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क्या बार काउंसिल ऑफ इंडिया एक स्वायत्त संस्था है या सरकार की पीआर एजेंसी?

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  • बीसीआई अध्यक्ष के बयानों, प्रेस विज्ञप्तियों और आचार संहिता को लेकर उठे सवाल

इन दिनों देश की सर्वोच्च विधि नियामक संस्था बार काउंसिल ऑफ इंडिया की भूमिका और निष्पक्षता को लेकर सोशल मीडिया पर गहन चर्चा चल रही है। एक वीडियो श्रृंखला में यह प्रश्न बार-बार उठाया गया है कि “बार काउंसिल ऑफ इंडिया या सरकार की पीआर एजेंसी”।

1. हालिया विवाद का कारण
विवाद की शुरुआत तब हुई जब बार काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा के एक कथित बयान को लेकर खबरें सामने आईं कि एनएएलएसएआर के 2026 बैच के छात्रों को अधिवक्ता के रूप में नामांकित नहीं किया जाएगा। इसके साथ ही बीसीआई द्वारा जारी कुछ प्रेस विज्ञप्तियों को भी आलोचना का केंद्र बनाया गया है।

2. 2020 की प्रेस विज्ञप्ति पर सवाल
18 मार्च 2020 को जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में बीसीआई ने भारत के राष्ट्रपति द्वारा पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई को राज्यसभा सदस्य के रूप में मनोनीत किए जाने का स्वागत किया था। विज्ञप्ति में कहा गया था कि यह “विधायिका और न्यायपालिका के बीच एक सेतु“ साबित होगा।
इस पर सवाल उठाया गया कि जब सुप्रीम कोर्ट के कुछ पूर्व न्यायाधीशों और वकीलों ने इस मनोनयन की आलोचना की, तो बीसीआई ने उसे “अनुचित और जल्दबाजी में उठाया गया कदम“ बताते हुए उसकी निंदा की। आलोचकों का कहना है कि एक नियामक संस्था को इस प्रकार राजनीतिक रूप से संवेदनशील मुद्दों पर पक्ष लेते हुए नहीं दिखना चाहिए।

3. आचार संहिता और आलोचना पर रोक
वीडियो में अधिवक्ता अधिनियम 1961 की धारा 49(1) के अंतर्गत बनी आचार संहिता के एक हिस्से को भी दिखाया गया है। इसके अनुसार:

  • बीसीआई या राज्य बार काउंसिल के कोई भी सदस्य प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक या सोशल मीडिया पर बीसीआई के किसी प्रस्ताव या निर्णय के विरुद्ध बयान नहीं दे सकता।
  • बीसीआई या राज्य बार काउंसिल के किसी निर्णय की सार्वजनिक रूप से आलोचना नहीं की जा सकती।
  • कोई भी अधिवक्ता बीसीआई की गरिमा या प्राधिकार को कमजोर नहीं कर सकता।

इस नियम का हवाला देते हुए कहा जा रहा है कि क्या इस आचार संहिता का उपयोग असहमति की आवाज को दबाने के लिए किया जा रहा है।

4. छात्र आंदोलन और “राष्ट्र-विरोधी ताकतें” वाला बयान
एक अन्य पोस्टर में दिखाया गया है कि बीसीआई ने छात्र विरोध प्रदर्शनों को लेकर अपील जारी की थी जिसमें कहा गया था कि “राष्ट्र-विरोधी ताकतों ने छात्र आंदोलनों को हाईजैक कर लिया है“ और विधि बिरादरी से इसमें हस्तक्षेप करने का आग्रह किया गया था। इसके साथ सीए, एनआरसी और एनपीआर के खिलाफ हुए विरोध प्रदर्शनों की तस्वीरें भी साझा की गई हैं। आलोचकों का तर्क है कि बीसीआई को छात्रों के लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा करनी चाहिए, न कि उन्हें संदेह के घेरे में खड़ा करना चाहिए।

5. मूल प्रश्न: स्वायत्तता बनाम पक्षधरता
इन सभी घटनाओं को जोड़कर यह तर्क दिया जा रहा है कि जब एक नियामक संस्था अपने अध्यक्ष के माध्यम से बार-बार राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मुद्दों पर एकतरफा बयान जारी करती है, तो उसकी स्वायत्तता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।

