पटेल प्रधानमंत्री होते तो देश कहां से कहां पहुंचा होता, इसकी असलियत
नई दिल्ली :1947 में जवाहरलाल नेहरू की जगह 71 वर्षीय वल्लभभाई पटेल भारत के पहले प्रधानमंत्री बनते तो देश आज न जाने कहाँ पहुँच गया होता”, जो लोग ऐसा कहते हैं वे असल में इतिहास, भूगोल और जीव विज्ञान तीनों के मोतियाबिंद से पीड़ित हैं।
भारत को गुलामी की बेड़ियों से आजादी 15 अगस्त 1947 को मिली और यह एक अकाट्य प्रशासनिक सत्य है। लेकिन देश के “लौह पुरुष” सरदार वल्लभभाई पटेल का निधन 15 दिसंबर 1950 को सुबह ठीक 9:37 बजे, मुंबई के बिड़ला हाउस में दिल का दौरा पड़ने से हुआ
आजादी के बाद सरदार पटेल के पास इस नश्वर संसार में कुल 3 साल 4 महीने, यानी केवल 1,218 दिनों का जीवन शेष था।
अब इस 1,218 दिनों के वास्तविक कार्यकाल की शारीरिक और व्यावहारिक सीमाओं में 29 मार्च 1949 को जब सरदार पटेल का शाही विमान राजस्थान के शाहपुरा के पास दुर्घटनाग्रस्त होने से बाल-बाल बचे , तब देश का कलेजा कांप गया था।
उस हादसे के बाद उनका स्वास्थ्य इतनी तेजी से गिरा कि अपनी मृत्यु से पहले के आखिरी 9 महीनों में वे पूरी तरह से अस्वस्थ और बिस्तर पर थे।
अब जो “महान बुद्धिजीवी” यह दावा करते हैं कि पटेल प्रधानमंत्री होते तो देश का कायाकल्प कर देते, वे जरा यह समझाएं कि क्या कोई व्यक्ति मात्र 3 साल के कार्यकाल में जिसमें से शुरुआती 500 दिन देश को विभाजन के भीषण दंगों, 15,00,000 से अधिक शरणार्थियों के पुनर्वास और 562 रियासतों के एकीकरण में बीते हों देश को 50 साल आगे ले जाता?
क्या 1950 में उनके निधन के बाद देश को अंततः एक नए नेतृत्व की जरूरत नहीं पड़ती?
वर्तमान सत्ता के पाले हुए ट्रोलर्स दिन-रात यह नैरेटिव गढ़ते हैं कि नेहरू और पटेल एक-दूसरे के जानी दुश्मन थे और नेहरू ने पटेल को हमेशा दबाकर रखा। राष्ट्रीय अभिलेखागार (National Archives) के गुप्त पत्रों और आंतरिक दस्तावेजों के पन्ने पलटिए तो इन झूठों के मुंह पर करारा तमाचा पड़ता है।
महात्मा गांधी की शहादत से ठीक पहले, 23 दिसंबर 1947 को प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने गृह मंत्री सरदार पटेल को एक पत्र लिखा था। नेहरू ने लिखा था, “हमारे बीच मतभेद हो सकते हैं, लेकिन देश के प्रति आपकी निष्ठा और क्षमता का कोई विकल्प नहीं है। आपके बिना मेरी सरकार की कल्पना भी अधूरी है।”
इस पत्र के जवाब में सरदार पटेल ने जो लिखा, वह आज के सत्ताधीशों की संकीर्ण सोच को पूरी तरह बेनकाब कर देता है। पटेल ने न केवल पत्रों में बल्कि सार्वजनिक मंचों से दहाड़ते हुए कहा था, “जवाहरलाल नेहरू हमारे नेता हैं। बापू ने उन्हें अपना उत्तराधिकारी चुना है और मैं पूरी वफादारी से उनके साथ खड़ा हूँ।”
30 जनवरी 1948 को शाम 5:17 बजे जब नाथूराम गोडसे ने गांधी जी की छाती में तीन गोलियां दागीं, तो उस शहादत के बाद नेहरू और पटेल ने एक-दूसरे को गले लगाकर रोते हुए यह कसम खाई थी कि वे देश को बिखरने नहीं देंगे।
नेहरू ने प्रधानमंत्री रहते हुए पटेल को भारत का पहला उप-प्रधानमंत्री बनाया और 562 रियासतों के विलीनीकरण का असीमित अधिकार दिया, जिसमें सितंबर 1948 के ‘ऑपरेशन पोलो’ (हैदराबाद सैन्य कार्रवाई) के दौरान नेहरू ने एक बार भी हस्तक्षेप नहीं किया।
15 दिसंबर 1950 को जब सरदार पटेल ने आखिरी सांस ली, तब प्रधानमंत्री नेहरू ने सारे सरकारी प्रोटोकॉल तोड़कर राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद के साथ मुंबई के सोनपुर श्मशान घाट पहुंचकर उनकी अंतिम यात्रा को कंधा दिया था।
