- लेखक निसर्गदत्त का सवाल – DJ बंद होने से हिंदुत्व की शान कैसे कम होगी? पारंपरिक ढोल-ताशा, शंखनाद से हो बाप्पा का स्वागत
नागपुर,02 सितंबर 2026:
क्षमा करें, मैं थोड़ा विलंब से व्यक्त हो रहा हूं… पर एक बात निर्विवाद है – गणपति वाजत-गाजत ही आना चाहिए, इस पर कोई वाद-विवाद नहीं। किसी का भी दोमत नहीं है। लेकिन बाप्पा किसी भी हालत में दणदणाट करते हुए, थयथयाट करते हुए, कान के पर्दे फाड़ने वाली आवाज के साथ आए, इस कृत्य का बहुमत से नहीं, एकमत से विरोध होना चाहिए।
DJ यानी DISC JOCKEY यानी ‘तबकड़ियां कौशल से संभालकर गाने बजाने वाला कलाकार’ – यही इसका अर्थ है। पर इस DJ का परिणाम भयंकर है। इसके दणदणाट से जान जाती है, जानें गई हैं, स्वास्थ्य की गंभीर समस्याएं पैदा हुई हैं।
पुणे से बुलंद हुई आवाज
पुणे में DJ के विरोध में आवाज एक बाप आदमी, विद्यानंद बापट ने बुलंद की। राज्यसभा में पुणे की सांसद मेधा कुलकर्णी ने DJ के खिलाफ अपनी भूमिका स्पष्ट की। मुख्यमंत्री के नाते देवेंद्र फडणवीस के नाम पर कई बयान घूम रहे हैं, पर वास्तविकता यह है कि मुख्यमंत्री ने DJ के विवाद को टालते हुए संपूर्ण पारंपारिक और सांस्कृतिक तरीके से उत्सव मनाने का आह्वान किया है।
फडणवीस के नागपुर के दाएं-बाएं हाथ और सामाजिक भान रखने वाले संवेदनशील सामाजिक कार्यकर्ता संदीप जोशी ने DJ के खिलाफ समाज की सक्रिय मदद से लड़ाई अदालत के जरिए लड़ने की तैयारी शुरू की है। मैसेज स्पष्ट है – DJ का ढणढणाट नहीं चाहिए। ध्वनि के मामले में कानूनी नियमों का पालन होना ही चाहिए।
क्या हिंदुत्व DJ में है ?
असली मुद्दा DJ के कर्ण-कर्कश, जानलेवा शोर का है। यह मुद्दा सीधे स्वास्थ्य और कानून के पालन से जुड़ा है। इस स्थिति में पुणे के कुछ स्वनामधन्य बरस पड़े कि गणेशोत्सव पर कोई पाबंदी बर्दाश्त नहीं करेंगे। हिंदुओं के त्योहार पर ही बुद्धिजीवियों को क्यों याद आती है? DJ पर कई लोगों का रोजगार टिका है… बुकिंग पहले से हो चुकी है… अगले साल देखेंगे… दस दिन का मामला है, सहन करो… यह ‘घाटे’बाज समर्थन एक राजनीतिक दल के नेता का है, तो ‘दंगे’कर समर्थन दूसरे दल के नेता का है।
पुणे में DJ के पक्ष में 250 गणेश मंडल हैं, तो विरोध में 200 मंडलों ने भूमिका जाहिर की है। मंडलों की भूमिका कुछ भी हो, जनता को फैसला करना चाहिए और उसे लागू होना चाहिए।
लोकमान्य तिलक ने सार्वजनिक गणेशोत्सव की परंपरा के पीछे अंग्रेजों के खिलाफ सामाजिक एकता और राष्ट्रीय आत्मभाव जागृत करने का हेतु रखा था। सार्वजनिक गणेशोत्सव में कोई कर्मकांड, उपासना नहीं होती, इसका स्वरूप पूरी तरह उत्सवी है। DJ बंद करने या आवाज कम करने से अगर हिंदुत्व या हिंदू त्योहारों की शान कम हो रही है, तो इस ‘घाटे’बाज और ‘दंगे’कर दलील को क्या कहा जाए ? और यह कौन कह रहा है ? राजनीतिक दलों के स्वघोषित महानुभाव ?