वीडियो बनाने वाले व्यक्ति का मुख्य आरोप यही है कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया को वकीलों के हितों और विधि के शासन की रक्षा करनी चाहिए, न कि किसी सरकार या दल विशेष के प्रवक्ता की तरह कार्य करना चाहिए।

यह पूरा मामला विधि जगत में इस बहस को जन्म दे रहा है कि नियामक संस्थाओं को किस हद तक राजनीतिक मामलों पर टिप्पणी करनी चाहिए और अपनी तटस्थता को कैसे बनाए रखना चाहिए।

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जीवन से सीखी कूटनीति की कला

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  • सत्य को प्रिय बनाकर कहना ही सनातन धर्म है – डॉ. एस. एम. राजन का जीवन-दर्शन

नागपुर, 27 अक्टूबर :

किताबों से नहीं, जीवन के कड़वे, कठोर और सुंदर अनुभवों की यूनिवर्सिटी से मैंने कूटनीति का असली अर्थ सीखा है। यह दुनिया गुलाबों का बगीचा नहीं, बल्कि एक घना, अप्रत्याशित जंगल है। यहाँ अलग-अलग मानसिकता, विचारधारा, स्वभाव, महत्वाकांक्षा और परिपक्वता के लोग मिलते हैं। उनके बीच बिना टकराव, बिना दुश्मनी और बिना संघर्ष के चलना वास्तव में हिमालय जैसा कठिन कार्य है। ऐसी परिस्थिति में मैंने जाना कि कूटनीति पाखंड नहीं है। कूटनीति बुद्धिमत्ता है। कूटनीति गरिमा के साथ जीवित रहने की कला है।

इसी अनुभव से मैंने इस द्वेष और कटुता के युग में “कठोर से कठोर बात को भी सबसे मधुर तरीके से कहने की कला” सीखी है। और विनम्रता के साथ कह सकता हूँ कि मतभेदों को कम करने में, विरोधियों को परिचितों में बदलने में और कड़वाहट को मित्रता में बदलने में मैं काफी हद तक सफल रहा हूँ।

इस कला की शाश्वत नींव हमारे ऋषियों ने एक अमर संस्कृत सूत्र में दी है, जो मेरे जीवन का मार्गदर्शक मंत्र बन गया है –

सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात्, न ब्रूयात् सत्यम् अप्रियम्।
प्रियं च नानृतं ब्रूयात्, एष धर्मः सनातनः॥

अर्थात – सत्य बोलो, प्रिय बोलो, अप्रिय सत्य मत बोलो और प्रिय लगने वाला झूठ भी मत बोलो। यही सनातन धर्म है।

इस एक श्लोक में पूरी कूटनीति का दर्शन समाया है। यह सत्य को दबाने के लिए नहीं कहता, सत्य को परिष्कृत करने के लिए कहता है। यह चापलूसी करने के लिए नहीं कहता, करुणा के साथ सत्यनिष्ठ होने के लिए कहता है।

1. सत्यं ब्रूयात् – मुझे सत्य बोलना ही चाहिए, क्योंकि सत्य के बिना कूटनीति छल बन जाती है।
2. प्रियं ब्रूयात् – सत्य को प्रिय तरीके से बोलना चाहिए, क्योंकि कठोरता से बोला गया सत्य हृदय को घायल करता है और दुश्मनी पैदा करता है।
3. सत्यम् अप्रियम् न ब्रूयात् – वह सत्य भी नहीं बोलना चाहिए जो अनावश्यक रूप से कठोर, अपमानजनक और दुखदायी हो, क्योंकि ऐसा सत्य संबंधों को सुधारने के बजाय नष्ट कर देता है।

