहीं देखा जा सकता। यह दशकों की नीतिगत विफलताओं का परिणाम है और इसके लिए अस्थायी राहत नहीं, बल्कि जड़ से बदलाव चाहिए।
BCG फ्रेमवर्क पर आधारित रिपोर्ट में बताया – कम या ज्यादा डिफरेंशिएशन और उपलब्धता के आधार पर तय करें ADOPT, PARTNER, BUILD या BUY का रास्ता, छह सिग्नलों से परखें फैसला
नागपुर / नई दिल्ली, 26 अक्टूबर :
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की क्षमता को कंपनियां कैसे सुरक्षित करें, इसे लेकर एक नया स्ट्रैटेजिक मैप सामने आया है। रिपोर्ट का शीर्षक है – Differentiation and Availability Decide How to Secure AI Capabilities।
इसमें कहा गया है कि हर AI जरूरत को एक ही मैप पर प्लॉट करें और फिर छह सिग्नलों से उसके रास्ते को परखें।
फ्रेमवर्क में चार मॉडल बताए गए हैं –
01 ADOPT (लो डिफरेंशिएशन, वाइडली अवेलेबल) : तैयार टूल को सीधे अपनाएं, जैसे एम्प्लॉई को-पायलट या डॉक्यूमेंट हैंडलिंग। इसमें स्टैंडर्ड इंटीग्रेशन, कम संवेदनशीलता और सस्ती सर्विस होती है। मैसेज है – कमोडिटी को ओन करने से लागत बढ़ती है, फायदा नहीं।
02 PARTNER (लो डिफरेंशिएशन, लिमिटेड अवेलेबल) : एक्सेस लेकर साथ मिलकर टेलर करें, जैसे वेंडर को-डेवलपमेंट। पार्टनर की विशेषज्ञता मजबूत होती है और गवर्नेंस की जरूरत पूरी होती है। मैसेज – टेलर्ड एक्सेस ओन करने से बेहतर हो सकता है।
03 BUILD (हाई डिफरेंशिएशन, वाइडली अवेलेबल) : अपनी टीम और संसाधन से खुद बनाएं, जैसे प्रोपराइटरी डेटा पर फोरकास्टिंग या कंपनी-IP को-पायलट। इसमें टाइट इंटीग्रेशन से वैल्यू बनती है। मैसेज – कस्टम काम को अपनी कीमत वसूलनी चाहिए।
04 BUY (हाई डिफरेंशिएशन, लिमिटेड अवेलेबल) : दुर्लभ एसेट को ही खरीद लें, जैसे प्रोपराइटरी एक्सटर्नल डेटा या स्पेशलिस्ट टीम। जब एक ही टारगेट यूनिक परफॉर्म करे तो कंट्रोल IP और सिस्टम से जुड़ा होता है। मैसेज – ओन करने का फायदा किराए पर लेने से ज्यादा होना चाहिए।
रिपोर्ट में हर रास्ते को परखने के लिए छह सिग्नल – Differentiation, Integration, Urgency, Economics, Market और ऑप्शनालिटी बताए गए हैं।
अंत में लीडर रूल दिया गया है – सबसे हल्का कमिटमेंट चुनें जो फिर भी क्षमता को सुरक्षित करे। यहां BUY का मतलब एक्विजिशन है, सब्सक्रिप्शन नहीं।
मौदा तहसील में शांतिपूर्ण मतदान संपन्न, अरोली में 70.54%, खात में 76.70% वोटिंग
कोदामंडी – 26 October
विधान परिषद के पदवीधर मतदारसंघ के लिए हुए चुनाव की मतगणना कल मंगलवार 27 अक्टूबर को होंगी।
इससे पहले 23 अक्टूबर को हुए मतदान में मौदा तहसील में शांतिपूर्ण और सुचारू रूप से वोटिंग हुई। अरोली स्थित बूथ क्रमांक 43 पर 370 में से 261 मतदाताओं ने मतदान किया। अरोली में 70.54%, खात में 76.70%, मौदा के दो मतदान केंद्रों पर क्रमशः 78.98% और 72.37% मतदान दर्ज किया गया। मौदा तहसील में कुल 1910 पदवीधर मतदाता हैं।
तहसील में पदवीधर मतदाताओं के बढ़-चढ़कर मतदान करने से उम्मीदवारों के समर्थकों में उत्साह चरम पर है।