इतना ही नहीं, नेहरू के कार्यकाल के दौरान ही 1951 में सूरत में ‘सरदार वल्लभभाई क्षेत्रीय इंजीनियरिंग कॉलेज’ (SVNIT) की नींव रखी गई थी। अहमदाबाद हवाई अड्डे का नामकरण और सरदार पटेल स्मारक ट्रस्टों को लाखों रुपयों की सरकारी वित्तीय सहायता देने की शुरुआत नेहरू कैबिनेट के प्रस्तावों के जरिए ही संसद में दर्ज आंकड़ों के अनुसार की गई थी।
एक तरफ वो नेहरू थे जिन्होंने अपने सबसे बड़े वैचारिक आलोचक को देश का उप-प्रधानमंत्री बनाया, और दूसरी तरफ आज का वह नेतृत्व है जिसने अपनी ही पार्टी के उन ‘राजनीतिक पिताओं’ की बलि चढ़ा दी जिन्होंने उन्हें उंगली पकड़कर सत्ता की सीढ़ियां चढ़ना सिखाया था।
इस सूची का सबसे पहला, सबसे प्रामाणिक और सबसे दर्दनाक नाम है देश के पूर्व उप-प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी का। वही लालकृष्ण आडवाणी, जिन्होंने 1990 के दशक में रथ यात्रा निकालकर भाजपा को 2 सीटों से उठाकर राष्ट्रीय पटल पर स्थापित किया था।
इतिहास गवाह है कि वर्ष 2002 के गुजरात दंगों के बाद जब तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ‘राजधर्म’ का हवाला देकर नरेंद्र मोदी को मुख्यमंत्री पद से हटाना चाहते थे, तब आडवाणी ने ही गोवा कार्यसमिति में ढाल बनकर उनकी कुर्सी बचाई थी।
लेकिन साल 2014 में जैसे ही दिल्ली की गद्दी पर पूर्ण बहुमत आया, आडवाणी को ‘मार्गदर्शक मंडल’ नामक एक ऐसे राजनीतिक वृद्धाश्रम में डाल दिया गया, जिसकी पिछले 12 वर्षों में एक भी आधिकारिक बैठक नहीं हुई।
यही हश्र भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष और प्रखर विद्वान डॉ. मुरली मनोहर जोशी के साथ भी हुआ। संगठन के दिनों में जिन्होंने मौजूदा नेतृत्व को आगे बढ़ाया, नए युग की राजनीति आते ही उनका वाराणसी और कानपुर से संसदीय चुनाव लड़ने का टिकट इस तरह काटा गया जैसे वे कोई साधारण कार्यकर्ता हों।
गुजरात की जमीनी राजनीति में केशुभाई पटेल का नाम चलता है, जिन्होंने 1990 के दशक में गुजरात भाजपा की मजबूत नींव रखी थी। सत्ता के केंद्रीयकरण के दौर में केशुभाई पटेल को इस कदर उपेक्षित और हाशिए पर धकेला गया कि वे आहत होकर अपनी अलग पार्टी (गुजरात परिवर्तन पार्टी) बनाने पर मजबूर हो गए और गुमनामी में ही दुनिया से विदा हो गए।
इस सूची में एक और बेहद आक्रामक और कभी मौजूदा नेतृत्व के सबसे करीबी मित्र रहे प्रवीण तोगड़िया का नाम भी इतिहास में दर्ज है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विश्व हिंदू परिषद के इस कद्दावर नेता ने कभी गुजरात के कोने-कोने में जाकर संगठन को सींचा था।
लेकिन सत्ता पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित होते ही तोगड़िया को इस तरह संगठन और राज्य से बाहर का रास्ता दिखाया गया कि आज वे पूरी तरह से राजनीतिक रूप से अप्रासंगिक कर दिए गए हैं।
नेहरू और पटेल के बीच प्रशासनिक और वैचारिक मतभेद जरूर थे, लेकिन उनके बीच कभी ‘मनभेद’ या गद्दी हथियाने की गंदी भूख नहीं थी।
नेहरू ने देश के निर्माण के लिए सरदार पटेल को अपने बराबर का सम्मान और असीमित अधिकार दिए। इसके विपरीत, वर्तमान सत्ता ने केवल व्यक्तिगत छवि चमकाने और सत्ता की मलाई अकेले चाटने के लिए अपने ही संरक्षकों को इतिहास के कूड़ेदान में फेंक दिया।
अब तय आपको करना है कि देश के लिए अपनी जान खपाने वाली वो मर्यादित जुगलबंदी महान थी, या अपने ही गुरुओं की राजनीती खत्म करके सिंहासन पर बैठने वाली यह मौजूदा संस्कृति!