यही वह स्वर्णिम मध्यम मार्ग है जिसका मैंने जीवन भर अभ्यास किया है।

जीवन के तीन अनुभव –

पहला अनुभव – वह सहकर्मी जो युद्ध चाहता था, मैंने कॉफी पेश की : अकादमिक जीवन में एक सहकर्मी ने दक्षिण भारतीय होने के कारण मेरे प्रति द्वेष पाल लिया। वह मेरी प्रतिष्ठा को धूमिल करने लगा। शुभचिंतकों ने पलटवार करने की सलाह दी। लेकिन मैंने कूटनीति चुनी। मैंने उसे घर बुलाया, सम्मान के साथ दक्षिण भारतीय फिल्टर कॉफी पेश की और मुस्कुराते हुए कहा – “भाई, आप इस पेशे में मेरे भाई हैं। अगर अनजाने में मैंने आपको ठेस पहुंचाई हो तो क्षमा करें।” वह टकराव की उम्मीद कर रहा था, उसे करुणा मिली। उस दिन दुश्मनी की दीवार ढह गई और वह मेरा सबसे करीबी मित्र बन गया। मैंने सीखा कि एक मधुर शब्द तेज से तेज तलवार को भी कुंद कर सकता है।

दूसरा अनुभव – क्रोधित मुवक्किल और शांत जीभ की शक्ति : रामनगर में वकालत के दौरान एक व्यक्ति क्रोध में जलता हुआ मेरे चैंबर में आया। वह सबको गाली दे रहा था। यदि मैं भी उसी लहजे में बोलता तो विस्फोट हो जाता। मैंने 45 मिनट तक बिना टोके उसकी बात सुनी। फिर धीरे से कहा – “आपका दर्द सच्चा है, आपका गुस्सा जायज है, लेकिन अगर हम इसे गुस्से में व्यक्त करेंगे तो केस हार जाएंगे। आइए इसे कानून में, गरिमा के साथ व्यक्त करें, हम जीतेंगे।” वह शांत हो गया, रो पड़ा और बोला – “सर, आज तक किसी ने मुझसे ऐसे बात नहीं की।”

तीसरा अनुभव – कठोर बोलने वाले वरिष्ठ छात्र को आशीर्वाद : हाल ही में वकालत में असफल एक मध्यम आयु के व्यक्ति ने फोन पर मुझसे कठोर भाषा में बात की। खून खौल उठा। पहली प्रतिक्रिया पलटवार करने की थी। लेकिन संस्कार बीच में आ गए। मैंने “सत्यम् अप्रियम् न ब्रूयात्” को याद रखा। मैं चुप रहा, एक भी अपशब्द नहीं बोला। बाद में मैंने गरिमा के साथ उसे बीस साल पुराने संबंध की याद दिलाई और कॉलेज में पढ़ाने के कुछ असाइनमेंट भी दिए।

यही कूटनीति है। उकसाए जाने पर भी न उकसाना। अपमानित होने पर भी अपमान न करना। आहत होने पर भी घाव भरना।

मित्रों, यह दुनिया वास्तव में जंगल जैसी है। यहाँ आपको अहंकार से दहाड़ते मानव रूपी बाघ मिलेंगे, वर्चस्व चाहने वाले शेर मिलेंगे, ईर्ष्या और विश्वासघात के साथ पीछे से डसने वाले विषैले सर्प मिलेंगे। यदि आप हर बाघ, हर शेर, हर सर्प से लड़ने की कोशिश करेंगे तो आप टुकड़े-टुकड़े हो जाएंगे।

लेकिन यदि आप कूटनीतिक रणनीति सीख लें – कब बोलना है, कब चुप रहना है, कब मुस्कुराना है, कब अनदेखा करना है, कब बिना अशिष्ट हुए दृढ़ होना है और कब बिना कमजोर हुए कोमल होना है – तो आप उसी जंगल में एक बुद्धिमान ऋषि की तरह सुरक्षित, शानदार तरीके से चल सकते हैं।

मैंने सीखा है कि कूटनीति साहस का सर्वोच्च रूप है। कायर गाली देता है, बुद्धिमान मनाता है। मूर्ख दुश्मन बनाता है, कूटनीतिज्ञ दुश्मनों को मित्र बना लेता है।

यही मेरे जीवन का सबक है, यही मेरा दर्शन है – सत्यं ब्रूयात्, प्रियं ब्रूयात्, न ब्रूयात् सत्यम् अप्रियम्। सत्य बोलो, पर मिठास के साथ बोलो। यदि तुम उस सत्य को प्रेम के साथ नहीं कह सकते तो बेहतर है कि वह सत्य मत कहो। दृढ़ बनो, पर कोमल बनो। निडर बनो, पर क्षमाशील बनो। इसी तरह मैंने इस दुनिया नामक जंगल में जीवित रहना और सफल होना सीखा है।

  • प्रो. डॉ. एस. एम. राजन

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क्या गडकरी की पाठशाला के शिष्यों को फडणवीस दे रहे हैं राजनीतिक वनवास ?