हिंदुत्व चोटी में नहीं है, जनेऊ में भी नहीं है, वैसे ही वह DJ में भी नहीं है। वह संदल में भी नहीं है।
विद्यानंद बापट ने DJ विरोधी भूमिका जाहिर करते ही वे ट्रोल हो गए। उन्हें ‘दिमागी नक्सल’ कहा गया, वामपंथियों की पंगत में बैठा दिया गया, प्रगतिशीलों के साथ उनके फोटो सोशल मीडिया पर चमके। पर बापट ने जो मुद्दा उठाया वह समर्थन योग्य, संविधान-सम्मत है, कानूनी है, जन-स्वास्थ्य से जुड़ा है, उसका क्या ?
DJ का पाप अब गांव-खेड़े तक
DJ नाम का यह पाप अब सिर्फ महानगरों में नहीं, तालुका और गांव-खेड़े तक पहुंच गया है। क्या यह पाप सिर्फ गणपति या दुर्गा उत्सव तक सीमित है? नहीं। अब DJ की धूम में सवारियां निकलती हैं, DJ के दणदणाट में चादर निकलती है, DJ की गूंज में सरेआम बैल उछलते हैं, नाग डोलते हैं, रंग उड़ाए जाते हैं और बहुत कुछ।
तो बाप्पा कैसे आएं ?
DJ नहीं चाहिए, बिल्कुल नहीं चाहिए। पर इससे गणपति उत्सव का उत्साह फीका होने का कोई कारण नहीं। गणपति बाप्पा वाजत-गाजत ही आना चाहिए। पारंपरिक वाद्यों की गूंज उठनी चाहिए। रणभेरी का तुमुल नाद होना चाहिए। झांझ बजनी चाहिए, शंखनाद होना चाहिए, ताल का गजर होना चाहिए, चिपलियां बजनी चाहिए, मृदंग बोलना चाहिए, ढोलकी ताल पकड़े, तबला-डग्गा बोले – वाह उस्ताद वाह, वेणु से सुर निकले। तालियों के नादमय घोष के साथ मुख से शब्द निकले – गणपति बाप्पा मोरया, मंगलमूर्ति मोरया।
हिंदू त्योहारों की पवित्रता बनी रहनी चाहिए। बाप्पा का आगमन गुलाल उड़ाकर होना चाहिए। आरती लाउडस्पीकर से नहीं, कंठ से होनी चाहिए। मंत्र-पुष्पांजलि कंठस्थ होनी चाहिए, गणपति अथर्वशीर्ष का पाठ आता होना चाहिए, ‘प्रणम्य शिरसा देवं’ कहते हुए संस्कृत उच्चारण सही होना चाहिए। इनमें से कितने ‘घाटे’बाजों को यह आता है? कितने ‘दंगे’बाजों को आता है? पुणेकर इनकी परीक्षा लें। प्रसाद के लिए नारियल फोड़ना आना चाहिए, मोदक की कली बनानी आनी चाहिए, उकड़ीचा मोदक बांधना आना चाहिए, इसके लिए उकड़ जमनी चाहिए। सबसे जरूरी, बुद्धि-विनायक की उपासना करते समय सिर में बुद्धि और मन में शुद्धि चाहिए।
एक बात पक्की है, DJ बजाने से अगर हिंदू त्योहारों पर पाबंदी आती है, तो ऐसे ‘घाटे’बाजों और ‘दंगे’करों का दिमाग ठिकाने पर लाने का समय आ गया है। बाकी राज करने वाले ‘बुना बुड़ा के लोटे’ की भूमिका जरूर निभाएं, उन्हें वह मुबारक। जनता सब जानती है, और अब पहचानने भी लगी है, यह तो पक्का है।