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दाल में काला नहीं, पूरी दाल ही काली है

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  • विदर्भ साहित्य संघ में पारदर्शिता, कानून और जवाबदेही पर सवाल

नागपुर, 11 अगस्त 2026
विदर्भ साहित्य संघ में नई कार्यकारिणी श्री गिरीश गांधी के नेतृत्व में सत्ता में आई है। लेकिन सत्ता संभालने के बाद से ही संस्था लगातार विवादों और सवालों के घेरे में है। आरोप यह है कि नेतृत्व को टकराव और सुर्खियों की आदत पड़ गई है, और इसी कारण संस्था के हित पीछे छूट रहे हैं।

26 जुलाई की आम सभा और पत्रकारों को दिया गया बयान
26 जुलाई को विदर्भ साहित्य संघ की आम सभा हुई। आरोप लगाने वालों का कहना है कि उस सभा के एजेंडे में संघ की जमीन सरेंडर करने का कोई प्रस्ताव था ही नहीं। इसके बावजूद आम सभा के बाद अध्यक्ष श्री गिरीश गांधी ने पत्रकारों के सामने कहा कि सभा में जमीन सरेंडर करने का प्रस्ताव पास हो गया।

सवाल उठता है कि जब प्रस्ताव आया ही नहीं, तो उसे पास होने की बात क्यों कही गई? क्या यह ताली पाने या अपनी बात को बड़ा दिखाने के लिए किया गया? वरिष्ठ पत्रकार और संपादक श्री विनोद देशमुख ने सार्वजनिक रूप से इस दावे का खंडन किया और कहा कि ऐसा कोई निर्णय नहीं हुआ है। उनके हस्तक्षेप के बाद मामला धर्मदाय आयुक्त के समक्ष चल रही सुनवाई में भी पहुंच गया, जहां संघ को जवाब देने के लिए फिर से समय मांगना पड़ा।

धर्मदाय आयुक्त के सामने लंबित याचिका
धर्मदाय आयुक्त के कार्यालय में विदर्भ साहित्य संघ के खिलाफ एक याचिका पहले से लंबित है। धर्मदाय अधिनियम की धारा 41(अ) के अनुसार नई कार्यकारिणी को चुनाव के 90 दिनों के भीतर चेंज रिपोर्ट जमा करना अनिवार्य है। इसके बिना कोई भी नीतिगत निर्णय लेने का अधिकार नहीं होता।

आरोप है कि नई कार्यकारिणी न तो चेंज रिपोर्ट पर जवाब दे पाई, न चुनाव के दौरान हुई अनियमितताओं पर, और न ही मतपत्रों की चोरी की शिकायत पर कोई ठोस रिपोर्ट दे पाई। 10 अगस्त को हुई सुनवाई में भी संघ की ओर से अध्यक्ष और कार्यकारिणी ने जवाब के लिए अगली तारीख मांगी।

तीन बंदरों वाली कार्यशैली का आरोप
लेखक ने संघ की वर्तमान कार्यशैली को गांधीजी के तीन बंदरों से जोड़ा है। बुरा मत देखो, बुरा मत सुनो, बुरा मत बोलो। उनका कहना है कि इसी कारण संस्था में पारदर्शिता की कमी है। इसके विपरीत उन्होंने श्री विनोद देशमुख के रुख की सराहना की और कहा कि उनका संघर्ष “कुछ भी गलत नहीं होने देने” के सिद्धांत पर आधारित है।

आंतरिक गुटबाजी और आयोजन पर सवाल
हाल में मेहता बाई को श्रद्धांजलि देने का कार्यक्रम संघ और एक अन्य संस्था ने मिलकर किया। लेकिन उस आयोजन को लेकर भी दो खेमों में रेखा खींची गई। आरोप है कि संघ का संचालन “प्रोप्रायटरी पद्धति” से हो रहा है, जिसे आलोचक “म्हैसाळकर पद्धति” कहते हैं।

साथ ही यह भी पूछा गया है कि जब अध्यक्ष ने प्रेस ब्रीफिंग में हुई गलती मानी, तो अगले दिन हुई बैठक में कार्यकारिणी के दो सदस्यों को क्यों नहीं बुलाया गया? क्या उन दो सदस्यों पर अविश्वास है, या संघ में गुटबाजी है?