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  • राजनीतिक विश्लेषक किशोर तिवारी का बड़ा सवाल – मुनगंटीवार का मंत्रिमंडल से बाहर रहना संयोग या सत्ता के केंद्रीकरण का पैटर्न, खडसे-तावडे से लेकर खोपडे तक पुराने कार्यकर्ताओं में बेचैनी, संघ की सामूहिक नेतृत्व परंपरा पर उठे सवाल

नागपुर, 26 अक्टूबर 2026 :

महाराष्ट्र भाजपा के अंदर चल रही असहज खामोशी पर वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक किशोर तिवारी ने एक तीखा विश्लेषणात्मक लेख लिखकर सत्तारूढ़ नेतृत्व से सात सीधे सवाल पूछे हैं। लेख का मूल प्रश्न है – नितीन गडकरी ने जिन्हें गढ़ा, क्या उन्हीं को देवेंद्र फडणवीस राजनीतिक वनवास में भेज रहे हैं ?

तिवारी लिखते हैं, यह सवाल सिर्फ सात बार विधायक रहे सुधीर मुनगंटीवार तक सीमित नहीं है। यह जनसंघ, ABVP, संघ और भाजपा को खून-पसीने से सींचने वाले हजारों निष्ठावान कार्यकर्ताओं के राजनीतिक अस्तित्व का सवाल है। ‘सुपर भारत’ में छपी खबर ‘सुधीर मुनगंटीवार कितने दिन राजनीतिक वनवास भुगतेंगे ?’ इसी बेचैनी को आवाज देती है।

गडकरी की पाठशाला और फडणवीस का उदय –
लेख में तिवारी याद दिलाते हैं कि नितीन गडकरी सिर्फ नेता नहीं, कार्यकर्ता गढ़ने वाले व्यक्तित्व थे। देवेंद्र फडणवीस का नागपुर महापौर से लेकर मुख्यमंत्री तक का सफर गडकरी के राजनीतिक समर्थन के बिना नहीं समझा जा सकता। उस दौर में एकनाथ खडसे, मुनगंटीवार, विनोद तावडे जैसे वरिष्ठ नेता मौजूद थे, फिर भी गडकरी ने नई पीढ़ी को आगे लाने की उदारता दिखाई।

तिवारी का सवाल है – जिन्होंने आपके लिए राजनीतिक रास्ता खोला, क्या आज उन्हीं के साथियों के लिए दरवाजे बंद हो रहे हैं ?

खडसे, तावडे, मुनगंटीवार से खोपडे तक – संयोग या पैटर्न ?
लेखक सवालों की झड़ी लगाते हैं –
एकनाथ खडसे को भाजपा क्यों छोड़नी पड़ी ?
विनोद तावडे को महाराष्ट्र की सत्ता से दूर राष्ट्रीय संगठन में क्यों जाना पड़ा ?
मुनगंटीवार को मंत्रिमंडल के बाहर क्यों रखा गया ?
चंद्रशेखर बावनकुले के उतार-चढ़ाव, कृष्णा खोपडे, गिरीश व्यास, माधव भंडारी, केशव उपाध्ये, डॉ. उपेंद्र कोठेकर, गिरीश देशमुख जैसे संगठन की परंपरा से जुड़े नामों की वर्तमान स्थिति क्या इत्तेफाक है ?