अरोली में महायुति के उम्मीदवार सुधाकर कोहळे के समर्थन में लगाए गए बूथ पर महायुति के कई नेताओं ने भेंट दी। इनमें राज्यमंत्री आशीष जयसवाल, पूर्व विधायक टेकचंद सावरकर, भाजपा तहसील मौदा मंडल अध्यक्ष भगवान बावनकुळे, चाचेर मंडल अध्यक्ष रवी चव्हाण, शिवसेना तालुकाध्यक्ष प्रशांत भुरे, मौदा नगरपंचायत नगराध्यक्ष प्रसन्ना (राजा) तिडके,भाजयुमो जिल्हा उपाध्यक्ष संजू वाघमारे, पंचायत समिति के पूर्व उपसभापति खेमराज चाफले,पंढरी कडू, अरोली सर्कल के भाजपा नेता सदानंद निमकर, विष्णू देशमुख, रोशन उमप, कैलास समरीत, कोदामेंढी उपसरपंच गोपाल गिरमेकर सहित महायुति के अनेक पदाधिकारियों का समावेश था।
डॉ. भांडे समिति की सिफारिश के बावजूद आरक्षण से वंचित होने का आरोप, 27 अक्टूबर से उपोषण और श्रृंखला उपोषण शुरू करने की घोषणा, विशेष जीआर निकालने की मांग
नागपुर, 26 अक्टूबर :
महाराष्ट्र के धोबी (परीट) समाज को आरक्षण संबंधी सुविधाएं देने की मांग को लेकर 27 अक्टूबर से नागपुर के संविधान चौक में उपोषण और साखळी उपोषण शुरू करने का ऐलान किया गया है। समाज की प्रमुख मांग है कि जब तक अनुसूचित जाति की सूची में समावेश नहीं होता, तब तक राज्य सरकार विशेष बाब के तौर पर SC को मिलने वाली सभी आरक्षण सुविधाएं धोबी समाज को भी दे।
मांग : राज्य शासन द्वारा गठित डॉ. भांडे समिति की सिफारिश क्रमांक 3 के अनुसार महाराष्ट्र में धोबी, परीट जाति का अनुसूचित जाति में समावेश नहीं होता, तब तक अनु. जाति को मिलने वाली सभी आरक्षण की सुविधाएं खास बाब के तौर पर राज्य शासन तुरंत जीआर निकालकर दे।
आंदोलनकारियों ने बताया कि महाराष्ट्र शासन ने 5 सितंबर 2001 को पूर्व मंत्री डॉ. डी.एम. भांडे की अध्यक्षता में अभ्यास समिति बनाई थी। समिति ने धोबी समाज की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक स्थिति का अध्ययन कर धोबी के साथ ही परीट, वरठी, रजक, वढ्ढी, मडवळ, मडलेवार और धोबा जैसी तत्सम जातियों को अनुसूचित जाति में शामिल करने की सिफारिश की थी। साथ ही समावेश होने तक विशेष तरतूद के तहत समान सुविधा देने की भी सिफारिश की थी।
समाज का दावा है कि महाराष्ट्र राज्य निर्माण से पहले भंडारा और बुलढाणा जिलों में धोबी समाज को SC की सुविधाएं मिलती थीं, जो 1 मई 1960 को राज्य बनने के बाद बंद कर दी गईं। समाज की सामाजिक स्थिति और पारंपरिक व्यवसाय में कोई मूलभूत बदलाव नहीं होने के बावजूद सुविधाएं बंद हुईं। 1976 में SC-ST के लिए क्षेत्रीय बंधन हटने के बाद भी धोबी समाज का मुद्दा लंबित रहा।
समाज ने मांग की है कि मराठा और धनगर समाज के लिए लागू समकक्ष सुविधाओं की तर्ज पर धोबी-परीट समाज के लिए भी स्वतंत्र शासन निर्णय (जीआर) निकाला जाए।
ऐतिहासिक दस्तावेजों और भांडे समिति की रिपोर्ट के आधार पर शासन तुरंत निर्णय ले, ताकि शिक्षा, रोजगार और सरकारी योजनाओं में समान अवसर मिल सके।
नेतृत्व : समिति प्रमुख आशिषभाऊ कदम, समिति अध्यक्ष डी.डी. सोनटक्के, कार्याध्यक्ष राजेंद्र खैरनार, सुधीर खैरनार, मुरलीधर शिंदे, संतोष सवतीरकर, राहुल वरणकर।