सरचिटनिस और जवाबदेही
आलोचना में कहा गया है कि प्रदीप दाते पैनल कमजोर पड़ने के बाद भी सरचिटनिस श्री विलास मानेकर अपने पद पर बने हुए हैं और स्थिति का लाभ ले रहे हैं। पूरा मामला “खाया पिया कुछ नहीं, गिलास फोड़ा बारह आना” जैसी स्थिति बन गया है।

लेख के अंत में संस्कृत सुभाषित का उल्लेख किया गया है: उद्योग से धन, धन से सुख, सुख से मन की शांति मिलती है। सवाल यह है कि वर्तमान स्थिति में संघ को वह मन:शांति मिलेगी या नहीं।

लेखक के सीधे सवाल

  1. जब 26 जुलाई की आम सभा में जमीन सरेंडर का प्रस्ताव था ही नहीं, तो अध्यक्ष ने प्रेस को गलत जानकारी क्यों दी?
  2. उस गलती को मानने के बाद दो कार्यकारिणी सदस्यों को बैठक में क्यों नहीं बुलाया गया?
  3. आजीवन सदस्य और विश्वस्त इस पूरे घटनाक्रम पर क्या सोचते हैं ?
  4. चुनाव में बैलेट पत्र एकत्र करने वाले लोग अब इस विषय पर क्या कहेंगे ?

लेखक का स्पष्ट कहना है कि अगर “पूरी दाल काली है” यह बात गलत है तो सामने आकर तथ्यों के साथ खंडन किया जाए। अगर सही है तो चुप्पी तोड़कर संस्था को बचाने के लिए सभी को साथ आना होगा। उन्होंने यह भी कहा कि लिखने में कोई तथ्यात्मक त्रुटि हो तो प्रमाण के साथ बताई जाए, वे उसे मानकर क्षमा मांगेंगे। लेकिन संस्था में जो गलत हो रहा है उसे रोकना पहली जिम्मेदारी है।

निष्कर्ष
विदर्भ साहित्य संघ महाराष्ट्र के साहित्यिक जीवन की महत्वपूर्ण संस्था है। ऐसे में कानून का पालन, पारदर्शिता और सभी सदस्यों को साथ लेकर चलना जरूरी है। तारीख पर तारीख लेकर और असत्य कथनों से समस्या सुलझने के बजाय और गहरी होगी।

आप इस विषय पर क्या सोचते हैं? एक साहित्य प्रेमी और संघ के सदस्य के नाते आपकी राय क्या है ?

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बच्चों ने देखा गोबरगैस संयंत्र, विज्ञान को जिया और पर्यावरण का लिया संकल्प

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  • परिसर अभ्यास के तहत कोदामेंढी में शामलाल धांडे के घर क्षेत्रभेंट, शेण से गैस बनने की प्रक्रिया, खाना पकाने में उपयोग और अवशेष से खाद बनने की जानकारी, प्रत्यक्ष अनुभव से बढ़ी वैज्ञानिक सोच

कोदामेंढी, 26 अक्टूबर 2026 :

आनंददायी शनिवार के तहत परिसर अभ्यास विषय के अंतर्गत जिला परिषद शाला तोंडली के विद्यार्थियों ने गांव में शामलाल धांडे के घर लगे गोबरगैस संयंत्र की क्षेत्रभेंट की।

परिसर अभ्यास में गोबरगैस संयंत्र के बारे में संक्षिप्त जानकारी दी गई थी, जिसके बाद बच्चों के मन में कई सवाल उठे – गोबरगैस क्या है? यह कैसे बनता है? संयंत्र कैसे बना होता है? इसका उपयोग क्या है? इन्हीं जिज्ञासाओं को शांत करने के लिए बच्चों को प्रत्यक्ष संयंत्र दिखाया गया।