तिवारी कहते हैं, पद सबको मिले हैं, लेकिन मूल प्रश्न है – क्या गडकरी के करीबी माने जाने वाले कार्यकर्ताओं को निर्णय प्रक्रिया में न्यायोचित स्थान मिल रहा है ? महाराष्ट्र के हर जिले में जनसंघ के कठिन दिनों में, आपातकाल में जेल भुगतने वाले, घर-परिवार दांव पर लगाकर संगठन खड़ा करने वाले पुराने स्वयंसेवक आज उपेक्षित महसूस कर रहे हैं।

मोदी-शाह के समर्थन से एक नेतृत्व की मोनोपॉली ?
तिवारी लिखते हैं, फडणवीस के पास आज सत्ता और संगठन दोनों की ताकत है, उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह का खुला समर्थन प्राप्त है। लेकिन क्या इस समर्थन का इस्तेमाल पुरानों को जोड़ने के लिए हो रहा है या वैकल्पिक नेतृत्व को कमजोर करने के लिए ?

कभी सामूहिक नेतृत्व, कार्यकर्ता का सम्मान और वैचारिक निष्ठा का आग्रह करने वाली भाजपा में आज निष्ठा का पैमाना क्या है – पार्टी के लिए किया गया त्याग या मौजूदा सत्ता केंद्र से निकटता ?

संघ संस्कार या सत्ता का अहंकार ?
संघ में व्यक्ति से बड़ा संगठन, पद से बड़ा कार्य माना जाता है। फिर संघ के संस्कारों से निकले वरिष्ठ कार्यकर्ताओं को अपने भविष्य को लेकर असुरक्षा क्यो?

“पार्टी में अनुशासन होना चाहिए, लेकिन अनुशासन का मतलब मौन नहीं। निष्ठा होनी चाहिए, लेकिन निष्ठा का मतलब व्यक्तिपूजा नहीं। और नेतृत्व होना चाहिए, लेकिन नेतृत्व का मतलब एकाधिकार नहीं!” – तिवारी लिखते हैं।

फडणवीस से अपील और सात सीधे सवाल –
लेखक स्पष्ट करते हैं कि फडणवीस के कर्तृत्व को कम आंकना मकसद नहीं। लेकिन कोई भी नेतृत्व शून्य से नहीं बनता। गडकरी ने कई लोगों को मौका दिया, वही उदारता अब फडणवीस से अपेक्षित है।

अंत में तिवारी ने सात सवाल पूछे हैं :

  1. सात बार चुने गए मुनगंटीवार को मंत्रिमंडल से बाहर रखने का राजनीतिक कारण क्या है ?
  2. क्या गडकरी के करीबी कार्यकर्ताओं के लिए अलग मानदंड अपनाए जा रहे हैं ?
  3. खडसे, तावडे जैसे वरिष्ठों के राजनीतिक मोड़ में संगठन का निर्णय कितना और आंतरिक सत्ता संघर्ष कितना ?
  4. नागपुर-विदर्भ के पुराने संघनिष्ठ कार्यकर्ताओं को निर्णय प्रक्रिया में उचित स्थान मिल रहा है क्या ?
  5. क्या वरिष्ठ नेताओं को मतभिन्नता रखने की स्वतंत्रता बची है ?
  6. मोदी-शाह नेतृत्व में महाराष्ट्र में सामूहिक नेतृत्व की परंपरा टिकेगी क्या ?
  7. जिन्होंने फडणवीस को गढ़ने में मदद की, उन्हीं के साथियों को आज अस्तित्व के लिए संघर्ष क्यों करना पड़ रहा है ?

तिवारी का निष्कर्ष है – “यह सिर्फ मुनगंटीवार की पीड़ा नहीं, यह भाजपा की पुरानी पीढ़ी के सम्मान का सवाल है। सत्ता स्थायी नहीं होती, पर संघर्ष से खड़े हुए कार्यकर्ता ही किसी भी दल की असली नींव होते हैं। इतिहास में सत्ता के साल नहीं गिने जाते, सत्ता में रहते हुए आपने साथियों से कैसा व्यवहार किया, यह दर्ज होता है।”

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राज ठाकरे और संजय राउत के दिवास्वप्न – ‘कुछ महीनों में देश में प्रधानमंत्री ही नहीं होगा’ जैसा दावा कितना हास्यास्पद?