परिसर अभ्यास के तहत कोदामेंढी में शामलाल धांडे के घर क्षेत्रभेंट, शेण से गैस बनने की प्रक्रिया, खाना पकाने में उपयोग और अवशेष से खाद बनने की जानकारी, प्रत्यक्ष अनुभव से बढ़ी वैज्ञानिक सोच
कोदामेंढी, 26 अक्टूबर 2026 :
आनंददायी शनिवार के तहत परिसर अभ्यास विषय के अंतर्गत जिला परिषद शाला तोंडली के विद्यार्थियों ने गांव में शामलाल धांडे के घर लगे गोबरगैस संयंत्र की क्षेत्रभेंट की।
परिसर अभ्यास में गोबरगैस संयंत्र के बारे में संक्षिप्त जानकारी दी गई थी, जिसके बाद बच्चों के मन में कई सवाल उठे – गोबरगैस क्या है? यह कैसे बनता है? संयंत्र कैसे बना होता है? इसका उपयोग क्या है? इन्हीं जिज्ञासाओं को शांत करने के लिए बच्चों को प्रत्यक्ष संयंत्र दिखाया गया।
इस दौरान बच्चों को संयंत्र की कार्यप्रणाली, गोबर से जैव-गैस (बायोगैस) बनने की प्रक्रिया, खाना पकाने में इसके उपयोग और संयंत्र से निकलने वाले अवशेषों का खाद के रूप में इस्तेमाल होने की विस्तृत जानकारी दी गई। शामलाल धांडे ने बच्चों के सभी सवालों के संतोषजनक जवाब दिए।
इस क्षेत्रभेंट के माध्यम से बच्चों को समझाया गया कि विज्ञान केवल किताबों तक सीमित नहीं है, बल्कि हमारे रोजमर्रा के जीवन में कैसे उपयोगी है। गोबरगैस जैसे वैकल्पिक ऊर्जा स्रोत पारंपरिक ईंधन पर निर्भरता कम करते हैं और जैविक पदार्थों का सही उपयोग, कचरा प्रबंधन, प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण और पर्यावरण संवर्धन का महत्व भी बताया गया।
इस अवसर पर मुख्याध्यापिका अनुराधा धुर्डे ने विद्यार्थियों को मार्गदर्शन देते हुए प्रत्यक्ष निरीक्षण, प्रश्नोत्तर और साक्षात्कार के माध्यम से ज्ञान अर्जित करने का महत्व समझाया। इस उपक्रम से बच्चों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण, निरीक्षण कौशल, सवाल पूछने की प्रवृत्ति और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी की भावना विकसित हुई। इस उपक्रम में सह-शिक्षक निलेश जाधव का सहयोग रहा।
किताबी ज्ञान को प्रत्यक्ष अनुभव से जोड़ने वाली यह क्षेत्रभेंट विद्यार्थियों के लिए ज्ञानवर्धक, आनंददायी और प्रेरणादायी साबित हुई।
गरंडा-बखारी में पाइप और वैकल्पिक रास्तों पर उठे सवाल – पारशिवनी-कन्हान पुलिस और राजस्व विभाग की संयुक्त कार्रवाई की मांग, संगठित रैकेट के सबूत मिले तो मकोका लगाने की आवाज, तहसीलदार ने माने नदी में गड्ढों के बगल से बनाए गए वैकल्पिक रास्ते
नागपुर, 26 अक्टूबर 2026 :
पेच-कन्हान नदी क्षेत्र में कथित अवैध रेत उत्खनन, भंडारण और परिवहन की शिकायतों के बीच जांच का दायरा बढ़ाने की मांग तेज हो गई है। पारशिवनी के तहसीलदार सुरेश वाघचौरे ने खुद माना है कि नदी पात्र में गड्ढे खोदकर रास्ते रोके जाने के बावजूद उनके बगल से वैकल्पिक रास्ते बनाए जा रहे हैं। ऐसे में अब सवाल सिर्फ रेत निकालने वालों पर नहीं, बल्कि पूरी चेन की जवाबदेही और निगरानी व्यवस्था पर उठ रहा है।
माउली, नायकुंड, पालोरा, कालाफाटा, पिपला, वागोला, मेहदी, इटगांव, गरंडा, डोरली और बखारी क्षेत्र से जुड़ी शिकायतों को लेकर मांग है कि प्रशासन उत्खनन स्थलों, परिवहन मार्गों, रेत के भंडारों और संबंधित दस्तावेजों की संयुक्त पड़ताल करे।
CDR और मोबाइल लोकेशन की कानूनी जांच की मांग –