इस दौरान बच्चों को संयंत्र की कार्यप्रणाली, गोबर से जैव-गैस (बायोगैस) बनने की प्रक्रिया, खाना पकाने में इसके उपयोग और संयंत्र से निकलने वाले अवशेषों का खाद के रूप में इस्तेमाल होने की विस्तृत जानकारी दी गई। शामलाल धांडे ने बच्चों के सभी सवालों के संतोषजनक जवाब दिए।

इस क्षेत्रभेंट के माध्यम से बच्चों को समझाया गया कि विज्ञान केवल किताबों तक सीमित नहीं है, बल्कि हमारे रोजमर्रा के जीवन में कैसे उपयोगी है। गोबरगैस जैसे वैकल्पिक ऊर्जा स्रोत पारंपरिक ईंधन पर निर्भरता कम करते हैं और जैविक पदार्थों का सही उपयोग, कचरा प्रबंधन, प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण और पर्यावरण संवर्धन का महत्व भी बताया गया।

इस अवसर पर मुख्याध्यापिका अनुराधा धुर्डे ने विद्यार्थियों को मार्गदर्शन देते हुए प्रत्यक्ष निरीक्षण, प्रश्नोत्तर और साक्षात्कार के माध्यम से ज्ञान अर्जित करने का महत्व समझाया। इस उपक्रम से बच्चों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण, निरीक्षण कौशल, सवाल पूछने की प्रवृत्ति और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी की भावना विकसित हुई। इस उपक्रम में सह-शिक्षक निलेश जाधव का सहयोग रहा।

किताबी ज्ञान को प्रत्यक्ष अनुभव से जोड़ने वाली यह क्षेत्रभेंट विद्यार्थियों के लिए ज्ञानवर्धक, आनंददायी और प्रेरणादायी साबित हुई।

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पेच-कन्हान में अवैध रेत खनन की जांच अब CDR तक पहुंचने की मांग

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  • गरंडा-बखारी में पाइप और वैकल्पिक रास्तों पर उठे सवाल – पारशिवनी-कन्हान पुलिस और राजस्व विभाग की संयुक्त कार्रवाई की मांग, संगठित रैकेट के सबूत मिले तो मकोका लगाने की आवाज, तहसीलदार ने माने नदी में गड्ढों के बगल से बनाए गए वैकल्पिक रास्ते

नागपुर, 26 अक्टूबर 2026 :

पेच-कन्हान नदी क्षेत्र में कथित अवैध रेत उत्खनन, भंडारण और परिवहन की शिकायतों के बीच जांच का दायरा बढ़ाने की मांग तेज हो गई है। पारशिवनी के तहसीलदार सुरेश वाघचौरे ने खुद माना है कि नदी पात्र में गड्ढे खोदकर रास्ते रोके जाने के बावजूद उनके बगल से वैकल्पिक रास्ते बनाए जा रहे हैं। ऐसे में अब सवाल सिर्फ रेत निकालने वालों पर नहीं, बल्कि पूरी चेन की जवाबदेही और निगरानी व्यवस्था पर उठ रहा है।

माउली, नायकुंड, पालोरा, कालाफाटा, पिपला, वागोला, मेहदी, इटगांव, गरंडा, डोरली और बखारी क्षेत्र से जुड़ी शिकायतों को लेकर मांग है कि प्रशासन उत्खनन स्थलों, परिवहन मार्गों, रेत के भंडारों और संबंधित दस्तावेजों की संयुक्त पड़ताल करे।

CDR और मोबाइल लोकेशन की कानूनी जांच की मांग –

मामले में संबंधित अधिकारियों-कर्मचारियों की भूमिका को लेकर सवाल उठने के बाद अब कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) और मोबाइल टावर लोकेशन की कानूनी प्रक्रिया के तहत जांच की मांग की जा रही है।

हालांकि यह स्पष्ट है कि केवल फोन संपर्क या लोकेशन के आधार पर किसी की संलिप्तता साबित नहीं होती। ऐसी जांच सक्षम प्राधिकारी की अनुमति और लागू कानूनों के अनुसार ही हो सकती है। जांच में देखा जाना चाहिए कि संबंधित अवधि में शिकायतें कब मिलीं, उन पर क्या कार्रवाई हुई, मौके का निरीक्षण हुआ या नहीं और सरकारी रिकॉर्ड में क्या दर्ज है।