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  • स्पष्ट और बेबाक – संविधान में PM पद कभी खाली नहीं रह सकता, मोदी-विरोध में बेबुनियाद बयानबाजी और विदेशी शक्तियों की साजिश का विश्लेषण

महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना प्रमुख राज ठाकरे और शिवसेना (उबाठा) के स्वघोषित विश्व प्रवक्ता संजय राउत के दो बयान इन दिनों चर्चा में हैं। अलग-अलग लगने वाले इन बयानों का ध्वनित अर्थ एक ही है – मोदी-द्वेष से उपजी गैर-जिम्मेदार भविष्यवाणी।

राज ठाकरे का दावा –
एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में राज ठाकरे ने कहा कि अगले दो-तीन महीनों में देश में ऐसी स्थिति आएगी कि प्रधानमंत्री ही नहीं होगा। राज ठाकरे की राजनीति हमेशा ‘तळ्यात-मळ्यात’ वाली रही है। कभी वे खुद को शरद पवार के कुनबे में छोड़ देते हैं, कभी मोदी से नजदीकी दिखती है। वर्षों झगड़ने के बाद अब सगे चचेरे भाई से हाथ मिला रहे हैं, कभी कांग्रेस के साथ समझौता तो कभी अभिजीत दीपके को सिर पर बिठाकर नाचना। कुल मिलाकर स्थिर भूमिका के अभाव वाले नेता।

उन्होंने यह भविष्यवाणी किस आधार पर की? क्या संविधान पढ़ा? प्रथा-परंपरा देखी?

हमारे देश में संविधान के अनुसार प्रधानमंत्री का पद कभी रिक्त नहीं रखा जा सकता। यदि मुख्यमंत्री इस्तीफा दे दे या निधन हो जाए और नया मुख्यमंत्री न बन सके तो राष्ट्रपति शासन लग सकता है। महापौर, नगराध्यक्ष, जिला परिषद अध्यक्ष या सरपंच न हो तो प्रशासक नियुक्त हो सकता है। लेकिन प्रधानमंत्री न हो तो राष्ट्रपति शासन लगाकर राष्ट्रपति शासन चलाएंगे, ऐसी व्यवस्था ही नहीं है।

इसीलिए किसी कारण प्रधानमंत्री इस्तीफा भी दे दे तो नया प्रधानमंत्री आने तक उसे कार्यवाहक प्रधानमंत्री के रूप में काम करना ही पड़ता है। राष्ट्रपति वैसी सूचना देते हैं। यदि पद पर रहते प्रधानमंत्री का निधन हो जाए तो नए कार्यवाहक प्रधानमंत्री की शपथ होने तक आधिकारिक तौर पर निधन की घोषणा भी नहीं की जाती।

मेरी याद के अनुसार 1964 में पंडित नेहरू के निधन पर गुलजारीलाल नंदा को कार्यवाहक PM की शपथ दिलाने के बाद ही निधन की घोषणा हुई थी। यही लालबहादुर शास्त्री के निधन पर भी हुआ। इंदिरा गांधी की गोली मारकर हत्या सुबह करीब 10 बजे हुई थी, एम्स ले जाते-ले जाते उनका निधन हो गया था, लेकिन पश्चिम बंगाल से राजीव गांधी के दिल्ली लौटकर कार्यवाहक PM की शपथ लेने तक सिर्फ “गोली लगी, एम्स में भर्ती” यही खबर रेडियो-टीवी पर चलती रही।

1979 में चौधरी चरण सिंह ने संसद भंग की थी, फिर भी राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी ने उन्हें नई सरकार तक कार्यवाहक रहने को कहा। यही चंद्रशेखर (1991), इंद्रकुमार गुजराल (1997) और अटल बिहारी वाजपेयी (1999) के मामले में हुआ। इसलिए “देश में प्रधानमंत्री ही नहीं होगा” यह दावा हास्यास्पद है। मान लो अगले चार महीने में गड़बड़ी हुई और मोदी को इस्तीफा देना भी पड़ा, तब भी नए PM तक उन्हें ही कार्यवाहक रहना पड़ेगा। यह संवैधानिक प्रावधान है। राज ठाकरे मन में आए वैसा बोल देते हैं, अक्सर बिना आधार के।