मामले में संबंधित अधिकारियों-कर्मचारियों की भूमिका को लेकर सवाल उठने के बाद अब कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) और मोबाइल टावर लोकेशन की कानूनी प्रक्रिया के तहत जांच की मांग की जा रही है।
हालांकि यह स्पष्ट है कि केवल फोन संपर्क या लोकेशन के आधार पर किसी की संलिप्तता साबित नहीं होती। ऐसी जांच सक्षम प्राधिकारी की अनुमति और लागू कानूनों के अनुसार ही हो सकती है। जांच में देखा जाना चाहिए कि संबंधित अवधि में शिकायतें कब मिलीं, उन पर क्या कार्रवाई हुई, मौके का निरीक्षण हुआ या नहीं और सरकारी रिकॉर्ड में क्या दर्ज है।
कुछ कर्मचारियों द्वारा एक से अधिक मोबाइल नंबर इस्तेमाल करने का संदेह भी व्यक्त किया जा रहा है, जिसकी स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है। एक से अधिक नंबर होना अपने आप में अपराध का सबूत नहीं है।
राजनीतिक हस्तक्षेप के आरोपों की भी निष्पक्ष जांच हो –
स्थानीय स्तर पर इस कथित कारोबार में राजनीतिक संपर्कों या हस्तक्षेप की आशंका भी जताई जा रही है। लेकिन बिना ठोस प्रमाण के किसी व्यक्ति या पदाधिकारी पर आरोप को तथ्य नहीं माना जा सकता। मांग है कि प्रशासन बिना दबाव के शिकायतों, परमिट, परिवहन रिकॉर्ड और अन्य साक्ष्यों की जांच करे।
गरंडा-बखारी में पाइप और रास्तों का रहस्य –
पेच नदी किनारे नया रास्ता तैयार करने और बखारी शिवार की ओर नदी पात्र में बड़े पाइप डालने की चर्चा को लेकर आधिकारिक स्थिति स्पष्ट होना बाकी है। क्या इसके लिए संबंधित विभागों से अनुमति ली गई है? क्या नदी पात्र में बदलाव किया गया है? क्या इसका कथित अवैध रेत परिवहन से संबंध है? इन सवालों का जवाब संयुक्त स्थल निरीक्षण और दस्तावेजों की जांच से ही मिल सकता है।
पारशिवनी-कन्हान पुलिस के समन्वय की जरूरत –
यह क्षेत्र पारशिवनी और कन्हान पुलिस थानों की सीमा में आता है, इसलिए दोनों थानों, राजस्व विभाग, रामटेक के उपविभागीय अधिकारी, जिलाधिकारी और नागपुर ग्रामीण पुलिस के बीच समन्वय जरूरी बताया जा रहा है। नागपुर ग्रामीण के पुलिस अधीक्षक हर्ष पोद्दार, अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक मस्के और स्थानीय अपराध शाखा से संयुक्त जांच की मांग उठ रही है।
इस मामले में पारशिवनी के सहायक पुलिस निरीक्षक किशोर शेळके से फोन पर संपर्क का प्रयास किया गया, लेकिन प्रतिक्रिया नहीं मिली। अधिकारियों का आधिकारिक पक्ष आने पर स्थिति और स्पष्ट होगी।
राजस्व मंत्री से DGP तक हस्तक्षेप की मांग –
महाराष्ट्र के राजस्व मंत्री, गृहमंत्री, पुलिस महानिदेशक, विशेष पुलिस महानिरीक्षक से मामले का संज्ञान लेने की मांग हो रही है। जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक के समन्वय से विशेष जांच अभियान चलाकर अधिकृत रेत स्रोत, परिवहन अनुमति और बाजार में आपूर्ति की स्थिति की भी पड़ताल करने की जरूरत बताई गई है।
संगठित अपराध मिला तो मकोका पर विचार –
मामले में कठोर कार्रवाई और महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण अधिनियम (मकोका) लगाने की मांग भी उठी है। हालांकि मकोका के लिए सिर्फ बड़े पैमाने पर रेत चोरी की शिकायत पर्याप्त नहीं है। इसके लिए कानून में निर्धारित संगठित अपराध के आवश्यक तत्वों का पूरा होना जरूरी है। यदि निष्पक्ष जांच में ऐसे ठोस प्रमाण मिलते हैं, तो सक्षम अधिकारी कानून के अनुसार कार्रवाई पर विचार कर सकते हैं, अन्यथा खनन, राजस्व, पर्यावरण और आपराधिक कानूनों के तहत कार्रवाई होगी।