कुछ कर्मचारियों द्वारा एक से अधिक मोबाइल नंबर इस्तेमाल करने का संदेह भी व्यक्त किया जा रहा है, जिसकी स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है। एक से अधिक नंबर होना अपने आप में अपराध का सबूत नहीं है।

राजनीतिक हस्तक्षेप के आरोपों की भी निष्पक्ष जांच हो –

स्थानीय स्तर पर इस कथित कारोबार में राजनीतिक संपर्कों या हस्तक्षेप की आशंका भी जताई जा रही है। लेकिन बिना ठोस प्रमाण के किसी व्यक्ति या पदाधिकारी पर आरोप को तथ्य नहीं माना जा सकता। मांग है कि प्रशासन बिना दबाव के शिकायतों, परमिट, परिवहन रिकॉर्ड और अन्य साक्ष्यों की जांच करे।

गरंडा-बखारी में पाइप और रास्तों का रहस्य –

पेच नदी किनारे नया रास्ता तैयार करने और बखारी शिवार की ओर नदी पात्र में बड़े पाइप डालने की चर्चा को लेकर आधिकारिक स्थिति स्पष्ट होना बाकी है। क्या इसके लिए संबंधित विभागों से अनुमति ली गई है? क्या नदी पात्र में बदलाव किया गया है? क्या इसका कथित अवैध रेत परिवहन से संबंध है? इन सवालों का जवाब संयुक्त स्थल निरीक्षण और दस्तावेजों की जांच से ही मिल सकता है।

पारशिवनी-कन्हान पुलिस के समन्वय की जरूरत –

यह क्षेत्र पारशिवनी और कन्हान पुलिस थानों की सीमा में आता है, इसलिए दोनों थानों, राजस्व विभाग, रामटेक के उपविभागीय अधिकारी, जिलाधिकारी और नागपुर ग्रामीण पुलिस के बीच समन्वय जरूरी बताया जा रहा है। नागपुर ग्रामीण के पुलिस अधीक्षक हर्ष पोद्दार, अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक मस्के और स्थानीय अपराध शाखा से संयुक्त जांच की मांग उठ रही है।

इस मामले में पारशिवनी के सहायक पुलिस निरीक्षक किशोर शेळके से फोन पर संपर्क का प्रयास किया गया, लेकिन प्रतिक्रिया नहीं मिली। अधिकारियों का आधिकारिक पक्ष आने पर स्थिति और स्पष्ट होगी।

राजस्व मंत्री से DGP तक हस्तक्षेप की मांग –

महाराष्ट्र के राजस्व मंत्री, गृहमंत्री, पुलिस महानिदेशक, विशेष पुलिस महानिरीक्षक से मामले का संज्ञान लेने की मांग हो रही है। जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक के समन्वय से विशेष जांच अभियान चलाकर अधिकृत रेत स्रोत, परिवहन अनुमति और बाजार में आपूर्ति की स्थिति की भी पड़ताल करने की जरूरत बताई गई है।

संगठित अपराध मिला तो मकोका पर विचार –

मामले में कठोर कार्रवाई और महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण अधिनियम (मकोका) लगाने की मांग भी उठी है। हालांकि मकोका के लिए सिर्फ बड़े पैमाने पर रेत चोरी की शिकायत पर्याप्त नहीं है। इसके लिए कानून में निर्धारित संगठित अपराध के आवश्यक तत्वों का पूरा होना जरूरी है। यदि निष्पक्ष जांच में ऐसे ठोस प्रमाण मिलते हैं, तो सक्षम अधिकारी कानून के अनुसार कार्रवाई पर विचार कर सकते हैं, अन्यथा खनन, राजस्व, पर्यावरण और आपराधिक कानूनों के तहत कार्रवाई होगी।

फिलहाल निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि प्रशासन संयुक्त निरीक्षण कब करता है और दोषियों पर क्या कार्रवाई होती है।

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वडेट्टीवार का बड़ा बयान – कांग्रेस की गुटबाजी से नागपुर शहर में नुकसान, फिर भी ग्रामीण समर्थन से वंजारी की जीत पक्की