संजय राउत का भाकित –
शिवसेना के दशहरा मेले में संजय राउत ने कहा कि अगले 3-4 महीने में देश में भारी गड़बड़ी होगी, नरेंद्र मोदी PM नहीं रहेंगे, सत्ता परिवर्तन होगा। अभिजीत दीपके के पहले आंदोलन के बाद से ही विपक्ष को सत्ता परिवर्तन के दिवास्वप्न दिखने लगे हैं।

वास्तव में मोदी और सहयोगी पिछले 12 साल से शासन चला रहे हैं, कई अच्छे काम किए हैं, इसलिए आम आदमी कहीं न कहीं उनके साथ दिखता है। 2024 में भाजपा को झटका लगा, 303 से 240 पर आ गई। तब विपक्ष सरकार बनाएगा क्या, भाजपा ने कुछ समय इंतजार किया, लेकिन विपक्ष की आपसी खींचतान देखकर कई छोटे दलों ने मोदी के नेतृत्व वाली सरकार के साथ ही रहने का फैसला किया। आज धीरे-धीरे भाजपा का समर्थन फिर बढ़ रहा है। कुछ दलों में टूट से सांसद भाजपा में आए हैं। अप्रैल 2026 में दो-तिहाई बहुमत के अभाव में खारिज हुआ महिला आरक्षण विधेयक अब फिर पारित कराने के लिए विशेष सत्र बुलाने की हलचल है।

विपक्ष किसी तरह मौजूदा सरकार को गिराना चाहता है। यह सिर्फ इच्छा नहीं, इसके पीछे विदेशी शक्तियों का साथ होने के पुख्ता सबूत मिलने की जानकारी है। पिछले 12 साल में मोदी नेतृत्व में देश की जो प्रगति हुई, वह बाहर के विकसित देशों को पच नहीं रही। इसलिए देश में अशांति फैलाकर सरकार गिराने के प्रयास हैं। अशांति फैलाने के लिए ही ऐसे आंदोलनों को स्पॉन्सर किया जाता है। नहीं तो विदेश में पढ़ाई छोड़कर अभिजीत दीपके को विशेष विमान से भारत लाना और आंदोलन का ढांचा खड़ा करने में मदद करना, इसका क्या अर्थ निकाला जाए? अभी मतदाता सूची पुनरीक्षण के मुद्दे पर भी आंदोलन भड़काया जा रहा है, पर उसमें आम आदमी कितना है, यह जांचना जरूरी है। आम आदमी को पहले रोजी-रोटी की चिंता है, वह ऐसे आंदोलन में कभी नहीं आएगा।

आज संजय राउत की बात को कोई गंभीरता से लेता है, ऐसा किसी को नहीं लगता। वे रोज सुबह मीडिया को बुलाकर अलग-अलग फोकनाड (शेखी) हांकते हैं। कुछ मराठी चैनलों को छोड़कर कोई गंभीरता से नहीं लेता। मराठी न्यूज चैनल पर उनका बोलना दिखता है तो आम आदमी टाइमपास के तौर पर देखता है। उनकी ज्यादातर कहानियां कपोल-कल्पित और सिर्फ मनोरंजक होती हैं, तथ्य कम।

आज विपक्ष ने कुछ आंदोलन खड़े करने की कोशिश जरूर की, हिंसा भड़काने के इरादे के संकेत भी मिले, लेकिन हिंसा अभी तक नहीं हुई और मोदी सरकार होने भी नहीं देगी, ऐसा आज का चित्र है। ऐसी स्थिति में अगले चार महीने में सरकार गिरने के क्या कारण होंगे, यह राउत को तथ्यों के साथ स्पष्ट करना चाहिए, हवाई बातों से नहीं। नहीं तो आम आदमी इसे “सुबह का भोंगा” समझकर अनदेखा कर देगा, जैसे मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस उन्हें “सुबह 9 बजे का भोंगा” कहते हैं।

कुल मिलाकर अगले कुछ महीनों में देश में अराजकता और सत्ता परिवर्तन होगा और कुछ महीने PM ही नहीं रहेगा, ऐसा चित्र आज तो नहीं दिखता। राज ठाकरे और संजय राउत को दिवास्वप्न आते हैं, यह मानसिक बीमारी भी हो सकती है। हो तो इलाज कराएं।

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