फिलहाल निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि प्रशासन संयुक्त निरीक्षण कब करता है और दोषियों पर क्या कार्रवाई होती है।
स्नातक निर्वाचन क्षेत्र चुनाव में 38 उम्मीदवार, 64.82% मतदान के बाद कल मतगणना, वडेट्टीवार ने कहा – शहर के नेताओं ने ‘तुझा की माझा’ खेला, चंद्रपुर-गडचिरोली में वंजारी को अभूतपूर्व समर्थन
नागपुर, 26 अक्टूबर 2026 :
महाराष्ट्र विधान परिषद के नागपुर विभाग पदवीधर (स्नातक) मतदारसंघ चुनाव की मतगणना से एक दिन पहले कांग्रेस में अंतर्कलह खुलकर सामने आ गया है। कांग्रेस नेता विजय वडेट्टीवार ने नागपुर शहर के कई स्थानीय नेताओं पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि उन्होंने चुनाव के दौरान घोला घातला (धोखा दिया) और ‘तुझा की माझा’ का खेल खेलकर समय बर्बाद किया।
वडेट्टीवार ने हालांकि दावा किया है कि इसके बावजूद महाविकास आघाड़ी के उम्मीदवार अभिजित वंजारी की जीत 100% निश्चित है, क्योंकि नागपुर ग्रामीण और शेष विदर्भ में उन्हें स्नातक मतदाताओं का अभूतपूर्व समर्थन मिला है।
वडेट्टीवार ने क्या कहा ? चुनाव पर बात करते हुए वडेट्टीवार ने कहा कि मुख्यमंत्री और राज्य के राजस्व मंत्री ने इस स्नातक चुनाव को अत्यंत प्रतिष्ठा का विषय बना दिया था। सत्ता पक्ष के नेताओं ने अपनी पूरी ताकत इस चुनाव में झोंक दी थी, तब कांग्रेस के स्थानीय स्तर के कुछ नेताओं की भूमिका संदेहास्पद और सुस्त रही।
उन्होंने कहा, “कुछ नेताओं के नाम लेना उचित नहीं होगा, लेकिन वास्तविकता यह है कि ये नेता चुनाव के काम में देर से लगे। अभिजित वंजारी हमेशा सभी कार्यकर्ताओं और नेताओं को साथ लेकर चलने वाले जननेता हैं, परंतु नागपुर शहर में वैसी एकजुटता या तालमेल दिखाई नहीं दिया।”
उन्होंने आरोप लगाया कि अनेक लोगों ने एक-दूसरे की टांग खिंचाई में ही समय गंवा दिया।
ग्रामीण भाग पर भरोसा – वडेट्टीवार ने कहा कि चंद्रपुर, गडचिरोली और आसपास के ग्रामीण इलाकों में मतदाता बड़ी संख्या में वंजारी के पीछे खड़े रहे हैं। वहां उन्हें प्रचंड प्रतिसाद मिला है।
“नागपुर से 50% मत मिले तो भी, नागपुर के अलावा शेष चार से पांच जिलों से अभिजित वंजारी को स्नातक मतदाताओं का उत्तम और अभूतपूर्व समर्थन मिला है। इसी ग्रामीण समर्थन के मजबूत भरोसे पर महाविकास आघाड़ी के उम्मीदवार अभिजित वंजारी 100% चुनावी मैदान में बाजी मारेंगे और विजयी होकर विधान परिषद में जाएंगे, ऐसा ठोस विश्वास है।”
पृष्ठभूमि – गौरतलब है कि नागपुर विभाग स्नातक मतदारसंघ के लिए 23 अक्टूबर को 6 जिलों – नागपुर, वर्धा, भंडारा, गोंदिया, चंद्रपुर, गडचिरोली के 445 केंद्रों पर मतदान हुआ था, जिसमें 64.82% मतदान दर्ज हुआ। कुल 38 उम्मीदवार मैदान में हैं। मतगणना कल 27 अक्टूबर को सुबह 8 बजे से मानकापुर इनडोर स्टेडियम में 84 टेबल पर होगी।
वडेट्टीवार के इस बयान के बाद नागपुर स्नातक चुनाव का राजनीतिक माहौल और गरमा गया है और पार्टी के भीतर चर्चा तेज हो गई है।