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  • स्नातक निर्वाचन क्षेत्र चुनाव में 38 उम्मीदवार, 64.82% मतदान के बाद कल मतगणना, वडेट्टीवार ने कहा – शहर के नेताओं ने ‘तुझा की माझा’ खेला, चंद्रपुर-गडचिरोली में वंजारी को अभूतपूर्व समर्थन

नागपुर, 26 अक्टूबर 2026 :

महाराष्ट्र विधान परिषद के नागपुर विभाग पदवीधर (स्नातक) मतदारसंघ चुनाव की मतगणना से एक दिन पहले कांग्रेस में अंतर्कलह खुलकर सामने आ गया है। कांग्रेस नेता विजय वडेट्टीवार ने नागपुर शहर के कई स्थानीय नेताओं पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि उन्होंने चुनाव के दौरान घोला घातला (धोखा दिया) और ‘तुझा की माझा’ का खेल खेलकर समय बर्बाद किया।

वडेट्टीवार ने हालांकि दावा किया है कि इसके बावजूद महाविकास आघाड़ी के उम्मीदवार अभिजित वंजारी की जीत 100% निश्चित है, क्योंकि नागपुर ग्रामीण और शेष विदर्भ में उन्हें स्नातक मतदाताओं का अभूतपूर्व समर्थन मिला है।

वडेट्टीवार ने क्या कहा ?
चुनाव पर बात करते हुए वडेट्टीवार ने कहा कि मुख्यमंत्री और राज्य के राजस्व मंत्री ने इस स्नातक चुनाव को अत्यंत प्रतिष्ठा का विषय बना दिया था। सत्ता पक्ष के नेताओं ने अपनी पूरी ताकत इस चुनाव में झोंक दी थी, तब कांग्रेस के स्थानीय स्तर के कुछ नेताओं की भूमिका संदेहास्पद और सुस्त रही।

उन्होंने कहा, “कुछ नेताओं के नाम लेना उचित नहीं होगा, लेकिन वास्तविकता यह है कि ये नेता चुनाव के काम में देर से लगे। अभिजित वंजारी हमेशा सभी कार्यकर्ताओं और नेताओं को साथ लेकर चलने वाले जननेता हैं, परंतु नागपुर शहर में वैसी एकजुटता या तालमेल दिखाई नहीं दिया।”

उन्होंने आरोप लगाया कि अनेक लोगों ने एक-दूसरे की टांग खिंचाई में ही समय गंवा दिया।

ग्रामीण भाग पर भरोसा –
वडेट्टीवार ने कहा कि चंद्रपुर, गडचिरोली और आसपास के ग्रामीण इलाकों में मतदाता बड़ी संख्या में वंजारी के पीछे खड़े रहे हैं। वहां उन्हें प्रचंड प्रतिसाद मिला है।

“नागपुर से 50% मत मिले तो भी, नागपुर के अलावा शेष चार से पांच जिलों से अभिजित वंजारी को स्नातक मतदाताओं का उत्तम और अभूतपूर्व समर्थन मिला है। इसी ग्रामीण समर्थन के मजबूत भरोसे पर महाविकास आघाड़ी के उम्मीदवार अभिजित वंजारी 100% चुनावी मैदान में बाजी मारेंगे और विजयी होकर विधान परिषद में जाएंगे, ऐसा ठोस विश्वास है।”

पृष्ठभूमि –
गौरतलब है कि नागपुर विभाग स्नातक मतदारसंघ के लिए 23 अक्टूबर को 6 जिलों – नागपुर, वर्धा, भंडारा, गोंदिया, चंद्रपुर, गडचिरोली के 445 केंद्रों पर मतदान हुआ था, जिसमें 64.82% मतदान दर्ज हुआ। कुल 38 उम्मीदवार मैदान में हैं। मतगणना कल 27 अक्टूबर को सुबह 8 बजे से मानकापुर इनडोर स्टेडियम में 84 टेबल पर होगी।

वडेट्टीवार के इस बयान के बाद नागपुर स्नातक चुनाव का राजनीतिक माहौल और गरमा गया है और पार्टी के भीतर चर्चा तेज हो गई है।

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